शादी के पहले वाले ड्रोन फ़ोटो शूट (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में )के आगे मछलियों का संसार था। समुद्र किनारे तमाम मछुआरे समुद्र से पकड़ी मछलियों को छाँट-बीन कर अलग कर रहे थे। छोटी मछली अलग, बड़ी अलग। मछलियों को छाँट कर अलग-अलग बक्सों में भरते जा रहे थे। छोटी मछलियों की साँसे रुक गयीं थी। वे चुपचाप निस्पंद पड़ीं थी। कुछ बड़ी मछलियाँ अभी भी तड़प रहीं थीं। पानी से अलग होने पर उनका जीवन ख़त्म होने वाले था। कुछ मछलियाँ शायद अभी भी सोच रहीं होंगी कि कुछ देर में उनको फिर पानी मिल जाएगा। कुछ को शायद एहसास हो गया होगा कि अब बचना सम्भव नहीं। जीवन की कुछ ही साँसे बची हैं। ये शायद ज्ञानी मछलियाँ रहीं होंगी। लेकिन मरना सभी को है।
मौत ज्ञानी और अज्ञानी में भेद भाव नहीं करती।
मछलियाँ शायद अपने प्रियजनों को इष्ट-मित्रों को याद कर रहीं हों। कुछ अफ़सोस भी कर रहीं होगी कि यह छूट गया , वह रह गया। कुछ शायद अपने ब्वाय फ़्रेंड, गर्ल फ़्रेंड को याद कर रहीं हों। वेलंटाइन वीक में जाना हो रहा है उनका। अपने साथी के साथ उनके कई प्लान रहें होंगे। लेकिन क्या पता मछलियों के यहाँ वेलेंटाइन वीक न होता हो। बाज़ार का दख़ल अभी उनके संसार में उतना न हुआ हो।
कुछ मछुआरे अपने जाल सुलझाते हुए समुद्र में जाने की तैयारी कर रहे हैं। जाल बहुत भारी है। सैकड़ों फ़ीट लम्बा। लम्बे जाल को अपने-अपने कंधे पर लादे वे आगे नाव की तरफ़ बढ़ रहे हैं। एक के पीछे एक करते हुए बहुत लम्बे जाल को सब लोग कुछ-कुछ दूरी पर अपने कंधे पर लादे हुए आगे बढ़ रहे हैं।
एक नवा समुद्र में उतरी है अभी। तट की तरफ़ आती लहरों ने नाव को उछालते हुए उसका स्वागत किया। जैसे क्रीज़ पर आए नए बल्लेबाज़ का स्वागत तेज गेंदबाज़ बाउंसर से करता है। नाव कई फ़िट पानी में उछल गयी। चप्पू थोड़ा थम गए। ज़रा ही देर में लहर नाव के आगे तट की तरफ़ चली गयी। चप्पू फिर चलने लगे। नाव आगे बढ़ने लगी। समुद्र नाव का इंतज़ार कर रहा था। नाव छोटी होती गयी और थोड़ी देर में समुद्र के राज्य में प्रवेश कर गयी। अब नाव पर समुद्र का क़ानून लागू होगा।
लौटते हुए देखा कुछ मछुआरे समुद्र से नाव निकालकर तट की तरफ़ ला रहे हैं। बालू में नाव को ज़ोर लगाकर बाहर की तरफ़ घसीट रहे हैं। नाव भारी है। रेत ने उसका आग बढ़ना कठिन बना दिया है। मछुआरे थोड़ा-थोड़ा रुककर ज़ोर लगाते हुए नाव को बाहर घसीट रहे हैं। सब मिलकर अपनी भाषा में कोई नारा सा लगाते जा रहे हैं। शायद सिंहली में।
यह सामूहिकता का सौंदर्य है।
शायद मछुआरे अपनी भाषा में कह रहे हों, ज़ोर लगा के हईस्सा, थोड़ा रह गया हईस्सा, और लगाओ हईस्सा। क्या पता शुरू में जय बजरंगबली से शुरू हुए हों या फिर या अली से। जिसको जहां से ताक़त मिलती है, वहाँ से लेता हैं।
हर बड़े और मेहनत के काम इसी तरह ठहर-ठहर के सामूहिक भाव से ही होते हैं। सदियों से होते आए हैं।
नाव निकल आने के बाद वे अपने जाल को समुद्र से निकाल रहे हैं। सैंकड़ों मीटर लम्बी रस्सी समुद्र में है। घंटों लगेंगे जाल निकालने में। धीमे-धीमे रस्सी निकलते हुए सब लोग हैइस्सा जैसा कुछ बोलते जा रहे हैं।
थोड़ा हाथ हमने भी लगाया रस्से ने। रस्सा कड़ा और भारी था। दूसरे सिरे पर जाल है। कितनी मछलियाँ हैं जाल में यह किसी को पता नहीं। आशा है कि खूब मछलियाँ होंगी।
लौटते हुए देखा प्री वेडिंग वीडियो सूट जारी था। सूरज गर्म हो रहा था। वापस लौटते हुए अपन ने वीडियो सूट करते हुए अपनी आवाज में कमेंट्री टाइप की। ख़राब आवाज में। देखिए , सुनिए और बताइए कैसा लगा।
होटल लौटकर हम अगली मंजिल की तरफ़ बढ़ गए।

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