Thursday, September 17, 2015

किसी ने अपना बनाके मुझको मुस्कराना सिखा दिया


कल जन्मदिन बीता -शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।

शुरुआत श्रीमतीजी के फोन से हुई। फिर बच्चों के फोन आये। फिर यादव जी का।यादव जी 75 के हुए पिछले महीने। हमारे परिवार के सब लोगों को बिना भूले जन्मदिन की बधाई देते हैं। उपहार भी। जबकि हमारे साथ कभी काम नहीं किये। उनके बारे में फिर।

इसके बाद एसएमएस, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर शुभकामनाओं का सिलसिला। दोस्त लोग हमको बधाई देने के लिए जगे थे। कल पैदाइश के लिहाज दे हमको बच्चा बनने का हक तो था इसलिए अपने लिए इतना प्रेम देखकर मन और मासूम हो गया।

सुबह 4 बजे Sushil Siddharth ने फोन करके शुभकामनाएं दी। हमारी नदी नहाईं फोटो व्यंग्यकारों के व्हाट्सऐप ग्रुप वलेस में लगा दी। अच्छा हुआ बचपन की फोटो नहीं थी कोई उनके पास वरना वो सूप में लेटी हुई कोई दिशा वस्त्र पहने फोटो लगा देते।

साइकिलियाने निकले तो लौटते में बूढ़ा माता बीच सड़क मिली। साइकिल देखकर रुक गयीं कि साइकिल निकल जाये तब सड़क पार करें। हम उनको देखकर रुक गए। फिर सड़क पर ही हाल-समाचार होने लगे। तबियत सबियत। फिर साइकिल से उतर गए और उनको पुलिया पर बैठाकर फोटो लिया। सर पर पल्लू रखकर फोटो खिंचाते हुए एक महिला ने मेरे बारे में दूसरे से पूछा--ई रमेश के साथ काम करत हैं का? रमेश जीसीएफ में काम करते हैं। जबाब मिला -न ई भैया वीएफजे में हैं।

बूढा माता से बात करते हुए मुझे अम्मा की याद आ गयी और फटाक से रोना भी (अभी भी यही हुआ)। लौटते हुए अम्मा से जुडी यादें दोहराता हुआ सोचता रहा कि अगर वो होतीं तो डगमग करती आतीं और --हॅप्पी बड्डे बोलते हुए सदा सुखी रहने का आशीष देतीं। दिन में गुलगुला बनाती। शाम को रोचना लगाती। दूध पिलाती। कह तो अब्बी भी रहीं होंगी जहां भी होंगी वहां से। पर दिख नहीं रहीं। देखने के लिए मुझे अतीत में ही जाना पड़ रहा है।

लौटने पर Alok Puranik काफी देर टेलिवार्ता हुई। हमें लगा कि वो कहेंगे कि व्यंग्य के हाल बड़े खराब है। अब जल्दी से व्यंग्य लेखन भी शुरू कर दो। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। बल्कि यह कहकर कि रोज का वृत्तान्त अच्छा लिख रहे यही लिखते रहने को कह दिया। संतोष त्रिवेदी का भी फोन आया। इसके बाद देश विदेश से दिन भर फोन आते रहे। देवांशु ने अमेरिका से वायदा कराया कि कानपुर पर लेख लिखेंगे हम।
फिर हमारे Amit Chaturvedi ने फोन किया और बताया कि जबलपुर की संस्था 'कदम' लोगों के जन्मदिन के मौके पर उनसे पौधा लगवाती है।चलेंगे? रात Rajeev Chaturvedi का भी सन्देश आया था इस बारे में। तब मैंने कहा था देखेंगे। पर अमित ने कहा तो फिर पक्का किया जाएंगे।

अमित के साथ नेहरू उद्यान गए। वहां ठीक 10 बजे 3 लोगों ने पौधा रोपा। उसके पहले 'कदम' संस्था के बारे में, उसके उद्देश्य के बारे में बताया। कुछ गीत हुए। पिछले कई सालों से यह संस्था वृक्षारोपण, स्त्रीपुरुष बराबरी, युद्ध विरोध, गरीब बच्चों की शिक्षा और समग्र शिक्षा के उद्देश्य काम कर रही है।

पौधा लगाते हुए जितना अच्छा लगा उससे खुशनुमा एहसास हुआ संस्था के काम करने के तऱीके को देखकर। ठीक 10 बजे। ठीक मतलब ठीक 10 पौधा रोज लगाया जाता है। एक भी सेकेण्ड की देरी नहीं। अगर रास्ते में हुए तो संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रस्ते में भी ठीक 10 बजे पौधा लगते हैं।

कदम संस्था के माध्यम से पौधा लगाते हुए जो सुखद अनुभूति हुई वह जिंदगी ने इससे पहले कभी नहीं हुई। मैंने वहां कहा भी-यह पौधा लगाते हुए मैं मन से हरा हो गया। आज पहली बार आया पर मुझे लग रहा कि यह संस्था मेरी अपनी है। आगे हर सम्भव सहयोग देने का प्रयास करूँगा ।

पौधे का नाम देने की बात चली तक एक साथी जिनका भी कल जन्मदिन था उनके बच्चे के नाम पर पौधे का नाम देवा रखा गया। पौधा नम्बर 4079 मेरे मन में भी लगा कल। इसके लिए अमित और राजीव जी का आभारी हूँ। संस्था के बारे में विस्तार से अलग से।

लौटते हुए ‪#‎CNEC‬ के चैनल हेड अमित ने लिखने के मामले में और गम्भीर होने की सलाह देने के पहले लेखन की तारीफ़ भी की। वो तो उसको वापस लौटने की जल्दी थी वरना चाय-वाय पिलाने के बहाने और तारीफ़ सुनते।
शाम को याद आया कि सुबह दीपा को वायदा किया था कि उसको एक घड़ी और चॉकलेट देने का वायदा किया था। बाजार गए। घड़ी मिली नहीं शोभापुर में। गोकलपुर गए। घड़ी और चॉकलेट खरीदी। उसको देने गए। उसके ठीहे तक पहुंचे कि चैन उतर गयी साईकिल की। वहीं अंधेरे में कई बार टटोल के चढ़ाई।

घर में कोई नहीं था उसके। बगल के कारखाने गए। आवाज लगाने पर बाहर आई दीपा। उसको चॉकलेट और घड़ी दी। हाथ में ग्रीस लगे हाथों से घड़ी उसके हाथ में बाँधी। पूछा बताओ कितना बजा है? उसने समय बताया नौ बजकर तीन मिनट। इतने बजे रात बच्ची अकेली थी। पिता रिक्शा चलने गया था।

बच्ची धन्यवाद देकर अंदर चली गयी। तब तक उसके पिता आ गए। आवाज लगाई तो घर गयी। हम भी पहुंचे पीछे। पूछा-देर क्यों हुई इतनी। बोला-दूर की सवारी थी। आते ही वह बर्तन मांजने लगा। हमसे बोला-साहब इसको सिखाओ कि घर के कुछ काम भी कर लिया करे।

हमने पूछा तो दीपा ने बताया कि बर्तन मांजने थे पर हम खेलते रहे। नहीं मांजे। बहुत मासूमियत से उसने यह बताया। मैं यही सोच रहा था कि सहज बचपन से वंचित यह बच्ची आगे चलकर कैसी बनेगी।

सड़क पर लैंप पोस्ट पर लाइट गुल थी। दीपा का पिता बोला-300 रूपये देने होंगे तब लगाएंगे आकर लाइट। जबलपुर स्मार्ट सिटी बनने वाला है। पता नहीं बनने के बाद यह बल्ब अपने आप ठीक हो जाएंगे या इसी तरह लेन देन से ठीक होंगे।

लौटे तो रेलवे क्रासिंग बन्द थी। वहीं खड़े हुए कुछ मेसेज के जबाब दिए। फिर क्रासिंग खुलते ही पैडल पर पैर रखकर भागे।

कमरे में आकर खाना खाया। तब तक डब्बे में केक आया चलकर कमरे पर।मेस में साथ रहने वाले साथियों ने केक कटवाया। सबने साथ मिलकर खाया। पार्टी उधार रही।

कल प्यार बेशुमार मिला। इतना अपना पन मिला कि गाना गाने का मन हुआ:
किसी ने अपना बनाके मुझको मुस्कराना सिखा दिया।
पर गाने के मामले में अपन का गला थोडा तंग है सो आप ऐसे ही समझ जाइए या यू ट्यूब से सुन लीजिये।
जन्मदिन के मौके पर सभी की शुभकामनाओं के प्रति मन से आभार। मित्रों के प्रेम से अविभूत टाइप हूँ।सबकी शुभकामनाओं के प्रति आभार। व्यक्तिगत तौर पर भी सबको धन्यवाद दूंगा। काम शुरू हो गया है। व्हाट्सऐप और फेसबुक मेसेंजर पर काम निपट गया है। बाकी पर अब लगना है।

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

पुनःश्च: कल के मौके पर एक हमारे बहुत ही प्यारे दोस्त ने मेसेज किया -आपको वायदा किया था कि आपके जन्मदिन से सिगरेट छोड़ दूंगा। सो आज से सिगरेट छोड़ दी।

कितना प्यारा उपहार है। मन खुश हो गया। अपने इरादे पर कायम रहना बच्चा।

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