Sunday, September 13, 2015

नदी में नहान

ट्रेन में साथ के बच्चे से बातचीत शुरू की तो पता चला कि तक्षशिला इंजीनियरिंग कालेज से सिविल की पढ़ाई कर रहा है। तीसरे सेमेस्टर में। मनसौर गाँव का रहने वाला है।पढ़ाई के बारे में पूछा तो बोला ठीक होती है। हमने पूछा-ठीक होती है तो बच्चे ट्यूशन क्यों पढ़ते हैं पास होने के लिए। बोला-हम नहीं पढ़ते।

पिता किसान हैं। भाई एमबीए करके नौकरी कर रहा। बहन आंगनबाड़ी में। अनुसूचित जाति का होने के चलते 40000 रूपये फीस के पैसे छात्रवृत्ति से मिल जाते हैं। रहवासी भत्ता 2000 मिलता है। 3 लड़के मिलकर रहते हैं। खर्च चल जाता है।

रुचियाँ पूछने पर बताया- चेस खेलते हैं, क्रिकेट खेलते हैं, रनिंग का शौक है। हमने पूछा -कोई लड़की दोस्त है? कान तक मुस्काते हुए और लाज लाल होते हुए बोला बालक- नहीँ । हमने पूछा -क्यों क्या साथ में कोई लड़की नहीं पढ़ती? इस पर बालक बोला- पढ़ती है पर गर्ल फ्रेंड नहीँ। हमने पूछा- क्यों नहीं? बोला-इत्ता पैसा नही। हमने पूछा- गर्ल फ्रेंड से लड़की क्या सम्बन्ध? चाय,काफी या पिक्चर का खर्च होता होगा। कभी तुम कभी दोस्त।और क्या खर्च चाहिए।

उतना तो भर तो चल जायेगा। लेकिन ..............। यही भर बोला बालक और फिर चुप।

हमको लगा शायद और मंहगा हिसाब है दोस्ती में। जो हमको पता नहीं। याद आया पिछले दिनों जबलपुर कुछ बच्चे पकड़े गए थे जो मोबाईल चोरी करके बेंचकर अपनी दोस्तों को उपहार देते थे।


गाड़ी सुकरी मंगेला में रुकी। स्टेशन सन् 1957 के पहले का बना लगा। बाहर साइकिल खड़ी थी। लगता है इसी साइकिल का मॉडल देखकर मैकमिलन ने पहली साइकिल बनाई थी।

स्टेशन से एक महिला चढ़ी। मूंगफली और चने बेंच रही थी। दोनों 5 रूपये की। पूछा टिकट लिए हो तो बोली- टिकट लेंगे तो सब पैसा तो इसी में खर्च हो जायेगा। 5 रूपये के चने लेकर चबाते हुए शिकारा पहुंचे।

स्टेशन पर चाय की दुकान पर समोसा, पकौड़ी, गुझिया और चाय का नाश्ता किया। स्टेशन को, प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन को और खिड़की से झांकते यात्रियों को देखते रहे। प्लेटफार्म पर ही हाथ से ऊपर नीचे किया जाने वाला सिग्नल भी लगा था। आदमी गया। सीढी से ऊपर चढ़ा। चाबी लगाई। सिग्नल घुमाकर उतर आया।


स्टेशन पर छोटे बच्चे एक छोटी पुड़िया में कुछ रखे बेंच रहे थे। 2 रूपये की एक पुड़िया। छोटे-छोटे बीज। कह रहे थे इसको खाने से जुकाम नहीं होता। फोटो खींचने की बात पर एक बोला -हम नहाये नहीं हैं। फिर सब सटकर बैठ गए। फिर देखते हुए बोले-मस्त आई है। कुछ ने बड़ी करके देखी।

एक बच्चे के साथ हम पास ही बहती कैमर नदी तक गए। दो लोग नदी में मोटरसाइकिल धो रहे थे। एक नहा रहा था। एक महिला नहाने के बाद कपड़े धो रही थी। हमने भी नदी किनारे कपड़े उतारे और उतर गए नदी में। नदी के पत्थर रपटीले थे। सीमेंट का चबूतरा था नदी के आरपार। वहां भी फिसलन थी। हम बहुत आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए नदी के बीच तक आये। करीब आधा घण्टा नदी के पानी में बैठे रहे।

मन किया अज्ञेय की तरह नदी के बीच कोई कविता पढ़कर रिकार्ड की जाये। पर मोबाईल किनारे छोड़ आये थे। रमानाथ जी की कविता पंक्ति याद आई:
आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहां होंगे कह नहीँ सकते
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
नदी का पानी नीचे ठंडा ऊपर कुछ गर्म था। नीचे से लेकर पानी ऊपर तक लाते हुए इस ताप बदलाव को महसूस किया। नदी के प्रवाह को महसूस किया। फिर आहिस्ते-आहिस्ते पानी के बाहर आ गए।नदी अब मन में बह रही थी ।

बाहर आकर खुद फोटो लिया। फिर कुछ बच्चे दिखे तो उनसे कहकर फोटो खिंचवाया। फिर पानी में उतरकर। बाहर आकर फैंटम पोज में भी। फिर देखा तो बच्चों ने अपनी भी कई फोटो/सेल्फी खींची थीं। 11 वीं में एग्रीकल्चर में पढ़ते हैं बच्चे।


दूसरे किनारे पर महिला नदी में नहाने, कपड़े धोने और सुखाने के लिए फैलाने के बाद घर के लिए लकड़ी इकट्ठा कर रही थी। घर में मिस्टर और तीन बच्चे हैं। एक की शादी हो गयी। दो की करनी है। पास ही रहती हैं। फोटो देखकर मुस्कराई और बोली-बढ़िया तो आई है।  :)


स्टेशन पर आकर पता चला गाड़ी आने में देर है। टिकट घर वाला बोला -टिकट अभी नहीं मिलेंगे। जब ट्रेन आएगी उसके एक घण्टे पहले मिलेंगे। हमने कहा ऐसा क्यों? बोला-लोग टिकट वापस करते हैं ट्रेन न आये तो।हमने कहा-हम न करेंगे। दे दो टिकट। उसने दे दिया।

टिकट खिड़की के पास ही चाय की दुकान के कर्मचारी पाँव पसारे सांचे से गुझिया बना रहे थे और बोरी पर रखे आलू काटकर महीन कर रहे थे।


हम चाय की दुकान वाले लक्ष्मीकांत खण्डेलवाल जी से बतियाने लगे। बताये कि वो जबलपुर से एमएससी और वकालत पढ़े हैं। नयनपुर के रहने वाले। वहां अदालत थी नहीं पहले। फिर चाय की दुकान की।पहले नयनपुर फिर शिकारा । सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक दुकान चलती है। तब नौकरी पीछे घूमती थीं। की नहीं पारिवारिक समस्याओं के चलते। लड़का एमबीए करने के बाद जबलपुर में जॉब तकनीक सिखाता है लोगों को।

जबलपुर से कई और लोग भी आये हैं। हर एक के पास कैमरा। कुछ के पास स्टैंड भी। सुबह 530 की गाडी से आये थे। फर्स्टक्लास में। 150 लगा होगा किराया। हम 15 रूपये में आये। अब साथ में लौट रहे हैं।


ट्रेन आई तो ड्राइवर ने टोकन प्लेटफार्म पर फेंका । स्टेशन लाइनमैन से टोकन लिया। कुछ देर में गाडी चल दी जबलपुर के लिए। खटर खट, खटर खट, खटर ख़ट करते हुयी।

हम आलोक धन्वा की कविता याद करते हुए वापस लौट रहे हैं:
हर भले आदमी की
एक रेल होती है
जो उसकी माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुंआ उड़ाती हुई।

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