Tuesday, September 08, 2015

सन्तोषधन इफरात में है अपने देश में

कल रात भौत जल्ली सो गए। सच तो यह कि सोये नहीं थे। बस जरा लेटे ही थे कि नींद ने हमला कर दिया और कब्जे में ले लिया। सोचे थे कि किताब उताब बांचेंगे। पड़ फिर निंद्रालीन हो गए। नींद का कब्जा कुछ ढीला हुआ रात 2 बजे। पलक पट खोले। मोबाईल नेट आन किया तो पटपटा कर स्टेट्स, नोटिफिकेशन बम चटाई बम सरीखे बरसने लगे।

अब जब नींद खुल ही गयी थी तो सब पढ़ गया।टिपियाया गया। गाना सुना गया। यह सब कर ही रहे थे कि उधर Mukesh Sharma हड़काने लगे कि इत्ती देर तक क्यों जग रहे। हम कुछ सफाई देते तब तक उन्होंने सजा सुना दी- विश्व सम्मेलन की रपट 3 पढ़ लो। हमने पढ़ा और टिपियाकर सो गए।

दूसरी क़िस्त की जगहर 5 बजे हुयी। फिर एक घण्टा भोर चिंतन के बाद साइकिल सवार होकर निकल लिए। सूरज भाई आसमान पर पूरे जलवे के साथ विराज मान थे। ऐसे लग रहा था कि बस भाषण की शुरुआत करने ही वाले हैं-'मितरों मैं बचपन से लोगों के चेहरे की तरह चमकना चाहता था। मैंने लोगों के चेहरे की मुस्कान से सीखा कि कैसे चमकना होता है।'


फैक्ट्री के सामने मोड़ पर एक जोड़ा स्त्री-पुरुष सड़क किनारे बैठा दिखा। वे आपस में कुछ बोल नहीं रहे थे। चुप थे। इससे कन्फर्म हुआ कि वे पति-पत्नी ही होंगे। समय के साथ पति-पत्नी मौन की भाषा में सम्वाद कुशल हो जाते हैं। हाव-भाव से सम्प्रेषण करने लगते हैं।

टहलने जाती महिला उसी तरह एक हाथ से साड़ी का पल्लू थामे टहलती जा रही थी जिस तरह महीने भर पहले जाते दिखी थी।

छट्ठू सिह के साथी मिले। छट्ठू सिंह नहीं दिखे। एक ने बताया-लूज़ हो गए होंगे।नहीं आये। बातचीत से पता लगा कि छट्ठू सिंह आर्थिक रूप से उत्ते मजबूत नहीं जितना बताते हैं। खाने की भी तंगी है शायद।बेटा अकेला कमाने वाला है। खाने वाले कई।


पटेल की चाय की दुकान पर पटेल जी मिले।दो बेटे बेरोजगार हैं। एक ने वेल्डर का काम किया है। दूसरे ने मेकेनिकल इंजीनियरिंग। दोनों को कोई काम नहीं मिला अब तक। चिंता इंजीनियर बेटे की पढ़ाई के लिए लिए गए लोन की है। ढाई लाख चुकाने हैं। हमसे बोले कहीँ लग सकें तो बताइयेगा। हमने कहा बताएंगे।

चाय की दुकान पर ही भरत से मिले। शांत, उदास, धीमी आवाज में बोलते हुए। 45 /46 की उमर है। एक लकड़ी की टाल में बेलदारी का काम करते हैं।पौने तीन सौ रोज और हफ्ते में दो दिन लकड़ी मिल जाती है ईंधन के लिए।


भरत 5 वीं तक पढ़े हैं। 20 साल का बेटा 8 वीं तक पढ़ा है। लोहा बाँधने का काम करता है। छल्ला बनाता है। 18 साल की बिटिया पापड़ बनाती है।

हमने पूछा प्रधानमन्त्री के बारे में जानते हो? जन-धन योजना में खाता है? 1 रूपये प्रति माह वाली बीमा योजना है तुम्हारे लिये। पता है इसके बारे में?

हाँ कोई नए बने हैं शायद मोदी। खाते के बारे में कुछ सुना तो है लेकिन ज्यादा पता नहीं। सुनकर यह लगा कि जिनके लिए कल्याणकारी योजनाएं चलती हैं वे ,बावजूद अरबों रूपये के प्रचार-प्रसार के खर्चे के, अक्सर उनके जीवन वृत्त पर स्पर्श रेखा तक डालने में असफल रहती हैं।

हमने भरत से पूछा-जिंदगी कैसी लगती है? खुश हो? कभी पिक्चर देखते हो? कभी देखी क्या?

जिंदगी में सुख-दुख तो लगे रहते हैं। कोई शिकायत नहीं हमें। पिक्चर कभी नहीं देखते। घर में बच्चे देखते हैं।
45/47 की उम्र में जब अपने यहां के सिनेमा नायक छैला बाबू बने अनगिनत दिलों की धड़कने बनने लायक युवा बने रहते हैं तब भरत जैसे लोग भी हैं जो अपनी उम्र से 20 साल बड़े दीखते हैं। सब दांत हिलते हैं। कुछ टूट गए हैं। मनोरंजन के किसी संस्करण से कोई परिचय नहीं । इसके बावजूद पूछने पर कहता है- जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। सन्तोषधन इफरात में है अपने देश में।

लौटते हुए देखा एक ड्राइवर ट्रेलर के डाले पर खड़ा कुल्ला कर रहा था। दूसरा मन्जनरत था। टाटा से सामान लाद कर आये हैं। रांची के रहवैया। 4 दिन लगे आने जमशेदपुर से।

शमीम नाम है ड्राइवर का। ट्रेलर खुद का है। 15 लाख का खरीदा। पहले दूसरे का ट्रेलर चलाते थे। फिर पैसा बचाकर खुद खरीदा। एक लड़का है। सउदिया गया है। वह भी ट्रक चलाता है।

ट्रेलर चलता-फिरता घर है। खाने-पीने, सोने का सब इंतजाम इसी में। हमारे देखते-देखते स्टोव जलने लगा उनका और कुछ पकने लगा। हम चले आये।

अब बहुत हुआ। चला जाए दफ्तर की तैयारी की जाए। आप मजे से रहिये। खुश रहिये। मुस्कराइए।यह सोचिये कि आपकी मुस्कराहट से किसी और की मुस्कराहट जुड़ीं हो सकती है।

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

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