Tuesday, September 08, 2015

याद तुम्हारी कर चुपके से....

याद तुम्हारी कर चुपके से आज सांझ को फ़िर मैं रोया।

क्षण भर में मन दौड़ गया फ़िर उन भूली-भटकी राहों में
और अचानक तुम्हें पा लिया फ़िर मैंने अपनी बांहों में
लहराते से मुक्त केश थे, थीं मदिरालस तिरती आंखें
झूल रही थी देह फ़ूल सी, सुख की चिर आतुर चाहों में
होता नहीं कहीं धरती पर सपनों से ज्यादा कुछ सुन्दर
इसीलिये तो हमने उनकी खातिर अपना सब कुछ खोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज सांझ को फ़िर मैं रोया

दो हृदयों का मिलन देखकर मानों सारा जग जलता है
पर अपने-अपने मन पर ही बोलो किसका वश चलता है
जिस पर रीझे उस पर अपना जीवन ही अर्पित कर डाले
यह मानव की एक चिरन्तन एक अभागी दुर्बलता है
कौन यहां जन्मा धरती पर जिसने नहीं विरह-दुःख देखा
जिसने क्षण न दिए सुधियों को जिसने अपना मन न भिगोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

कितनी हो दृढ़ता धीरज की फिर भी दृग भर आते हैं
कितना ही कठोर संयम हो फिर भी पांव फिसल जाते हैं
कब रह पाया दुःख अनगाया,कब रह पाई मौन प्रतिध्वनि
भाव उधर अंतस में उठते,अक्षर इधर बिखर जाते हैं
आज तुम्हारा कण्ठ अलंकृत अगणित सुधियों की माला से
उस माला में एक फूल सा मैंने अपना प्राण पिरोया।


याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

वह अनुभूति प्रखर होती है जिसकी फांस गड़ी रह जाए
दर्द वही असली होता है जो प्राणों से निकल न पाये
वह जो रह-रह कर बहता है फिर भी भरा-भरा रहता है
कब जाने ढुलते जल-कण सा कब जाने तूफान उठाये
आज लगा होने आलोड़ित फिर कोई करुणा का सागर
उस सागर में लघु गागर सा मैंने अपना गीत डुबोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

-डॉ उपेन्द्र,कानपुर।

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1 comment:

  1. very nice poem कितनी हो दृढ़ता धीरज की फिर भी दृग भर आते हैं
    कितना ही कठोर संयम हो फिर भी पांव फिसल जाते हैं really like these lines,can u please check my blog and give some kind of feedback , thanks http://vikrantvik.blogspot.in/

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