Saturday, October 11, 2025

बंगलौर से लक्षद्वीप



 लखनऊ से बंगलौर की फ्लाइट सुबह पांच दस पर थी। बंगलौर सात पचपन पर पहुंचना था। अगली फ्लाइट दस पांच पर थी। दो घंटे में हमें लखनऊ वाली फ्लाइट से सामान लेना, बंगलौर एयरपोर्ट में टर्मिनल बदलना, बोर्डिंग पास बनवाना, सामान देना, सिक्योरिटी चेकिंग और फिर बोर्डिंग करना था। लग रहा था कि कहीं देर न हो जाए। लेकिन सुरक्षा जांच के बाद नौ बजे बोर्डिंग के लिए पहुंच गए।

डिजी यात्रा एप में बोर्डिंग पास अपलोड होने के चलते फटाफट आगे बढ़ते गए। डिजी यात्रा एप आधार से जुड़ा रहता है। आँख की पुतली देखकर क्लियेनरेंस दे देता है।
बोर्डिंग के लिए बीस मिनट का समय देखकर लाउंज तरफ बढ़े। सोचा नाश्ता कर लें। एसबीआई का क्रेडिट कार्ड था। उसको दिखाकर लाउंज में घुसे। फटाफट नाश्ता किया। मैसूर मसाला डोसा। ग्लास टमलर में चाय पी। पांच मिनट बजे थे तो कुछ फल और दूसरी चीजें भी खाई। दो रुपए के क्रेडिट कार्ड में जितना कुछ खाया उतना एयरपोर्ट में भुगतान करके खाते तो दो हजार रुपए से कम खर्च होते।
बोर्डिंग का इंतजार करते हुए घर से फ़ोन आया। पता चला कि हम अपना आई फ़ोन का चार्जजिंग केबल और चार्जर घर में ही भूल गए थे। भुलक्कड़ी भी अपने में मजेदार आदत है। जिस चीज को सबसे ध्यान में रखने की सोच रहे थे, वही भूल गए। मोबाइल 60% से ज़्यादा चार्ज था।चार्जर तो एक और था लेकिन केबल नहीं थी पास में। सोचा एयरपोर्ट पर केबल ले लें लेकिन महीन मिली। लक्षद्वीप में लेने की सोचकर बोर्डिंग के लिए बढ़े।
बोर्डिंग के पहले लक्षद्वीप का परमिट देखा जाता है। कुछ लोगों के परमिट बैग में थे। लोगों ने निकालकर दिखाए और बैठे जहाज़ में।
जहाज़ छुटका वाला था। एक लाइन में चार सीट। बैठ गए। हमारे बगल की सहयात्री कड़क अंग्रेजी में अपने दोस्तों को फ़ोन पर लक्षद्वीप जाने की सूचना दे रही थीं। बताया उन्होंने कि वे लक्षद्वीप स्कूबा डाइविंग के लिए जा रही हैं। लक्षद्वीप स्कूबा डाइविंग के लिए अच्छी जगह मानी जाती है।
उड़ान का समय हो जाने के बाद भी जहाज अपनी जगह ही खड़े-खड़े कदमताल करता रहा। आधे घंटे बाद तेजी से हिला और हवाई पट्टी पर भागता हुआ आसमान में पहुँच गया।
बैंगलोर से लक्षद्वीप का सफ़र क़रीब सवा दो घंटे का था। सोचा सहयात्री से बतियायेगे। लेकिन जहाज उड़ते ही वो अपनी आँख और कान पर कैप लगाकर मुँह बंदकर सो गई। उनको देखकर लगा कि गांधी जी की बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो वाली तीनों फ़ोटुएँ एक में मिल गई हैं। हम अपनी सीट से उठकर खिड़की वाली सीट पर आ गए। नीचे देखने लगे। नीचे कुछ देर बादल दिखे, फिर हरे पहाड़ और लक्षद्वीप आते-आते समुद्र दिखाई देने लगा। देखते-देखते जहाज़ लक्षद्वीप पर उतर गया।
अगाती हवाई अड्डे की हवाई पट्टी बहुत छोटी है। तीन तरफ़ समुद्र से गिरी हुई। पासा ही आगमन-प्रस्थान स्थल लिखी हुई इमारतें। हम टहलते हुए आगमन स्थल की तरफ़ बढ़े। पगडंडी जैसी सड़क के चारो तरफ़ घर टाइप का बगीचा। थोड़ी देर, सौ मीटर से भी कम दूरी पर लहराता समुद्र।
बाहर निकलने के पहले सबके परमिट चेक हुए। इसके बाद बाहर निकलकर सूटकेस समेटा। सूटकेस उठाकर बाहर की तरफ़ चलते समय याद आया चश्मा अंदर ही भूल गए। फौरन अंदर गए। मेरा चश्मा परमिट रजिस्टर पर शान से ऐठा बैठा था। उठाते हुए काउंटर पर बैठे सुरक्षा अधिकारी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कुछ कहाँ नहीं। मुस्करा दिए अलबत्ता।
जिस आसानी से हम अपना चश्मा लेने बाहर से दुबारा अंदर चले गए उससे मुझे अपनी अमेरिका यात्रा की याद आ गई जब एक सूटकेस बाहर गेट के पास रखकर दूसरा लेने जाते समय हमको वहाँ तैनात सुरक्षा कर्मी ने रोक लिया था। बहुत समझाने और अनुरोध के बाद साथ जाकर सूटकेस लेने जाने दिया था।
इससे लगा कि बड़ी जगहों के बड़े झमेले होते हैं। झमेले कभी कभी झमेले कम, चोचले ज़्यादा होता है। कभी कभी इसी चक्कर में लोग बड़ा दिखाने के लिए तमाम चोचले पाल लेते हैं।
बाहर निकले तो ड्राइवर ने मेरा सामान गाड़ी में रखा। पास ही सेल्फी प्वाईंट के सामने खड़ा करके मेरा फ़ोटो ले लिए। फोटो किसी राष्ट्रगान वाले कार्यक्रम का लगा। हमने सेल्फी लिए और बैठ गए गाड़ी में।
ठहरने की जगह केवल दो किलोमीटर दूर है एयरपोर्ट से। पतली सड़क के दोनों और छोटे-छोटे होटल, घर बने हुए हैं। हवाई अड्डे के पास होने के कारण अधिक़तम दो मंजिला भवन बनाने की इजाज़त है। घर होटल के बाद स्थानीय कला के चित्र बने हुए। सड़क के दोनों करीब सौ-सौ मीटर के बाद समुद्र देखकर लगा कि ये लहरे सड़क की सुरक्षा और निगरानी के लिए तैनात हैं।
होटल के कमरे में तौलिये किसी पक्षी की आकृति की तरह रखें हुए थे। हमने सोचा जाने के पहले इसको बनाने का तरीका सीखकर जाएँगे।
होटल का सर्विसिंग स्टाफ हिमाचल प्रदेश का है। उत्तर भारतीय लोगों के खाने के हिसाब से कुल्लू मनाली के बच्चे यहाँ काम के लिए लाए गए हैं। नहाने-धोने के बाद लंच किया। हम अकेले थे होटल में कल।
होटल में आने के बाद से लगातार आई फ़ोन के केबल के बारे में पूछते रहे। मिला नहीं। तय हुआ कि शाम को जाएँगे बाजार केबल खोजने। यह तय करने के बाद हम आराम फ़रमा हो गए। हम तो आराम से लेट गए लेकिन बाहर समुद्र की लहरों का मूड कुछ और ही था। वे एक-दूसरे को ठेलते हुए बार-बार समुद्र तट की तरफ़ आ रही थीं। एक दूसरे से हँसी मजाक करते हुए तट को छूते हुए वापस लौट रही थीं।
लक्षद्वीप यात्रा के आगे के किस्से यहाँ पहुँचकर पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/r/15uS5HFoUP/


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