Thursday, October 30, 2025

अंधेरे का बड़प्पन


 

पिछले दिनों कविता संग्रह 'अंधेरे का बड़प्पन' का ई बुक संस्करण प्रकाशित किया। फेसबुक पर और व्हॉट्सएप पर लोगों को लिंक भेजा। 300 से ऊपर लोगों ने बढ़ाई दी। कुछ लोगों ने किताब ख़रीद भी ली। अभी तक 35 किताबें बिकी। प्रति किताब 37.50 रुपए प्रति किताब रॉयल्टी के हिसाब से कुल 1312.50 रुपए जमा हो गए।
हमने पोथी से पूछा कि जिन मित्रों ने किताब ख़रीदी है उनके नाम बता दे तो उनको धन्यवाद दे दें। मिलने पर चाय भी पिलायेंगे। दस रुपये खर्च करेंगे अपने पाठकों पर। लेकिन पोथी ने बताया नहीं। कहा यह ग्राहकों की निजता का हनन होगा।
हमने यह भी दीपावली पर उपहार स्कीम भी लांच करने की सोची थी। किताब ख़रीदो दस रुपये वापस पाओ। लेकिन फिर सोचा कि कहीं मित्र लोग यह न कहने लगें -' पहले दस रुपये भेजो खाते में तब ख़रीदें।'
अब हम को सरकार थोड़ी हैं जो वोट देने का पहले दस हज़ार दे देती है। सरकार में देने वालों का पैसा उनका ख़ुद का तो होता नहीं। वे कुछ भी दे सकते हैं। जनता का पैसा, जनता को दे दिया। हम कैसे दे दें भाई? हमको अपना खर्च भी चलाना है। हमको फौरन बात समझ में आ गई। हमने स्कीम लांच करते ही वापस ले ली। हम को सरकार थोड़ी हैं जो सैकड़ों लोगों की मौत के बाद चुनाव के मौके पर स्कीम वापस लें।
कुछ मित्रों के खाते से (अभी तक तीन) पैसे कट गए लेकिन किताब अभी तक आई नहीं है। उन्होंने हमें अपने भुगतान के स्कीन शॉट भेजे हैं। हमने पोथी वालों को लिखा है। आशा है उनके खाते में किताब पहुँच जायेगी।
कविता संग्रह पर कुछ मित्रों की प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। Pankaj Prasun ने बताया कि पढ़ी हुई कविताओं में उनको 'घर से बाहर जाता आदमी' अच्छी लगी। उनका यह भी मानना है कि कुछ दोहों पर कुछ मेहनत होती तो अच्छे बन सकते थे। मतलब ऐसे ही हैं।
हमारे एक ने कहा -"आपको अपनी casual लिखाई इसमें शामिल नहीं करनी चाहिए थी।"
फेसबुक मित्र Arvind Jain जी ने संग्रह की कविता पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा -"सर आप गद्य बहुत अच्छा लिखते हैं कृपया उसी पर फोकस करें ।" मतलब कि कवितायें सब ऐसी ही हैं।
इस संग्रह का विचार जब किया था तब इसमें केवल 'कट्टा कानपुरी' के नाम से लिखी ग़ज़ल, शेर शामिल करने का विचार था। बहुत पहले विभाग से अनुमति भी ली थी -'कलाम-ए-कट्टा कानपुरी' के नाम से प्रकाशित करने की। फिर देर हुई। कुछ और कविताएँ भी शामिल हुईं। नाम भी बदल गया। संग्रह 'अंधेरे का बड़प्पन' से प्रकाशित हुआ।
'कट्टा कानपुरी' का कलाम प्रकाशित करने का आग्रह/समर्थन Dhirendra Raj Veer Singh जी का था। बाद में दूसरी कविताएँ भी शामिल हुईं। यह ऐसा ही रहा कि चुनाव के समय सरकार बनाने का दावा करे वाली पार्टी को गठबंधन सरकार बनाने पर बाध्य होना पड़े। उन्होंने मेरे सिग्नेचर शेर का स्क्रीन शॉट लगाकर किताब खरीद लेने की सूचना भेजी :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।"
रमानाथ अवस्थी जी ने अपनी कविता ' मेरे पंख कट गए हैं' को मामूली कहते हुए कहा था - 'कविताएँ मेरी सब मामूली हैं।'बड़े कवि/लेखक अपने सारे रचनाकर्म को मामूली ही मानते हैं। इसी तर्ज पर अपनी कविताओं के बारे में कोई गलतफ़हमी नहीं है मुझे। बल्कि कोई कहे यह कवितायें हैं नहीं तो हमें उससे भी एतराज नहीं होगा।
'कट्टा कानपुरी' के नाम से लिखे अधिकांश शेर हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखे गए हैं। उनका मूल भाव है :
"हमारी चिरकुटइयां देखकर हमें बहुत काबिल न समझ,
कहीं कोई ऊंची बात निकल गयी तो देखते रह जाओगे!"
इन शेरों के कोई गहरे मतलब नहीं है। लेकिन यह पक्का है कि जो भी पढ़ेगा इस कविता संग्रह को वो सोचेगा कि ऐसी कविताएँ तो हम भी लिख सकते हैं। इसी बहाने नए कवि पैदा होंगे। हमारे मित्र Vinod Tripathi जी ने दो दिन पहले तय किया कि वे भी कविता लिखा करेंगे। क्या पता उनके इस निश्चय के पीछे मेरे कविता संग्रह का प्रकाशन रहा हो।
इस कविता संग्रह का फार्मेट तय करने में Ibbar Rabi जी के कविता संग्रह से सहायता मिली। उन्होंने अपनी एक पेज पर एक कविता की बजाय कविताएँ एक के बाद एक प्रकाशित की थीं। हमने भी यही तरीका अपनाया। इस तरह एक-एक शेर भी प्रकाशित हो गये इसमें। किसी शेर को यह मौका नहीं मिला कि वह किताब से बाहर रहकर अपनी नाराजगी जाहिर करे।
किताब का किंडल संस्करण भी प्रकाशित हुआ है (लिंक टिप्पणी में)। देश के बाहर रहने वाले मित्र इसे डाउनलोड कर सकते हैं।
किताब का प्रिंट संस्करण भी जल्दी ही लायेंगे। फ़िलहाल तो इसे कम पेज में तैयार करने का तरीका खोज रहे हैं।
किताब का लिंक मैं अपने सभी मित्रों को उनके मेसेज में भेजूँगा। भले ही वे किताब न ख़रीदें लेकिन संग्रह का मुफ्त में उपलब्ध 'प्रिव्यू' तो पढ़ सकते हैं। मुफ्त में मिलने वाली किसी चीज से अपने मित्रों को वंचित करना ठीक नहीं। किसी दोस्त को यह मौक़ा क्यों दें कि वह कहे -'हमको क्यों नहीं बताया किताब के बारे में।'
किताब का समर्पण करते हुए मैंने लिखा है :
"ब्लॉगिंग और फेसबुक के पाठक मित्रों को
और उन साथियों को भी
जो भले ही कभी पढ़ते न रहे हों।
लेकिन मिलने पर पूछते ज़रूर थे
-“तुम्हारा कविता का काम कैसा चल रहा है, बना रहे हो न कविता ! “"
इसमें आप भी शामिल हैं। इसलिए आपको बतायी सारी बातें। बाकी सब चकाचक है।
किताब डाउनलोड करने का लिंक यहाँ (पोथी) और यहाँ (किंडल) दिया है।


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