Sunday, September 13, 2015

जो फरा सो झरा

रेल जबलपुर से चलकर हाऊबाग रेलवे स्टेशन पहुंची।लोग कूदकर उतरे। फिर दूसरी ट्रेन में बैठने के लिए। यह ट्रेन फिर जायेगी जबलपुर। वहां से लौटकर फिर हाऊबाग़ होते हुए आगे जायेगी। मतलब एक टिकट में एक स्टेशन 2 बार देख लिया।

प्लेटफार्म पर एक महिला कंघी कर रही है। साथ का लड़का सा आदमी बीच से मांग निकाल रहा है। प्लेटफार्म पर एक आदमी सोया है। करवट लेता है तो कम्बल हिलता है। लगता है कोई क्रांति होगी। पर आदमी दूसरी करवट लेकर सो जाता है। क्रान्ति छलावा साबित होती है।

डब्बा भर गया है। लोग आपस की सवारियां सहेज रहे हैं। एक आदमी एक महिला से पूछता है- डुकरिया कितै गयी। एक बुजुर्ग महिला इधर-उधर ताक रही है। उसके बगल की बच्ची मोबाइल पर कुछ कर रही है। क्या पता वह भी मेरी तरह स्टेट्स लिख रही हो।


एक बच्चा खिड़की पर बैठा था। हाथ खिड़की पर रखे हुए। अचानक खिड़की उसकी हथेली पर गिरी। कोई लॉक या सिटकनी नहीं लगी थी। बस ऐसे ही फंसी थी खिड़की। गाडी हिली तो नीचे आ गयी। कौन ठीक करवाये। रेल लाइन बन्द ही होने वाली है।

खिड़की हथेली पर गिरते ही बच्चा बहुत तेज चिल्लाया। खिड़की फौरन ऊपर की गयी। बिलखते हुये रोता रहा बच्चा कुछ देर। दूध की बोतल दे दी गयी उसके मुंह में। बिलखता हुआ बच्चा सुबकते चुप हो गया। फिर मुस्कराने लगा। हथेली थोडा सूझ गयी है। पर दर्द कम हो गया है। अच्छा हुआ कि ऊँगली पर नहीं गिरी खिड़की।

ट्रेन मोड़ पर धीमी हुई है। कई जंगली रंगबिरंगे फूल बाहर खिले हुए हैं। गुडमार्निंग जैसा करते हुए। एक पेड़ के नीचे कुछ बच्चियां खेल रही हैं। एक टूटी दीवार को देहरी सरीखा बनाये दो लड़कियां बैठी ट्रेन को देख रही हैं। एक मंजन करते आदमी ने ट्रेन को देखते हुए जमीन पर कुल्ल्ला कर दिया।


पटरी के किनारे-किनारे दीवार पर डॉ करवाल की विज्ञापन मोहरें पुती हुई हैं-खोयी हुई ताकत फिर से प्राप्त करें। एक दुकान पर लिखा हुआ है-अर्जी वाले हनुमान जी। हर तरफ प्रचार की धूम है। बिना विज्ञापन के कोई पूछता नहीं आजकल किसी को।

अगला स्टेशन ग्वारीघाट है। कई सवारियां उतर गयीं। समोसे वाला आवाज लगा रहा है-समोसे दस के दो।
हम बाहर की सीनरी देखते हुए पोस्ट टाइप करते जा रहे हैं। फिराक साहब का शेर याद आ रहा है:
वो पास भी हैं करीब भी
मैं देखूं की उनको याद करूँ।
एक घर के बाहर बनी पगडण्डी पर भागती हुई बच्ची ट्रेन को देखने के लिये पटरी के पास आती है। खेतों में कांस के पौधे भाले की तरह खड़े हैं। भक्क सफेद। लगता हैं इन सफेद भालों से ही अँधेरे का संहार किया गया होगा।


जमतरा घाट पर सौंदर्य की नदी नर्मदा के दर्शन होते हैं। यात्री सीट से उठकर नर्मदे हर बोलते हुए नमन करते हैं। कुछ लोग सिक्के फेंकते हैं। दूसरी तरफ सूरज भाई नर्मदा में नहाते हुए मिलते हैं। जिस जगह वह अपनी किरणों के साथ नर्मदा स्नान कर रहे हैं वहां पानी चमक रहा है। नर्मदा प्रफुल्लित हैं। सूरज की किरणें खिलखिला रही हैं जलक्रीड़ा करते हुए। सूरज भाई जल डुबकी लगाकर आसमान में अपनी ड्यूटी बजाने लगे। पर किरणें वहीं नर्मदा की गोद में इठलाते हुए खेल रहीं हैं। नर्मदा भी उनको दुलराते हुए आगे बढ़ती जा रही हैं।


बाहर जंगल पसरा हुआ है। साथ का यात्री बताता है ये पेंड़ो पर जो बौर से दिख रहा है वे सागौन के पेड़ हैं। कुछ दिन में फल निकलेंगे इनमें। फिर झर जायेंगे। जो फरा सो झरा।

ट्रेन बरगी स्टेशन पर पहुंच गयी है। बाहर पटरियों के दोनों तरफ बैठे यात्री बीड़ी फूंकते हुए बतिया रहे हैं। एक यात्री पूछ रहा है-अबे चलती क्यों नहीं गाड़ी आगे। पंक्चर हो गयी क्या।

एक बच्ची अपना पाठ याद कर रही है। किताब से पढ़ रही है-ईश्वर ने हमें बचाया। उसकी मम्मी अनुवाद बताती हैं-गॉड सेव्ड अस।

ट्रेन भी यह सब देखते/सुनते हुए आगे चली जा रही है। खटर-खट,खटर-खट, खटर-खट करती हुई।

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