Monday, September 07, 2015

आप मुस्करायेंगे दुनिया बेहतर लगेगी

आज मेस के बाहर निकलते ही पुलिया के पास देखा एक लड़का साइकल पर सवार एक डीसीएम ट्रक के डाले के पास लटकी जंजीर पकड़े ट्रक के साथ ही चला जा रहा था। इससे उसको पैडल मारने से तो मुक्ति मिली पर बहुत खतरनाक है यह। कभी भी ट्रक अचानक रुका तो दुर्घटना हो सकती है। हम भी जब पहले साइकिल चलाते थे तब ऐसा ही करते थे। ट्रक वाला मना करता था। डांटता था तब छोड़ते थे।

किसी दूसरे के सहारे भागने में ऐसा ही होता है। हमेशा दुर्घटना की आशंका रहती है। फिर वह चाहे आदमी हो या कोई अर्थव्यवस्था। अभी चीन और कुछ साल पहले अमेरिका की अर्थव्यवस्था हिली तो दुनिया हिल गई। इनमें वो देश ज्यादा हिले जो इनसे ज्यादा गहराई से जुड़े थे।

बस स्टैंड पर छट्ठू सिंह अपने साथियों के साथ बतिया रहे थे। नमस्ते किया तो 'जय बाबा भोलेनाथ' बोलकर अभिवादन किया। सब लोग खड़े टाइप हो गए। बोले आइये बैठिये। हम बोले -आप लोग बैठिये। हमको आगे जाना है। भगवती प्रसाद दीक्षित उर्फ़ घोड़े वाला का डायलॉग भी याद आया अभी-अभी-'आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे हैं।'

ओवरब्रिज के नीचे लोगों के चूल्हे जल चुके थे। एक आदमी लोहे की पत्ती से पूरी बटलोई में ऊपर तक भरे उबलते चावल को हिला रहा था। चावल बहुत छोटे थे। मानों आम आदमी के सपनों से टूटे-फूटे से। थोड़ा सा फुदकते फिर लगता है हौंसलों की गर्मी के अभाव में पस्त होकर बैठ जाते। पूछा तो बोले- यह चावल नहीं है।कोदो हैं। हमको सुदामा चरित की पंक्तियाँ याद आई:

कोदों सवां जुरतो भरि पेट जो
चाहति नहिं दधि दूध मिठौती।

पीछे लोग चिलम,बीड़ी फूंकते हुए खाना बना रहे थे। पूछने पर महिला बोली- सबका प्रसाद चल रहा है।भोले भंडारी और काली माई का भी।

आगे देखा दीपा पढ़ रही थी। कुछ याद कर रही थी। उसके पापा खाना बना रहे थे। मुझे देखा तो नमस्ते करके बोली-आइये अंकल बैठिये। पालीथीन की बोरी जमीन पर बिछा दी। हमने कहा-हम लौटकर आते हैं तुम्हारे लिए बिस्कुट लेकर तब बैठेंगे। बोली-नमकीन वाले लाइयेगा। चलते हुए देखा कि उसने बाल धोये थे लेकिन शायद पानी से अच्छे से साफ़ नहीँ किये। उलझे थे बाल।

चाय की दुकान की तरफ जाते हुए देखा तो रमेश लौट रहे थे। बोले- जल्दी आया करो।हमने कहा-आओ फिर पिलाते हैं चाय। वो कुत्ते के साथ लौटे। हमने दो चाय ली । एक खुद के लिए दूसरी रमेश के लिए। अपनी चाय में से आधी उसने एक और साथी को दी।


चाय पीते हुए उसने बताया कि दारू रोज पीते हैं। 60 रूपये की । साथ वाले के लिए बोला- जे तो नीट पीते हैं। चाय वाले के लिए बताया- इनको कम न समझो। 25 लाख का पानी पाउच का प्लांट लगाया है। चाय वाले पूछा-पानी के कन्टेनर जरूरत हो तो बताना।

आगे देखा एक महिला झुकी-झुकी अख़बार बांच रही थी। मुझे डॉ अमर कुमार का एक संस्मरण याद आया जिसमें मास्टर जी ने उनको सजा देते थे मुर्गा बनने की तो वो मुर्गा बने बने ही टांगों के बीच रखकर अख़बार पढ़ते थे।

डॉ साहब की बात से याद आया कि वे हमसे और तमाम ब्लागर साथियों से कितना लगाव रखते थे। डा.अमर कुमार हौसला लोगों की आफ़जाई में करने में बहुत उदार थे। जर्रे को आफ़ताब बताने में भी हिचकते नहीं थे। मुझे अभी भी यह सपना सरीखा लगता है कि वे कभी मुझसे कहा करते थे – 'गुरुदेव, जब मैं आपका लिखा पढ़ता हूं तो मेरा मन आपसे मिलने का होता है। मैं एक बार आपको छुकर देखना चाहता हूं।'

डॉ साहब की याद आते ही उनसे जुडी तमाम यादें फड़फड़ाकर ताजा हो गयीं। पुरानी यादें भी फेसबुक के स्टेट्स की तरह होती हैं। जरा सा छूते ही स्मृति पटल पर सबसे आगे आकर खड़ी हो जाती हैं। डॉ साहब से सबंधित लिंक यह रही। http://fursatiya.blogspot.in/2011/09/blog-post.html

एक दुकान सौरभ प्रोविजन से दीपा के लिए नमकीन बिस्कुट लेकर लौटा। दुकान पर एक सिक्का डालकर बात करने वाला फोन रखा था। मोबाईल के जमाने में अब बहुत कम लोग फोन करते हैं इससे। कभी-कभी क्रास कनेक्शन हो जाता है तो पैसे बर्बाद हो जाते हैं।

लौटे तो दीपा को उसके पापा पानी गर्म करके नहलाने की तैयारी कर रहे थे। कोई जुएं मारने की पुड़िया लाये थे। उसको बिस्कुट का पैकेट दिया तो थैंक्यू अंकल बोली।

उसके पापा उसको बिठाकर नहलाने लगे। बड़े कंघे से बाल काढ़ते हुए। बीच-बीच में डांटते भी जा रहे थे। हिलो नहीं। ठीक से बैठो। बच्ची बेचारी पिता जैसा कह रहा था करने की कोशिश कर रही थी।

उनको छोड़कर हम चले आये। अब चलते हैं दफ्तर। आप मजे से रहना। खूब खुश।सब लोग समय पर नाश्ता करना। खाना खाना। जिसको दवाई लेना हो वो समय पर दवाई ले। पानी पिए। जैसे ही मौका मिले तो मुस्कराये। मुस्कान सबसे खूबसूरत सौंदर्य प्रसाधन है। आप मुस्करायेंगे दुनिया बेहतर लगेगी।

ठीक न। चलो अब बॉय। अच्छे से रहें।।

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