Wednesday, September 30, 2015

हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं

शाहजहांपुर में हम 1992 से 2001 तक रहे। कई कवि और शायरों से परिचय रहा वहां। उनमें शाहिद रजा मेरे सबसे पसंदीदा शायर थे। आज याद आया कि हमारे घर में एक शाम को महफ़िल जमी थी 94-95 में कभी। उसमें शाहिद रजा ने कुछ शेर और एक गजल पढी थी। उनको मैंने टेप किया था। संयोग से वे नेट पर भी डाले थे। उनको सुनते हुये कई आवाजें ऐसे भी सुनाई दीं जो अब शान्त हो गयीं। पंखे की आवाज में किये गये इस टेप में शाहजहांपुर के कवि दादा विकल जी की वाह-वाह करती हुयी आवाज भी है जो शहीदों की नगरी शाहजहांपुर के बारे में कहते थे:
पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सर शहीदों के यहां बोये हुये हैं ।
शाहिद रजा के शेर यहां पोस्ट कर रहा हूं। आगे टिप्पणी में आडियो का लिंक भी। जो लोग वहां उस दिन थे वे उसको महसूस कर सकेंगे और आवाज भी पहचान सकेंगे।  

 
हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं
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मौसमें बेरंग को कुछ आशिकाना कीजिये
आप भी जुल्फ़ों को अपनी शामियाना कीजिये।

दिल की ख्वाहिश है ख्यालों में तेरे डूबे रहें
जेहन कहता है कि फ़िक्रे आबो दाना कीजिये।

यकीन खत्म हुआ है, गुमान बाकी है
बढे चलो कि, अभी आसमान बाकी है ।

जरा सा पानी गिरा और जमीन जाग उठी
हमारी मिट्टी में लगता है अभी जान बाकी है।

तलाश करते रहो फ़ितनागर यहीं होगा
अभी तो बस्ती का पक्का मकान बाकी है

हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं
हमारे दम से तेरी दास्तान बाकी है ।

तू उसके डर से अब डरना छोड़ दो ’शाहिद’
तीर खत्म हुये बस कमान बाकी है।

जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये
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जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये,
हम अपने दर्द का एक तर्जुमान छोड आये।

हमारी उम्र तो शायद सफर में गुजरेगी,
जमीं के इश्क में हम आसमान छोड आये।

किसी के इश्क में इतना भी तुमको होश नहीं
बला की धूप थी और सायबान छोड आये।

हमारे घर के दरो-बाम रात भर जागे,
अधूरी आप जो वो दास्तान छोड आये।

फजा में जहर हवाओं ने ऐसे घोल दिया,
कई परिन्दे तो अबके उडान छोड आये।

ख्यालों-ख्वाब की दुनिया उजड गयी 'शाहिद'
बुरा हुआ जो उन्हें बदगुमान छोड आये।

शाहिद रजा, शाहजहांपुर

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