Monday, September 28, 2015

मान गए यार तुमको

रात कब सोये पता नहीं चला। सुबह जगे तो समय देखने के लिए मोबाईल देखा। मोबाईल एकदम काला हो गया था। कब डिस्चार्ज होकर बन्द हो गया पता नहीं चला। इंसान के साथ भी ऐसा ही होता है। चलते-चलते कब 'शांत' हो जाए पता नहीं चलता।

चार्जर लगाते ही सुई सी लगी मोबाइल को। फौरन चमकने लगा। 5 बजा था। घर फोन किये। चलती ट्रेन में आवाज साफ सुनाई नहीं दी। पर सुकून इतने से ही मिल गया कि फोन उठा और बात हो रही है।

गाड़ी कटनी पहुंचे उसके पहले एक अख़बार वाला बच्चा अख़बार आया ट्रेन में। पत्रिका अख़बार का दाम 5 रुपया। हमने अखबार ले लिया। पर जब देखा कि दाम की जगह पेन की स्याही लगी हुई थी तब अचानक नागरिक बोध जागा। उससे पूछे कि यह गड़बड़ क्यों की। फिर अख़बार वापस करके पैसे वापस ले लिए। यह धोखा बर्दास्त नहीं करना।

बाद में और अभी भी यह सोच रहे कि अख़बार की जगह अगर खाने-पीने की कोई चीज होती या फिर अख़बार में हमारी कोई खबर होती तो क्या अख़बार वापस कर देते। न करते। पक्का न करते। अत: सिद्ध हुआ कि हमारा नागरिक बोध हमारी आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन शील होता रहता है।

कटनी पर उतरकर चाय पिए। स्टेशन की फोटो लेने की कोशिश किये लेकिन बैटरी लो होने की बात कहकर मोबाईल ने हाथ खड़े कर दिए। हम वापस आ गए डिब्बे में।

बाहर अँधेरा था। सुबह हो रही थी मगर आहिस्ता-आहिस्ता। क्षितिज पर आसमान नीचे कालिमा युक्त था। उसके ऊपर लालिमा छाई थी। लालिमा सूरज की अगवानी की घोषणा कर रही थी। सूरज का प्रसाद पहले उनको ही मिलता है जो ऊपर हैं। नीचे वितरण बाद में होगा। समाज के नियम प्रकृति पर भी लागू होते हैं।

डब्बे में लोग सोये हुए थे। सीटों की बीच की जगह पर लोग चद्दर बिछाये लेते-अधलेटे थे। कुछ गहरी नींद में भी। हमारे सामने एक युवा दम्पति नीचे सीट की बीच की जगह सो रहा था। पत्नी पति के सीने से सर लगाये सो रही थी। गाड़ी के हिलने के साथ जोड़ा हिल-डुल हो रहा था।आराम से सो रहा था। निश्चिन्त नींद।

सीट पर एक बच्चा बैठा था। कर्बी से चढ़ा था। बताया कि जबलपुर जा रहे हैं। सात में पढ़ता था। बीमार हो गया तो स्कूल छूट गया। बीमारी क्या यह पता नहीं। बस बुखार आता रहा।

बच्चा हाथ में फेंडशिप बैंड बांधे है।लम्बी चुटिया धारण किये है।नाम है अनुज पाण्डेय। जनेऊ अभी हुआ नहीं है पर चुटिया की लम्बाई बता रही है कि घर में पंडिताई का झंडा फहराता है।

फ्रेंडशिप बैंड देखकर हमने पूछा-सबसे पक्का दोस्त कौन है तुम्हारा। अनुज पाण्डेय बोले-अनीस।

इस साल स्कूल नहीं गए तो छूट जाएगा। दोस्त भी। यह पूछने पर बोले अनुज-नहीं। अगले साल आठ में एडमिशन लेंगे। इस साल भी इम्तहान देंगे।

अनुज के पिता कर्बी में पत्थर लगाने का काम करते हैं। दो बहनें है। बड़ी बहन की शादी मई में हई। दूसरी 12 वीं में पढ़ती है। पता चला नीचे जो लेटे हुआ जोड़ा है वह अनुज के दीदी जीजा हैं। जीजा अहमदाबाद में काम करते हैं। वहीं जा रहे हैं सब लोग।

इस बीच फैक्ट्री के एक साथी दिखे डब्बे में। बोले-आप यहां कैसे। हम बोले- क्या नहीं हो सकते? कहने का मतलब यह कि हमारा 3 टियर स्लीपर में पाया जाना आश्चर्य का कारण बना।

ट्रेन जबलपुर स्टेशन पहुंच गयी। अपने लिए सवारी का इंतजार करते हुए देखा एक आदमी बहुत मोटी सोने की चेन धारण किये हुए एक आदमी ऑटो वाले से पूछता है -'यहां सिगरेट पीना अलाउड है कि नहीं।'

सिगरेट पीते हुए ऑटो वाले के बार-बार सवारी के लिए पूछने की बात की तारीफ़ करते हुए मजे लेते हुए वह बोला-मान गए यार तुमको। लगे हुए हो लगातार ट्रेन से ऑटो पर ले चलने के लिए जबकि हमने कह दिया कि हमारी गाडी आ रही है।

क्या विदेशों में निवेश के लिए बार-बार अनुरोध करने पर विकसित देश के लोग भी कुछ ऐसा ही कहते होंगे हमारे लोगों से--मान गए यार तुमको। लगे हुए हो कब से निवेश कराने के लिए।

अब कमरे पर आ गए। चाय आ रही है। आ जाइए आप भी। देखिये बाहर का सीन कैसा दीखता है। कविता याद आ रही है:

जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।
हैं जहां नहीं नीले निशान
बस उतना ही तन मेरा है।
आपका दिन शुभ हो। मजे से रहें।

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