Saturday, September 12, 2015

कभी जो मिलोगे तो पूछेंगे हाल

अभी दोपहर को दफ्तर से लौटते हुए पुलिया पर ये फेरी वाले आराम करते हुए दिखे। मोबाइल पर गाना सुन रहे थे -कभी जो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।

बात शुरू की तो पता चला कि सीतापुर जिले के लहरपुर और बिसवाँ के हैं। तौकीर (बाएं) और फुरकान (दायें)। फुरकान के पिता जी आये थे 15 साल पहले फेरी लगाने। फुरकान 5 साल पहले पहली बार आये थे। आते-जाते रहते हैं। कुछ दिन जबलपुर में फेरी लगाते हैं। कभी लखनऊ चले जाते हैं।

चादर, दरी, तकिया के गिलाफ आदि की फेरी लगाते है। सामान कभी जबलपुर से लेते हैं। कभी लखनऊ से ले आते हैं। कमाई खाने भर को हो जाती है। आज अभी तक कुछ बिक्री हुई नहीँ। पर अभी दिन खत्म नहीं हुआ है। शाम तक कुछ न कुछ बिक्री होगी। ऊपर वाला सबका इंतजाम रखता है। 

2002 में शादी हुई फुरकान की। 3 बेटियां हैं। सब परिवार सीतापुर में है। यहां अकेले किराये पर कमरा लेकर रहते हैं।


तौकीर अभी कुछ दिन हुए ही आये जबलपुर। अभी कुंवारे हैं। 28 साल उम्र है। जबलपुर अच्छा शहर लगा उनको।

दोनों को अपने नाम का मतलब नहीँ पता।

और बात करते लेकिन दोनों 'अच्छा चचा, अब चलें शायद कुछ बिक जाये'- कहते हुए साइकिल स्टैंड से उतार कर चलते बने।

लौटते हुए देखा एक बच्ची तेजी से चलती हुई जा रही थी।ध्यान से देखा तो याद आया कि वही बच्ची थी जिसका पैर जला था और जिसको साईकिल पर लेकर हम अस्पताल गए थे मरहम पट्टी कराने। देखा तो घाव भर गया था। पर जले के निशान बकाया थे। पूछा तो इशारे से बताया उसने कि दवा लगाती रही। ठीक हो गया घाव।

मन्दिर की तरफ से आ रही थी वह। हाथ में कुछ पैसे भी थे।शायद शनिवार के दिन हनुमान मन्दिर में मांगने आई हो। इसका मतलब मंगलवार/शनिवार को शायद फिर दिखे। देखेंगे। हो सका तो उसके घर जाकर उसकी बीमारी के बारे में पता करेंगे। वह बोल क्यों नहीं पाती।

बच्ची जल्दी में थी। चली गयी। हम भी वापस आ गए। लंच के इंतजार लेटे हुए पोस्ट लिख रहे हैं। खिचड़ी बन रही है। खाना हो तो आ जाइए। दही,पापड़ और आचार भी होगा। घी नहीँ मिलता मेस में।

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