कल सबेरे चाय बनाई। पी। इसके बाद अगली चाय के लिए दूध लेने गए। दुकान अभी खुली नहीं थी। बाहर ट्रे में दूध के पैकेट रखें थे। लोग अपनी जरूरत के हिसाब से पैकेट लेते जा रहे थे। लोग दुकान के बंद शटर के पास चिपके क्यू आर कोड से स्कैन करके भुगतान करते जा रहे थे। बगल में पान मशाले के पैकेट लटकाये हुए आदमी पूछने पर दूध के दाम बताता खड़ा था। हमने दूध लेकर बताया -"पेमेंट कर दिया।" अपने मुँह में रखें पान मसाले के आनंद में डूबे उस आदमी ने बिना मेरी तरफ़ देखे आँख मूँदकर मुंडी हिलाई। उसकी हिली हुई मुंडी -भुगतान प्राप्ति की रसीद थी।
अक्सर लोग यूरोप के कुछ देशों का हवाला देते हुए बताते हैं कि वहाँ कोई दुकानदार तैनात नहीं रहता। काउंटर पर सामान, अधिकतर फल, रखें रहते हैं। लोग सामान लेते हैं। भुगतान करते हैं। चले जाते हैं। कल दूध की दुकान पर भुगतान व्यवस्था देखते हुए लगा अपना देश भी आंशिक यूरोप हो गया है। यह बात लिखते हुए लग रहा है कि कहीं इसको पढ़कर सरकार अखबारों को विज्ञापन के बहाने पैसे देने का एक और विज्ञापन न तैयार कर ले- माननीय के कुशल नेतृत्व में देश/प्रदेश ने यूरोप की बराबरी की।
सड़क पर तमाम बच्चे नीली ड्रेस में HAL की तरफ़ जाते दिखे। दो-दो, चार-चार के समूह में। नीली ड्रेस से बहुजन समाज पार्टी का ध्यान आया। पहले तो लगा कि किसी स्कूल के बच्चे हैं। पूछने पर पता चला कि HAL में अप्रेंटिस करने वाले बच्चे हैं। एक साल की अप्रेंटिस का कोर्स है।सुबह सवा आठ बजे से शाम चार बजे तक क्लास चलती है। हमारे देखते-देखते पचास-साठ बच्चे नीली ड्रेस में HAL की तरफ़ जाते दिखे।
HAL से याद आया कि पिछले दिनों पुराने कागजों में एक काग़ज़ दिखा था जिसमें HAL में भर्ती के लिए इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। उस समय तक शायद यूपीएसईबी में नौकरी कर रहे थे तथा इंजीनियरिंग सर्विसेज में सेलेक्शन हो गया था। इसलिए इंटरव्यू देने गए नहीं। गए होते तो क्या पता आयुध निर्माणी बोर्ड के बजाय HAL से रिटायर होते। महीने की नियमित पेंशन के बजाय खर्चे का कोई वैकल्पिक उपाय हुआ होता।
लेकिन ये तो 'अगर ऐसा हुआ तो वैसा होता जैसी बातें' हैं। अपने यहाँ का सबसे रोचक टाइम पास का बहाना। औरंगज़ेब के बजाय दारा शिकोह बना होता, 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में अंग्रेज हार जाते, प्रधानमंत्री नेहरू की बजाय पटेल होते, महात्मा गांधी दस साल और जीते, जनता पार्टी ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाया होता। इनका कोई मतलब नहीं इसीलिए हम इन पर बेहिसाब बहस करते रहते हैं। बेमतलब की बहस में पास से कुछ जाता नहीं सिवाय समय के। और समय तो बेहिसाब है अपने पास। खर्च ही नहीं होता।
दूध लेने के बाद सोचा कुछ फल भी ले लें। HAL के आगे बढ़ते गए। कोई दुकान खुली नहीं दिखी। एक जगह सार्वजनिक शौचालय के बाहर लोगों की 'दिव्य निपटान' करने वालों का जमावड़ा लगा था। लोग तसल्ली से अंदर जाते,बाहर आते दिख रहे थे। एक ने हाथ की खैनी मुँह के हवाले करते हुए बताया -'आगे दुकान है खुल गई होगी।'
फल की दुकान पर फल देने वाले ने अपना नाम बताया बिलाल। हमने नाम का मतलब पूछा तो उसको पता नहीं था। हमने गुगलिया के बताया -बिलाल मतलब गीला करना, नमी या ताजगी होता है। मुस्लिम बच्चों के नामों बिलाल नाम का मतलब होता है पहला मुअज्जिन (नमाज के लिए बुलाने वाला) पैगंबर मुहम्मद का साथी।
नाम का मतलब पता करके बिलाल को बताया। बालक ख़ुश हुआ लेकिन तब तक हम भुगतान कर चुके थे इसलिए इसके बदले में बालक के चेहरे की खुशी ही हासिल हुई। किसी के चेहरे की खुशी बेशक़ीमती होती है। हम खुश मन वापस लौट पड़े।
रास्ते में एक जगह कुछ लोग बैठे हुए आपस में गपिया रहे थे। एक उजड़े हुए शेड के नीचे कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं। देखने से लग रहा था कभी यह जगह बस स्टॉप रहा होगा। लोग यहाँ बसों का इंतज़ार करते होंगे। आज इसकी उजाड़ हालत देखकर लगा कि हर नई बनी इमारत का भविष्य एक उजाड़ खंडहर होता है। नई इमारत और उजाड़ खंडहर के बीच का समय उस इमारत का इतिहास होता जिसे लोग अपने -अपने हिसाब से पढ़ते हैं।
बस स्टैंड से आगे HAL के सामने की सड़क से लौटते समय कुछ नीली ड्रेस वाले बच्चे लपकते हुए बच्चे HAL की तरफ़ जाते दिखे। उनको शायद देर को गई थी। देरी से मुझे मुनीर नियाज़ी की ग़ज़ल याद आई :
हमेशा देर कर देता हूं मैं
हमेशा देर कर देता हूं मैं
ज़रूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
पूरी ग़ज़ल मुनीर नियाज़ी की आवाज़ में सुनने का मन हो तो लिंक टिप्पणी में दिया है।
इतना लिखने के बाद लगता है निकलना चाहिए वरना देर हो जायेगी।
PS:
1. कल बिलाल नाम का मतलब पता होने पर याद आया कि पंडित वंशीधर शुक्ल ने गीत लिखा था :
उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैैन कहां जो सोवत है
जो सोवत है सो खोवत है
जो जागत है सो पावत है।
इस लिहाज से देखा जाए तो शुक्ल जी हमारे बिलाल थे जिन्होंने हमको जागने के लिए यह गीत लिखा। इसी का विस्तार करें तो हर समाज में जो अपने लोगों को जगाने का काम करता हो, दिशा देता है वह अपने लोगों के लिए बिलाल होता है। लेकिन आज के समय में यह लिखने में खतरा है कि कोई कहेगा भाई तू उधर ही चला जा। यहां तो ये नहीं चलेगा। इसलिए इसको लिख नहीं रहे हैं। आप खुद समझदार हैं।
2. ‘देर कर देता हूँ’ सुनते हुए एक गाड़ी के पीछे -‘दुर्घटना से देर भली’ लिखा देखा तो लगा कि नियाजी साहब की ग़ज़ल दुर्घटना से बचाव के लिए लिखी गई है। नियाजी साहब की ग़ज़ल को दुर्घटना से बचाव के आह्वान के लिए प्रयोग की जानी चाहिए।
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