Sunday, October 12, 2025

सुबह की चाय और रेलिंग पर कप



 बाजार से आइफ़ोन का केबल लाकर फ़ोन चार्जिंग पर लगा दिया। फ़ोन सामान्य गति से चार्ज हुआ। ऐसा लगा नहीं कि ओरिजनल केबल नहीं है। हो सकता है बाद में कुछ फ़र्क़ पड़े। फ़ोन चार्ज होने के बाद लगा बाहरी दुनिया से संपर्क की स्थिति में हैं। हालांकि पिछले करीब आठ-दस घंटे बिना इस फ़ोन के भी आराम से गुजारा हो रहा है।

(इससे पहले का किस्सा यहाँ पढ़ें https://www.facebook.com/share/r/17dJCmRxFR/)
रात को खाना खाने के बाद मिठाई में आइसक्रीम थी। पूरी कटोरी भर आइसक्रीम न कहने का मन बनाते, बनाते खा ले। परदेश में परहेज से परहेज किया जा सकता है।
सोचा था खाने के बाद कुछ पढ़ेंगे। लिखेंगे। डुयोलिंगों पर स्पेनिश का पाठ पूरा करेंगे। पिछले दो दिनों से बराबर बुजुर्ग की तरह ताने मार रहा है -'Your Spanish won’t practice itself. Start a lesson Practice makes progress!' (आपकी स्पेनिश भाषा का अभ्यास अपने आप नहीं होगा। एक पाठ शुरू करें। अभ्यास से प्रगति होती है!) हम पाठ शुरू करने की सोचते हुए कब सो गए पता ही नहीं चला।
सुबह उठने के बाद चाय मंगाई। सुबह की चाय शानदार लगती है। थोड़ी देर कमरे में बैठकर चाय पी। फिर याद आया दरवाजा बाहर बालकनी में खुलता है जहाँ से समुद्र दिखता है। दरवाजा खोलकर बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए सामने समुद्र की लहरों को देखते रहे। फिर चाय का कप बालकनी की रेलिंग पर रखकर उसका फ़ोटो लिया।
हमको फ़ोटो लेते हुए सामने समुद्र में तैरने वाली मछलियाँ सोचती होंगी -'अजीब नमूना इंसान है। चाय के कप का फ़ोटो लेने आया लक्षद्वीप।' उनको क्या पता इसके क्या मजे हैं।
हम दुनिया में कहीं हों , सुबह हमेशा सुहानी होती है। आसपास के दृश्य मजेदार लगते हैं। लगता है जीवन की शुरुआत हो रही है। लेकिन यह सब भी मन-मूड पर निर्भर करता है। कभी-कभी तो सुबह से ही लगता है, ये दिन भी बीत गया। बहुत पहले कभी इस बीत गया, रीत गया वाले मूड से गुजरते हुए लिखी ये लाइन याद आ गयीं :
"सबेरा अभी हुआ नहीं है
पर लगता है
यह दिन गुज़र गया हाथ से
हथेली में जकड़ी बालू की तरह ।
अब
सारा दिन फिर
इसी एहसास से जूझना होगा।"
यह एहसास बहुत कम दिन रहा। लेकिन कविता जैसी चीज में दर्ज हो जाने के कारण ऐसे लगता है पूरा जीवन ही झमेले में बीता।
कल पहली मंजिल के जिस कमरे में सोए थे उसमें बालकनी से सड़क और समुद्र दोनों दिखते हैं। सुबह सड़क पर जाते लोग दिखे। कम चौड़ी सड़क पर दो लड़कियां जाती दिखीं उनमें से एक मोबाइल पर कुछ देखती जा रही थी। उनका फ़ोटो लेने की सोचते-सोचते वे फ़ोन कैमरे की जद से बाहर चली गयीं।
सड़क पर जाने वाले लोग कम ही थे। थोड़ी देर बाद दो महिलायें सड़क के दो छोरों पर जाती दिखीं। उनके चलने से ऐसा लग रहा था कि मानों दोनों में अबोला सा हो रखा है और दोनों आपस में सड़क भर की दूरी बनाए चल रही हैं।
सड़क के दोनों तरफ़ समुद्र सौ-सौ कदम की दूरी पर है। ऐसे जैसे समुद्र ने सड़क और उससे जुड़ी सौ-सौ कदम की ज़मीन का आलिंगन किया हो। अंग्रेजी में कहें तो टाइट हग करके रखा है। हर पल एक नई नहर अपने आलिंगन में ली हुई ज़मीन को उपहार में देता है। ज़मीन उसे वापस कर देती है। समुद्र फिर नई लहर भेंट करता है। ज़मीन वापस करती है। समुद्र कोशिश में लगा रहता है।
कल सुबह की बात करते हुए आज दोपहर हो गई। नंदन जी की कविता याद आ गई:
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
उड़ते हुए कल सुबह से आज दोपहर तक आ गए। इतनी आवारगी ठीक नहीं। अब फिर कल सुबह पर लौटते हैं जब हम कमरे की बालकनी पर बैठे चाय पी रहे थे।
इसके बाद की पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ आइए :https://www.facebook.com/share/v/1KbhTnMsG5/
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