Tuesday, September 08, 2015

'नारद की चिंता' -सुशील सिद्धार्थ


Sushil Siddharth नाम मैंने सुन रखा था। श्रीलाल शुक्ल के साथ लिये कुछ इंटरव्यू पढ़े थे उनके। इसके अलावा और कुछ जानकारी नहीँ थी उनके बारे में। उनका लिखा कोई लेख भी ध्यान नहीँ था।

पहली बार उनसे तब बात हुई जब वे अपने इलाज के सिलसिले में अस्पताल में भर्ती हुए और यह खबर शायद संतोष त्रिवेदी ने साझा की थी। बीमारी की खबर के साथ उनका फोन नम्बर भी था।नम्बर था तो उनको शुभकामनाएं देने के बाद उनके फेसबुक खाते ...को देखना शुरू किया। यह हिंदी साहित्य की परम्परा के अनुरूप ही था जिसके अनुसार साहित्यकार पर ध्यान तब ही जाता है जब वह बीमार होता है या फिर उसको कोई इनाम मिलता है।कभी-कभी ध्यान दिलाने के लिए इनाम लौटाना भी काम आता है पर उसके लिए इनाम मिलना भी तो चाहिए।

उनकी गतिविधियाँ और अवधी की उनकी कवितायें पढ़ीं। पर पता लगा कि अवधी सम्राट वंशीधर शुक्ल और पढ़ीस जी के इलाके वाले भाईसाहब की ख्याति व्यंग्यकार के रूप में ज्यादा है।

व्यंग्यकार से पूछकर उनकी किताब 'नारद की चिंता' मंगाई गई। किताब मंगवाने में काम भर के करम हो गए। नेटबैंकिग से भुगतान की सुविधा नहीं थी ऑनलाइन बुकिंग में। अंतत: बेटे की शरण में गए। बेटे ने फौरन किताब अपने कार्ड से भुगतान करके बुक करवा दी। हमने आल्हादित होकर सोचा:

'जिनके लड़िका समरथ हुइगे उनका कौन पड़ी परवाह।'

अब यह अलग बात कि वर्षों पहले का सरिता/ मुक्ता में पढ़ा विज्ञापन- 'क्या आप मांग कर खाते हैं' इतना हावी था कि किताब के पैसों में चाय पानी के भी जोड़कर बेटे को फौरन भेज दिए। बेटे ने भी पुत्र धर्म का पालन करते हुए कहा-अरे पैसे भेजने की क्या जरूरत थी।

किताब बुक करवाने के बाद कुछ दिन बेकली रही। कुछ देर हुई आने में। फिर भूल गए। जैसे ही भूले तो एक दिन सुखद आश्चर्य के रूप में किताब पधार गई।यह भी लगा कि सुखद आश्चर्य के लिए भूल जाना भी अच्छा उपाय है।

किताब मिलते ही हमने उसको खोला और बीच से पढ़ना शुरू किया। यह कुछ ऐसे ही जैसे कोई किसी के घर जाए तो सीधे उसके आँगन में पहुंच जाये। अब चूँकि आँगन तो रहे नहीं सो आप आँगन की जगह किचन पढ़िए या फिर मन करे तो बेडरूम। यह भी कह सकते हैं कि किसी से मिलते ही उसके दिल तक पहुंचने की कोशिश करें। जो भी समझना हो समझ लें। पूरी छूट है आपको। सुझाव हमारा, चुनाव आपका।

अब बीच का जो पन्ना खुला वह 'आदत' लेख था। उसमें भी सबसे जो वाक्य पढ़ा वह यह था--'आदत हो जाये तो बिना सिगरेट या चाय के प्रेशर नहीं बनाता, बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीं होती।'

'बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीं होती।' पढ़ते ही हम तड़ से मुरीद हो गए लेखक के।(बतर्ज आधा गांव - ने देखा और तड़ से आशिक हो गयी) हमको भड़ से राग दरबारी की पंक्ति याद आई -'वे हंसे और आगे का काम भांग ने सम्भाल लिया।' यह भारतीय नौकरशाही/समाज का विद्रूप है। लोग काला धन कमाते हैं। प्रवचन सुनकर उनको लगता है पच गयी कमाई। प्रवचन काली कमाई का हाजमोला है। यह भी कि प्रवचन सुनने वालों में बहुतायत उनकी होती है जो काली कमाई करते हैं। या फिर यह कि प्रवचन बाबा अपना प्रवचन फंदा उन पर डालते हैं जिनके पास काली कमाई की सुविधा हो। सबके लिए 'विन-विन' स्थिति।

संयोग कि सबसे पहला वाक्य ही जो पढ़ा उसमें बहुकोणीय व्यंग्य दिखा। पहली पढ़न में ही मुरीद हो जाने जैसा भाव जगा। पहली नजर में मुरीद होना पहले प्यार सरीखा होता है। सब कुछ अच्छा-अच्छा सा लगता है। फिर कई लेख पढ़े। बीच-बीच से पढ़ते हैं। सोचते हैं कि उसके बारे में लिखें लेकिन लिखना स्थगित हो जाता है।

किताब पढ़ते-पढ़ते सुशील जी के बारे में और भी काफी कुछ जानने को मिला। बेहतरीन वक्ता हैं। वलेश (व्यंग्यकार लेखन समिति) में व्हाट्सऐप पर जो ग्रुप बना है उसमें उनके वक्तव्य मैं जरूर सुनता हूँ।बहुत पढ़े-लिखे हैं। कढ़े भी कम नहीं हैं।सघन जीवन अनुभव की बानगी उनके वक्तव्यों में झलकती है।ग्रुप के एडमिन हैं सो शरारत-संगत में भी अपना भरपूर योगदान करते रहते हैं।

लेखन में मौके के हिसाब से अपने पढ़े हुए उद्धरण पढ़वाते रहते हैं। लेकिन कभी-कभी यह उद्धरण बहुलता ऐसी लगती कि मिलन के क्षणों में आप अपने संगी से किसी दूसरे व्यक्ति की तारीफ़ करने लगें या फिर सरपट चलती गाड़ी के सामने अचानक कोई स्पीड ब्रेकर आ जाए।

किताब पढ़ते हुए और सुशील सिद्धार्थ के बारे में जानते हुए अपनी और हिंदी साहित्य की स्थिति पर भी तरस आया। काम भर का पढ़ा लिखा होने के बावजूद मैं अपने समय के एक अच्छे लेखक के बारे में इतना कम जानता हूँ कि उसकी पहली किताब 50 पार का हो जाने के बाद पढ़ रहा हूँ। व्यंग्य हमारे लिए परसाई, जोशी, श्रीलाल और रवीन्द्रनाथ त्यागी से होते हुए ज्ञान देहरी पर ठिठका खड़ा है। किसी और को पढ़ते भी हैं तो इस मंशा से कि पढ़कर फटाक से ख़ारिज करें। बवाल कटे। आलोक पुराणिक जरूर बार-बार सामने आते रहते हैं। नियमित लिखते और छपते रहने के चलते उनको पढ़ना होता रहता है।

सुशील सिद्धार्थ जी की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में यही पता है कि किताबघर में नौकरी करते हैं। दिल के बीमारी झेल चुके हैं। मुस्कराते हैं तो हसीन लगते हैं। बातचीत में कभी हंसते हुए सुनता हूँ तो लगता है और भी खूबसूरत लगते होंगे।

सुशील सिद्धार्थ से मिला नहीं मैं। लेकिन अब चूंकि उनके बारे में लिख रहा हूँ तो उनसे नजदीकी जाहिर करना जरुरी है। उसका एक सरल और कम खर्चीला तरीका यह जाहिर किया जाए कि हममें और उनमें किया साझा है। तो हममें और उनमें जो साझा है वह यह कि हम लोग श्रीलाल शुक्ल के साझा मुरीद रहे। बड़े होने और लखनऊ के पास रहने के कारण वे ज्यादा सानिध्य सुख पाये शुक्ल जी का यह उनका सौभाग्य। दूसरी बात यह कि हम लोग एक ही इलाके के हैं। लखनऊ को केंद्र मानकर अगर 100 किमी की त्रिज्या का वृत्त बनाया जाये तो हमारे गांव जरूर आ जाएंगे।

और भी तमाम बातें साझा बाते हैं बताने को लेकिन हमें अचानक परसाई जी के संस्मरण लिखने के अंदाज ने डिस्टर्ब कर दिया। लोग जब किसी के बारे में लिखते हैं तो दूसरे के बारे में लिखते हुये सारी रौशनी अपने ऊपर फेंकते रहते हैं। परसाई जी कभी ऐसा नहीं करते थे। जबलपुर में रहने का नुकसान हुआ यह।

और बाकी बातें बाद में। फ़िलहाल मुझको ज्ञान चतुर्वेदी जी की कही बात याद आ गई। उन्होंने कहा था -हमको जो हैं उससे बेहतर होना है। बेहतर पिता, बेहतर पति, बेहतर लेखक और बेहतर .........होना है। बाकी सब बेहतरी थोडा मुश्किल है सो मैं एक बेहतर पाठक बनने की कोशिश करते हुए उनके लेख आदत के कुछ उद्धरण आपको पढ़वाता हूँ:

1.आदत और आदमी का चोली दामन का साथ है।
2.आदत हो जाए तो बिना सिगरेट या चाय के प्रेशर नहीं बनता, बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीँ होती।
3.आदत पड़ जाए तो हर सांस लेता हुआ आदमी खुद को जिन्दा समझता रहता है।
4.आदत चिंतन का परिवार नियोजनी करण कर देती है।
5.बहुत सी भारतीय पत्नियां पतियों की क्रूरता को आदत के खाते में डालकर मुस्कराती रहती हैं कि अरे इनकी तो आदत है,अब कहां तक सोचूं।
6.आदत भ्रमों और गलतफहमियों की अम्मा है।
7.गुलामी की आदत पड़ जाए तो आजादी मिलने पर समझ नहीं आता कि इसका क्या करें। अमेरिका के हाथ बेंच दें या नए पूँजीवाद के यहां गिरवी रख दें।
7.आदत के कारखाने में उमंगे ऊब की शक्ल में मिलती हैं।
8. विवाह के कुछ वर्षों बाद एक -दूसरे की आदत ही पति-पत्नी में नीरसता पैदा करती है।
9.स्वभाव के सिंह द्वार पर आदत का ताला पड़ जाए तो नवीन प्रयोगों, विस्मयों का प्रवेश वर्जित हो जाता है।
10.आदत अप्रत्याशितों का विलोम है।
11.आदत से स्तुति तोता रटन्त में ढल जाती है।
12.आदतें अनादि-अनन्त हैं। आदतें ईश्वर हैं या ईश्वर भी एक आदत है।

अभी हाल में जिसको पढ़ना शुरू किया उसके मूल्यांकन के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन ऐसे ही एक बार बातचीत में सुशील सिद्धार्थ के बारे में अपनी राय बताते हुए Nirmal Gupta ने कहा- इस आदमी को अपनी प्रतिभा और लेखन के मुकाबले प्रसिद्धि और सम्मान बहुत कम मिला। मतलब लेखन/प्रतिभा और उपलब्धि का वज्रगुणन हो गया। गाड़ी उलार हो गयी। एक लिहाज से यह हिंदी साहित्य की परम्परा के अनुरूप ही है। लेखक को उनके लेखन के हिसाब से समय रहते सम्मान मिल जाता है तो फिर वह उतना महान नहीं माना जाता।

यह जो लिखा वह बस ऐसे ही। यह न 'नारद की चिंता' की समीक्षा है न ही सुशील सिद्धार्थ का मूल्यांकन।जो कुछ उनके बारे जाना, पढ़ा उसका बस ऐसे ही घालमेल है।

सुशील जी को उनके सक्रिय लेखन और उसके लिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए मंगलकामनाएं।

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