Friday, February 14, 2025

श्रीलंका में रेल यात्रा


 श्रीलंका में घूमते हुए तमाम ऐसे अनुभव हैं जिनको मैं तुरंत लिख देना चाहता हूँ लेकिन घूमने से फुर्सत हो तब न। नेट भी लुकाछिपी करता रहता है। कल सुबह की अपलोड की हुई एक पोस्ट दोपहर तक घूमती रही। उसके बाद फेसबुक पर दिखी।

ग्रुप में ट्रिप लीडर अनन्य को छोड़कर बाकी सभी 45+ वाले लोग हैं। सबसे बुजुर्ग साथी 76 साल के हैं। तरह-तरह के अनुभव हुए होटलों में रहने के। Arvind Tiwari जी साथ आते तो यात्रा के अनुभवों से उनका होटलों पर लिखा जाने वाला उपन्यास शायद पूरा हो जाता। अरविंद तिवारी जी को हफ़्ते-हफ़्ते भर के दो- तीन टूर कर लेने चाहिए। कृपा वहीं अटकी हुई है।
कल ELLA एला से नानू ओया Nanu Oya आए। दोनों ही हिल स्टेशन जैसे शहर। छुटके शहर। अभी नानू ओया में ही रुके हैं।
एला से नानू ओया की यात्रा ट्रेन से हुई। पैसेंजर ट्रेन से। सारी ट्रेन अनरिजर्व्ड, तीसरी श्रेणी की। कुल चार-पाँच डब्बे थे ट्रेन में।
लेकिन ट्रेन से पहले स्टेशन की बात।
एला स्टेशन साफ़ सुथरा था। जगह-जगह साफ़-सफ़ाई के संदेश। एला स्टेशन को ग्रीन स्टेशन का दर्जा हासिल है। तरह-तरह के कूड़े को इकट्ठा करने के अलग-अलग डस्टबिन। प्लास्टिक और एल्यूमिनियम की बोतल को जमा करने के अलग-अलग केज। शौचालय भी साफ़-सुथरे। किसी मॉल के ट्वायलेट जैसे। वहाँ भी संदेश लगे थे , यहाँ साफ़-सफ़ाई रखें। पानी से पैर न धोयें।
छोटा स्टेशन , कम ट्रेनें और कम यात्री के कारण ऐसा करना आसान होता होगा। लेकिन अपने यहाँ छोटे स्टेशन पर भी शौचालय अस्त-व्यस्त और उपयोग लायक नहीं रहते।
प्लेटफार्म पर स्टेशन मास्टर के आफिस के बाहर एक पेड़ के आकार की खुली आलमारी में किताबें रखीं थीं।अधिकतर किताबें स्थानीय भाषाओं में हैं। कुछ अंग्रेजी और फ्रेंच में भी। अपने यहाँ किसी रेलवे स्टेशन पर इस तरह उपलब्ध हैं क्या किताबें ?
यह बात मैंने जब कल लिखी तो कई साथियों ने कहा कि अपने यहाँ ऐसा होगा तो लोग किताबें उठा ले जायेंगे। रैक ले जायेंगे। शायद ऐसा ही हो लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि ऐसा न हो। किताबें कुछ तो पढ़ी जाएँगी। मैंने कई बार सोचा कि अपने यहाँ के हेयर कटिंग सैलून में अपनी किताबें रखूँ। अभी तक नहीं रखी थी अब शायद रख दूँ।
ट्रेन आई तो हम लपके सीट पर कब्ज़ा करने के लिए। हिंदुस्तानी अंदाज़ में खुली खिड़की से ही सीट पर बैग, जैकेट वगैरह रखकर सीट हथिया ली और अंदर पहुंचकर मासूम बनकर बैठ गए। हर जगह लाइन लगाकर चलने की आदत वाले कई विदेशी जब अंदर आये सीटें सब भरी थीं।
ट्रेन चलने पर हमने पास खड़ी एक विदेशी , बुजुर्ग सी महिला को अपनी सीट पर बैठने का आग्रह किया , उठ भी गए उसको सीट देने के लिए लेकिन उसने मुस्कुराकर और धन्यवाद देकर सीट पर बैठने से मना कर दिया। बह खड़े-खड़े और हम बैठे ट्रेन के बाहर के नजारे देखते हुए यात्रा करते रहे। बीच-बीच में अपन उस महिला और उसके साथ की लड़कियों को, जो आपस में बतियाने में मशगूल थीं, भी देख लेते थे।
साथ में एक श्रीलंकन बालिका शायद अपने दोस्त के साथ कहीं जा रही थी। हमारे साथ के लोग इंदौरी, राजस्थानी कड़क अंग्रेजी और हिन्दी में बालिका से बतियाते रहे।यह याद आने पर कि बालिका हिंदी तो जानती नहीं तो हिंदी में बोले हिस्से का अंग्रेजी अनुवाद भी बालिका को मुहैया कराते रहे। बालिका भी अटक-अटक कर जवाब देती रही। उसके साथ का बच्चा अलबत्ता चुप ही रहा। बालिका ने बताया कि वह अभी इंटर में पढ़ रही है। बालक कहीं मैकेनिक का काम करता है।
थोड़ी देर में सीट बदलकर दूसरी जगह आए। वहाँ एक विदेशी परिवार यात्रा कर रहा था। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो पता चले वे लोग फ़्रांस से आए हैं। माँ और चार भाई बहन। फ़्रांस के अलग-अलग शहरों में रहते हैं परिवार के लोग। माँ नर्स हैं, एक बहन टीचर, भाई शेफ़ , बाकी दोनों बहने भी अलग-अलग काम करती हैं। दो हफ़्ते के लिए आए हैं घूमने श्रीलंका। बहन ने बात करते हुए बताया कि भारत में ऋषिकेश जा चुकी है वो। बाकी घूमना बाकी है।
उसने पूछा- आप फ़्रानस आए हैं कभी?
हमने कहा -आए तो नहीं लेकिन आना है। जल्दी ही।
लड़का खड़े -खड़े किताब पढ़ रहा था । देखा तो नेपोलीयन के बारे में थी किताब।
परदेश में जाकर देश के नायक ज़्यादा याद आते हैं। अपने देश के लोग भी विदेश में ज़्यादा देश भक्त हो जाते हैं। दूर होने पर लोग और घर ज़्यादा प्यारे लगने लगते हैं।
हम लोगों के खाने-पीने के डब्बे खुले तो फ़्रांसीसी परिवार को भी आफर किया गया। उन्होंने खाने के बाद रेवड़ी की खूब तारीफ़ की। दुबारा खाई। फिर तारीफ़ की। मुफ्त के रेवड़ी सबको अच्छी लगती है।
ट्रेन खटर-खटर खट खट करते आगे बढ़ती रही। सुरंग से गुजरती तो लोग हल्ला मचाते। अंधेरे में हल्ला मचाते लोग भारत जैसे ही लगे। पटरियों पर गुजरती ट्रेन की आवाज ऐसी लग रही थी मानो कोई लोहे की छड़ें पटकी जा रही हों।
बाहर हरियाली , घाटी , पेड़ दिख रहे थे। खूबसूरत नजारा।
जगह-जगह मिट्टी की बर्फी सरीखे खेत। खेत के पौधों को फ़व्वारों से सींचते लोग।
ट्रेन के मुड़ते समय इंजन दिखता। डब्बे दिखते। सीटी बजाती , धुआँ उड़ाती रेल देखते हुए आलोक धन्वा जी की कविता याद आई:
हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो उसकी माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुंआ उड़ाती हुई ।
हम लोग नानू ओया की तरफ़ बढ़ रहे थे जहाँ माता सीता का निवास रहा अशोक वाटिका में कई साल।
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