Saturday, September 19, 2015

हर आदमीं के अंदर एक अमेरिका होता है

उस दिन हम सुबह 5 बजे ही 'इकल' लिए थे टहलने के लिए। अँधेरा था 'सरक' पर। बिजली के बल्ब जल रहे थे। पटेल की चाय की दुकान खुल गयी थी। दू ठो नमकीन बिस्कुट का पैकेट लेकर हम निकल लिए आगे।

रस्ते में रामफल का घर मिला। उनकी पत्नी बाहर ही बैठी थी। बोली तबियत ठीक है। गुड्डू का फल का काम ठीक चल रहा है।

सड़क पर कई महिलाएं पूजा के लिए निकलीं थीं। तीज की पूजा के लिए हाथ में लोटे में पानी लिए मन्दिर की तरफ जा रहीं थीं। एक मन्दिर में खूब महिलाएं इकट्ठा थीं।पूजा कर रहीं थीं। दो महिलाएं सड़क पर बतियाते हुए जा रहीं थीं। शायद उनका व्रत न हो। एक के कान में सोने के झुमके खूब चमक रहे थे। गाना याद आ गया-
'झुमका गिरा रे,बरेली के बाजार में।'

तीज का व्रत महिलाएं अपने घर परिवार के सदस्य की सलामती के लिए रहती हैं। अपने समाज में भूखे रहकर घर के लोगों की रक्षा के लिए करने वाले सारे ही व्रत स्त्रियों के पल्ले से बांध दिए गए हैं। देर तक भूखी तो रहती हैं। एक दिन नहीं खायेंगी तो क्या हो जाएगा। परिवार की सलामती के साथ तेज भी मिलेगा चेहरे पर।


शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री दूसरे परिवार से आने के कारण कमजोर स्थिति में रही तो सारे कठिन काम उसके माथे मढ़ दिए गए। अधिकतर स्त्रियां अपनी इस स्थिति को ख़ुशी से ग्रहण करती हुई सी लगती हैं। 'होलियर दैन दाऊ' वाला भाव। जिनको ये व्रत बकवास लगते हैं वे भी रह ही लेती हैं।

आधारताल के लिए इस बार दूसरे रस्ते गए। लोग बोले लम्बा है। हम सोचे इसी से जाएँ। शार्टकट तो सब जाते हैं। हम जरा लांग कट मारे।

एक बिजली के खम्भे के पास कुछ लोग बतकही कर रहे थे। हम रास्ता पूछने के बहाने उससे बतियाने लगे। लोग एक दुसरे की आपस में खिंचाई कर रहे थे। हम बतियाने लगे तो हम भी शामिल हो गए उसमें।
इस बीच एक मोटर साइकिल सवार खूब सारे कमल के फूल हैंडल पर लादे वहां आया। खुद का तालाब है उसका। उसमें से फूल तोड़कर जा रहा था बाजार। पांच रूपये का एक के हिसाब से बेंचने। हमने फोटो लेने के लिए पूछा तो बोला -पैसे पड़ेंगे। हमने कहा-दे देंगे। फिर हम खींचने के पैसे लेंगे। इस पर वह हंसने लगा। उसकी हंसी फोटो खींचने की अनुमति थी।


वह मोटर साइकिल वाला चला गया। उसी गली से महिलाओं का एक और दल निकला पूजा के लिए जाते हुये। वहां बतियाते हुए लोगों में से दो लोग खड़े हुए तो उनका भी फोटो 'हैंच' लिए। आगे बढ़े।

घरों के बाहर महिलाएं झाड़ू लगाती, देहरी पर बैठे दिखीं। एक बच्चा एक बच्ची के साथ खेलता, धक्कम-मुक्का करता सड़क पर दौड़ रहा था। भाई बहन रहे होंगे शायद।

बिरसामुंडा चौराहे पर चाय की दुकान पर एक आदमी ने वहां बैठे एक कामगार को थपड़िया दिया। हम जब पहुंचे तो उसका थपड़ियाने के बाद का प्रवचन चल रहा था। हमने जब पूछा कि क्यों मारा इसको तो उसने बताया-' अरे भाईसाहब, हम कल अपनी वाइफ के साथ खड़े थे। ये साला दारु पीकर हमारे पीछे खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। कल कुछ नहीं बोला मैं। वाइफ साथ में थीं। लेकिन हमने सोच लिया था छोड़ेंगे नहीं इसको।' यह कहते हुए उसने अपना थप्पड़ कर्म सही ठहराया।

मार खाने वाले आदमी ने मिमियाते हुए अपना प्रतिवाद करना चाहा। इस पर वह फिर उसको मारने के लिए झपटा। साथ के आदमी ने मार खाये आदमी को प्रतिवाद करने से घुड़कते हुए मना किया। थपड़ियाने वाला वीर बालक चला गया।


इसके बाद मारे गए व्यक्ति ने बताया--हम काम के लिए खड़े थे। उधर लोग काम वाले लोगों को लेने के लिए खड़े थे। हम वहीं जाकर खड़े हो गए। इस पर इन्होंने मुझे आज मारा। देखिये आँख के नीचे निशान पड़ गया।

कन्नी वसूली लिए मजूरी के लिए निकले एक आदमी को दूसरा इस शक के आधार पर पीट देता है कि उसने उसकी पत्नी के साथ हुई बातें सुनने की कोशिश की। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे अमेरिका ने इराक को इस शक के आधार पर बम-बर्बाद कर दिया कि इराक के पास रासायनिक हथियार हैं।

हर आदमीं के अंदर एक अमेरिका होता है जो अपने से कमजोर को इराक समझकर अपना अमेरिकापन दिखाता है।

दयनीय आवाज में अपनी पीड़ा बयान करते हुए उसने कहा- हमको मारकर बड़ा बहादुर बन रहे। कोई तुमसे तगड़ा मिलेगा तब समझ आएगा।

उस मार खाये आदमी की आवाज सुनकर निराला की कविता पंक्ति याद आई:

'वह मार खा रोई नहीं।'

चौराहे पर शिव पार्वती की मूर्तियां बिक रहीं थीं। चाय की दुकान पर साइकिलों पर अख़बार लादे हॉकर खड़े थे। अख़बार बांटने के लिए निकलने के पहले चाय पी रहे थे। एक बच्चे ने बताया कि वह बीएससी कर चूका है । अब सोच रहा है आई टी आई का फार्म डाल दे।

आई टी आई हाईस्कूल/इंटर के बाद करते हैं। यह बच्चा बीएससी के बाद करने की सोच रहा। यह तो कुछ नहीं।खबर आई थी कि उत्तर प्रदेश में सैकड़ों पी एच डी किये लोग चपरासी की नौकरी के लिए अप्लाई किये हैं जिसकी अहर्ता 5 पास है।

लौटते हुए मुन्ना की दुकान पर हवा भरवाये। उनकी बोहनी हुई 4 रूपये से। चाय की दुकान पर रमेश के साथ चाय पी। फिर ओवर ब्रिज के नीचे बने दीपा के घर आये। वह अपने पापा के साथ खाना बना रही थी। पूड़ी के लिए लोई बना रही थी। चूल्हे में जो लकड़ी थी वह किसी खटिया का पावा था। धुंआ उठ रहा था।

हमने दीपा को बिस्कुट के पैकेट दिए। बताया कि हमारा जन्मदिन था उस दिन। उसने हैप्पी बर्थडे बोला। हमने पूछा कि शाम को तुम्हारे लिए चॉकलेट लायेंगे। कौन सी खाओगी। बोली -कैडबरीज वाली।

फिर शाम को ले गए थे चॉकलेट और एक घड़ी। उसके बाद का किस्सा तो आप बांच ही चुके हैं।

जन्मदिन पर सभी मित्रों की शुभकामनाओं का जबाब देते हुए आभार दे रहे हैं। अभी तक टाइम लाइन, व्हाट्सऐप वाली शुभकामनायें निपट गयीं। पोस्ट पर जो आई उनके लिए आभार देना है।


आपका दिन मंगलमय हो। शुभ हो।

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