Tuesday, September 15, 2015

हम तो बाहरै गाड़ी चला रहे

कल रात खाना खाने के कुछ देर बाद ही सो गए। रात में कई बार गर्मी लगी। मन किया एसी चलायें पर एक तो आलस दूसरे यह सोचकर कि चलाएंगे तो कुछ देर बाद फिर बन्द करने उठना पड़ेगा नहीं चलाये। आलस ने कुछ बिजली और कुछ पर्यावरण का नुकसान बचाया। फिर भी लोग बुरा मानते हैं आलस को । भलाई का जमाना नहीं दुनिया में।

किसी रेलगाड़ी की शहर आने के पहले चेनपुलिंग करके कुछ यात्री शहर के बाद उतर जाते हैं वैसे ही नींद गाड़ी की पहली क़िस्त पूरी हुई 3 बजे। घड़ी देखकर फिर सो गए तो सुबह के प्लेटफार्म पर पहुंचे 5 बजे। अलार्म बजते ही फौरन बन्द कर दिया। आजकल हर अनचाही आवाज को फौरन बन्द करने का रिवाज भी है न।

लेते-बैठे कुछ देर सर्फियाते, टिपियाते और स्टेटसियाते रहे। साढ़े 6 बजे साइकिल स्टार्ट करके निकल लिए सुबह सैर को। रात जो बरमूडा पहले थे वही और उसके ऊपर शर्ट पहनकर निकल लिये। बाहर निकले तो लगा जो भी सड़क पर टहल रहा है उसकी निगाह हमारे कपड़े की तरफ है। सवाल करती हुई -ये घुटन्ना पहन के निकल लिए आज !!

कपड़े हमारे शरीर की विपरीत मौसम से रक्षा से के लिए होते हैं। हमने उनको इज्जत की रक्षा के काम में लगा दिया है। बेचारे कपड़े और शरीर दोनों की आफत है। यह लिखते हुए मुझे सुनील दीपक की वह पोस्ट याद आई जिसमें एक फोटोग्राफर ( स्पेंसर ट्यूनिक) वस्त्र रहित लोगों के समूह फोटो लेता है। स्पेन्सर ट्यूनिक की ख़ासियत है कि वे दुनियाभर की मशहूर इमारतों और सड़कों पर बड़े पैमाने पर पूरी तरह नग्न हुए जनसमूह की तस्वीरें खींचते हैं। समन्दर किनारे लहरों के आकार, ऊंचे पुलों पर तनी कमान की शक़्ल में बनी कतारें, ऊंची इमारतों की दीवार तो पिरामिड-सा आकार बनाए सैकड़ों नग्न लोग इस फ़ोटोग्राफ़र स्पेन्सर की कला का अहम हिस्सा हैं। पोस्ट का लिंक यह रहा: http://priestofbeauty.blogspot.in/2007/05/blog-post_16.html


चाय की दुकान पर शंकर पासवान ड्राइवर मिले। बक्सर जिला के रहने वाले हैं। जमशेदपुर से शनिवार को आये हैं। टायर कुछ कमजोर हो गया था तो उसको रिसोल करवाने के लिए रुक गए। आजकल में जाएंगे। लौटानी का सामान नहीं मिलेगा तो चल जाएंगे भोपाल। ढेर माल मिल जायेगा लादने के लिए।

शंकर 14/15 साल की उम्र से खलासी का काम शुरू किये। 4 /5 साल किये। कई ड्राइवर के साथ रहे। पहले कोई सिखाया नहीँ ट्रक चलाना। फिर एक ड्राइवर सिखाया। बाद में ऊ ड्राइवरी छोड़ दिए। आजकल गुरु जी बगोदर में अपना होटल चलाते हैं।

बगोदर का सुनकर हमको 6/7 जुलाई,1983 का वो दिन याद आ गया जब हम साइकिल से अपने साथी विनय अवस्थी और दिलीप गोलानी के साथ बगोदर हाईस्कूल के बच्चों के साथ हॉस्टल में रुके थे। सुबह 7 जुलाई को विनय अवस्थी का जन्मदिन था। बच्चों ने वहीं के फूलों से माला पहनाकर जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं थीं। हमें स्कूल के अलावा कुछ याद नहीँ है पर हमें लगता है हम बगोदर से बहुत गहराई से जुड़े हैं। यादें ऐसी ही होती हैं। http://fursatiya.blogspot.in/2006/03/blog-post_5.html?m=1

महेश कक्षा 5 पास हैं। 10 साल से ड्राइवरी कर रहे। तम्बाकू के अलावा और कोई नशा नहीं। तम्बाकू रगड़ते हुए हमसे पूछा- खाइयेगा?बहुत बढ़िया होता है बिहारी खैनी। हम मना कर दिए।

घर में पत्नी और दो बच्चे हैं। एक लड़का-एक लड़की। भाई है उसको पढ़ा रहे हैं।

साथ में खलासी रहता है। लेकिन इस बार उसकी तबियत खराब हो गयी तो मालिक को ही ले आये। बोले चलो साथ में। यहां घर बैठे-बैठे घड़ी-घड़ी पूछते रहते हो कहां तक पहुंचे। देर किधर हुई। तो साथ में रहने पर पता तो चलेगा क्या तकलीफ होती है सड़क पर।

जमशेदपुर से जबलपुर आने जाने के एक चक्कर में 8000 रूपये तक बचता है। घर में दो छोटी बसें भी खुद की चलती हैं शंकर की। हमने कहा -तुम तो बड़े आदमी हो तो मुस्कराये।

थोड़ा लंगड़ाकर चलते हैं शंकर। बताया कि एक बार नीचे कुछ टाइट कर रहे थे। टायर के नीचे पटाला ठीक से लगा नहीँ था। पहिया पैर पर आ गया। फिर दूसरे ड्राइवर ने गाड़ी बैक की। फिर इलाज चला ।

रास्ते में जहां नींद आ जाती है गाड़ी किनारे करके सो लेते हैं। अमूमन 3 बजे से सुबह 8 बजे तक गाड़ी नहीं चलाते। सोते हैं। इस समय नींद बहुत आती है।

बिहार के चुनाव में कौन जीतेगा इस सवाल के जबाब में बोले- हम तो बाहरै गाड़ी चला रहे। त कैसे बताएं कौन जीतेगा। पर टक्कर तीन लोग में है -लालू, मांझी और नितीश। इसमें माझी का हवा तगड़ा है। देखिये जो होगा पता चलिए जाएगा।

शंकर को छोड़कर हम वापस लौट आये। पुलिया पर छोटी बाई सुस्ता रहीं थीं।मड़ई से गौरा-पार्वती लेकर बेंचने जा रहीं थीं कंचनपुर। रास्ते में तक गयीं तो पुलिया पर सुस्ताने लगीं। कल तीजा व्रत है। उसमें पूजा होती है गौरा-पार्वती की।

घर में पति के अलावा तीन बच्चे हैं। तीनों लड़के। दो यही कुम्हारी का काम करते हैं। कोई आठ तक पढ़ा कोई साथ तक । एक अभी भी पढ़ता है।

हमने पूछा-तुम भी रहती हो व्रत? बोली- पहले रहते थे। एक बार घर में किसी की मौत हो गयी तो व्रत खण्डित हो गया। रहना बन्द कर दिया।

सुबह घर में सबको चाय पिलाकर निकली हैं। अब 11 बजे तक बेंचकर वापस पहुंचेंगी तब खाना बनाएंगी।
बात करते हुए जाने का समय हो गया उनका। हाथ के अंगौछे को गोल बांधते हुए सर पर रख लिया तब हमने कहा फ़ोटू ले लें। कहने पर ढंके हुए गौरा-पार्वती को एक तरफ से खोल दिया। पीठ दिखने लगी मूर्तियों की। हमने फोटो लिया। दिखाया। मूर्तियों का पटरा उनके सर पर रखवाया। वापस चले आये।

आप अब मजे करें। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

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