Sunday, September 27, 2015

चाँद भी हमारी ही तरह अकेला होता है

गोविन्दपुरी स्टेशन पर पहुंचते ही चाँद ने लपककर पूछा- मैं भी अकेला। तुम भी अकेले। हम दोनों ही अकेले हैं। साथ चलते हैं। ले चलोगे साथ में?

हमने पूछा -रिजर्वेशन तो है नहीं तुम्हारा। कैसे चलोगे?

इस पर वह बोला-छत पर बैठकर चले चलेंगे। छत का रिजर्वेशन थोड़ी होता है।

हमने कहा-चलो। चांदनी को भी ले चलना साथ में। वरना अँधेरे में कहीं भटक गए तो लफ़ड़ा होगा।

चाँद बोला-हम चांदनी के बिना कहीं नहीं जाते।

हमने कहा -समझ गए भाई। चलो चलना साथ में। ट्रेन आने तो दो। ट्रेन तो अभी 3 किमी दूर सेंट्रल पर सुस्ता रही है।

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