कल जनवादी लेखक संघ, कानपुर द्वारा श्री जयप्रकाश जायसवाल विचार गोष्ठी और कविता पाठ का आयोजन किया गया। श्री जयप्रकाश जायसवाल जी कानपुर जनवादी लेखक संघ के संरक्षक थे। स्वयं होजरी उद्योग से जुड़े होने के बावजूद पढ़ने-पढ़ाने में और लिखने-पढ़ने की हर गतिविधि में यथा संभव सहयोग करते थे। 'अकार' पत्रिका की शुरुआत कराने में उनका अहम योगदान था। कार्यक्रम के दौरान उनकी बेटी ने उनकी पढ़ने-पढ़ाने की रुचि का ज़िक्र करते हुए बताया कि उनके पिताजी को इस बात का सुकून था कि उनके बेटी-बेटों के साथ-साथ बहुओं की भी पठन-पाठन में रुचि है।
आयोजन पत्रकारपुरम स्थित 'रोमी का अड्डा' में हुई। रोमी अरोड़ा जी पत्रकारिता से जुड़ी थी। उनके निधन पर उनके बारे में लिखी गयी पोस्ट्स से उनके बारे में जानकारी हुई थी।
'रोमी का अड्डा' मतलब, रोमी जी के घर की ऊपरी मंज़िल पर, गोष्ठी का आयोजन था। एक दीवार पर कई फ़िल्मों, प्रसिद्ध लेखकों और कलाकारों की फ़ोटो के बीच मुस्कराती हुई रोमी जी की फ़ोटो लगी हुई थी।
जीने में दीवार पर चार्ली चैप्लिन की फ़ोटो के साथ के पोस्टर में लिखा था -"Life is a tragedy when seen in close up , but a comedy in long shot" ( जीवन पास से देखने एक त्रासदी है, दूर से देखने पर एक प्रहसन)। जनवादी लेखक संघ, कानपुर की सचिव Anita Misra ने इस पोस्टर की तरफ़ ध्यान दिलाया। यह भी कि उसके चयन में उनके भी भूमिका थी।
हमको लगा कि शायद चार्ली चैप्लिन की बात मानकर ही अपने देश के कर्णधार देश को आज की सच्चाई से ठेल-ठालकर दूर स्वर्णिम अतीत या चकाचौंध करने वाले सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने के प्रयास में हुए हैं। वे देश को दूर से ही देखना चाहते हैं ताकि देश की वर्तमान त्रासदी न दिखें, प्रहसन चलता रहे।
इसी सिलसिले में ज़िंदगी पर राहत इंदौरी का भी एक शेर याद आ गया :
ज़िन्दगी क्या चीज़ है ख़ुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो ।
कार्यक्रम शुरू होने के पहले दैनिक जागरण अख़बार के आइनेस्ट से जुड़ी मौली सेठ जी ने बहुत प्यार, आत्मीयता और गर्मजोशी से रोमी अरोड़ा को याद करते हुए गोष्ठी में आए लोगों का स्वागत किया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए जनवादी लेखक संघ,कानपुर की सचिव, अनीता मिश्रा ने, संचालन का काम शालिनी सिंह जी को सौंप दिया और बाक़ी के इंतज़ाम देखने लगीं। विचार गोष्ठी में राजेश अरोड़ा के कविता संग्रह 'चिट्ठियाँ' और सीमा सिंह के कविता संग्रह 'कितनी कम जगहें हैं' पर बातचीत और उसके बाद कविता पाठ होना था।
शालिनी सिंह जी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए केदारनाथ अग्रवाल की 'कानपुर' कविता पढ़ी :
"चोटों पर चोटें जो घन की
खाकर कभी नहीं तड़की है,
उस हड्डी पर—उस पसली पर
श्रमजीवी की उस छाती पर,
कानपुर का शहर सजीला,
कई मील के लंबे-चौड़े
मिलों कारख़ानों को घेरे
घंटाघर ले बसा हुआ है।
कंकड़, पत्थर, कोलतार की
काली-काली चौड़ी सड़कें—
दुकानों का बोझा लादे
गहरी निद्रा में लेटी हैं।
कई टनों के पर्वत जैसे
सड़क कूटने वाले इंजन,
मनों बोझ के टायर पहने
चलने वाले लाखों मोटर,
लोहे की पटरी की सड़कें,
भारी-भरकम रेलगाड़ियाँ,
उस हड्डी पर—उस पसली पर
चलने-फिरने में तन्मय हैं।
घाट, धर्मशालाएँ, अदालतें,
विद्यालय, वेश्यालय सारे,
होटल, दफ़्तर, बूचड़ख़ाने,
मंदिर, मस्जिद, हाट, सिनेमा,
श्रमजीवी की उस हड्डी से
टिके हुए हैं—जिस हड्डी को
सभ्य आदमी के समाज ने
टेढ़ी कर के मोड़ दिया है!!
कानपुर की सारी सत्ता—
श्रमजीवी की ही सत्ता है!
कानपुर की सारी माया
श्रमजीवी की ही माया है!!
इसके बाद उन्होंने सीमा सिंह के कविता संकलन 'कितनी कम जगहें हैं' पर चर्चा करने के लिए वीएसएसडी कालेज कानपुर के प्रोफ़ेसर आनंद शुक्ल जी को आमंत्रित किया। युवा कवियत्री सीमा सिंह नेशनल पी जी कालेज, लखनऊ में प्राध्यापिका हैं। जनवादी लेखक संघ , लखनऊ से संबद्ध हैं। 'कितनी कम जगहें हैं' उनका पहला कविता संकलन है जो कि सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
प्रोफ़ेसर आनंद शुक्ल ने सीमा सिंह के कविता संकलन पर बातचीत करने के पहले हिंदी साहित्य, कविता , कवि और आज के समय पर अपनी बात कही। पचास-पचपन करोड़ की हिंदी भाषी आबादी में हज़ार-पाँच सौ की संख्या में किताबें छपना, कम पढ़ा जाना यह किसी भी समाज के लिए चिंताजनक है। कविता पाठ मजबूरी में किए जाते हैं। दिन पर दिन स्थितियाँ ऐसी होती जा रही हैं कि लोग साहित्य और कविता से दूर होते जा रहे हैं। जनकवि नागार्जन जी के हवाले से उन्होंने कहा," कोर्स में लग जाने वाली कविता सुहागिन कविता होती है।"
सामान्य पाठक तक कविता पहुँचने की प्रक्रिया बहुत जटिल हो गयी है। कविता पढ़ने में दिलचस्पी बनी रहे यह आसान बात नहीं है। "कितनी कम जगहें हैं " की कविताएँ पढ़ते हुए कविता में दिलचस्पी बनी रही। यह कविता संकलन की सफलता है।
पिछले दो-तीन दशकों की कविता विचारों की सघनता की कविता सहज नहीं रह पाती।
अपने गुरु मैनेजर पांडेय के हवाले से प्रोफ़ेसर आनंद शुक्ल ने बताया कि कवि तीन तरह के होते हैं :
-पहली तरह के कवि वे होते हैं जिनके लिए कविता लिखना शतरंज खेलने जैसा बौद्धिक काम होता है।
-दूसरी तरह के कवि कविता को मदारी के बंदरिया की तरह इस्तेमाल करते हैं।
-तीसरी तरह के कवि वे होते हैं जो आत्मा की पुकार पर कविता लिखते हैं।
" कितनी कम जगहें हैं" के बहाने आज के समय पर चर्चा करते प्रोफ़ेसर आनंद शुक्ल ने कहा कि आज तमाम उन बातों की जगहें (space) कम जो जीवन के लिए ज़रूरी हैं। प्रेम और संवेदना के लिए जगह कम हो रही है। आज का मीडिया युद्द को मनोरंजक बनाकर पेश करता है। इसकी शुरुआत पिछली सदी के नब्बे के दशक में हुई थी इराक पर अमेरिकन स्टड मिसाइलें गिर रहीं थी और लोग बीयर, चाय, काफ़ी उनको देखते हुए अपना मनोरंजन कर रहे थे। आज वही हाल गाजा में इज़रायली मिसायलें कर रही हैं। लोग उनको निर्लिप्त भाव से देख रहे हैं क्योंकि उनकी ज़िंदगी दांव पर नहीं लगी है।
दुनिया भर में विभाजन की राजनीति हो रही है। हर जगह मामला अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक के रूप में बदलता जा रहा है। यह अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक समुदायों तक ही सीमित नहीं रह गया है। जिस किसी भी विचार और सोच के लोग कम हैं, भले ही वे कितनी भी अच्छी सोच के क्यों न हों, उन पर वे लोग हावी हो रहे हैं जिनके मानने वाले संख्या में ज़्यादा हैं। हर जगह यही काम हो रहा है। संस्थानों में, समाज में। कुम्भ में भी यही हो रहा है।
अपनी बातचीत में प्रोफ़ेसर आनंद शुक्ल ने सीमा सिंह की कुछ कविताओं का ज़िक्र भी किया। उन्होंने कहा कि सीमा सिंह की कविताएँ पढ़ने में दिलचस्पी जगाती हैं। इस तरह की कविताओं का स्वागत किया जाना चाहिए।
सीमा सिंह के कविता संकलन के बाद राजेश अरोड़ा जी के कविता संकलन 'चिट्ठियाँ ' पर नलिनी रंजन सिंह जी ने चर्चा की। कवि,आलोचक और सम्पादक नलिन रंजन सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। वे जयनारायण पीजी कालेज, लखनऊ के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष हैं।
राजेश अरोड़ा ने स्वयं अपनी कविताओं के बारे में बताते हुए लिखा है :
"मेरी किताब पढ़ते हुए आपको लगेगा जैसे आप खुद को पढ़ रहें है, बिल्कुल साधारण सी जिंदगी जीते हुए। जो महसूस हुआ, संवेदना, प्यार , गुस्सा और अपने समय का दबाव। न कोई दम्भ , न कुछ बड़ा बनाने या अलग दिखने की चाह है। बहुत आम सी कविताएँ है यह।इसमें मेरे जिये 40 वर्षो की यात्रा है। उस समय से लगातार बदलते हुए सामाजिक,राजनीतिज्ञ दबाव और उसमें मेरे स्वर भी दिखेगें। बाकी आप के हाथ में है पुस्तक पढ़ते पढ़ते रुक कर फिर पढ़ने का मन करे तो सफल है।"
नलिन रंजन सिंह जी ने राजेश अरोड़ा जी की कविताओं पर बात की शुरुआत करते हुए राजस्थान के एक मंत्री का क़िस्सा सुनाया :
"मंत्री जी ने बच्ची से पूछा," किस क्लास में पढ़ती हो?"
"टेन्थ में" , बच्ची ने जवाब दिया।
"टेंथ में पढ़ती हो? हमको तो बताया गया था दसवीं में पढ़ती हो" ,मंत्री जी ने कहा।"
सम्भव है मामला हिंदी-अंग्रेज़ी का रहा हो लेकिन जिस देश के कर्णधार समाज के चलन में सहज भाषा से इतने अनभिज्ञ हैं उनकी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की सोच का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
नलिन रंजन सिंह जी ने कहा कि आज के समय में सोशल मीडिया के चलन के चलते आज सम्पादक की हैसियत कम हुई। आम लोगों के अभिव्यक्ति अवसर मिले हैं। आम तौर पर कविता स्तर कम हुआ है। लेकिन अच्छी कविता भी लिखी जा रही है, भले ही कम मात्रा में हो।
'चिट्ठियाँ' कविता संग्रह पर बात करते हुए नलिन रंजन सिंह जी ने कहा कि चिट्ठी स्मृति की परिचायक है, आज स्मृति पर हमला हो रहा है, चिट्ठियाँ दिल से निकलती हैं, चिट्ठियाँ हैं तो संवेदना बची हुई है, प्रेम बचा हुआ है,स्नेह बचा हुआ है।
पुराने समय में लेखकों द्वारा एक-दूसरे को लिखे पत्रों से उनके बारे में बहुत जानकारी मिलती है। उनके व्यक्तित्व का पता चलता है। चिट्ठियों के माध्यम से लेखक अपने समय के हालात बयान करता है। उन्होंने दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के शेर के हवाले से कहा :
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूंं
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
राजेश अरोड़ा जी की कविताओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा :
"अपनी इत्तफ़ाक़न बनी पत्नी के नाम" जिस तरह की कविताएँ राजेश जी ने लिखी हैं वैसी कविताएँ हिंदी में कम लिखी गयी हैं।" केदारनाथ अग्रवाल और कुछ और लोगों ने ज़रूर अपनी जीवन संगिनी के लिए कविताएँ लिखी हैं। "राजेश जी अपनी शब्दों को लेकर बहुत सजग हैं।"
राजेश जी की कुछ कविताओं का ज़िक्र करते हुए नलिनी रंजन सिंह ने उनकी ख़ूबसूरती की चर्चा की।
जब नलिन रंजन सिंह हिंदी साहित्य में चिट्ठियों का ज़िक्र कर रहे थे तो मैं सोच रहा था कि शायद वे प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव के सम्पादक अखिलेश जी की प्रसिद्ध कहानी 'चिट्ठी' का ज़िक्र भी करेंगे। लेकिन उन्होंने अपने ही गुरुकुल ( इलाहाबाद यूनिवर्सिटी) में पढ़े अखिलेश जी की इस कहानी का ज़िक्र नहीं किया। नहीं याद रहा होगा उस समय या शायद उतना ज़रूरी न लगा हो उसका ज़िक्र करना। लेकिन मुझे अखिलेश जी की कहानी चिट्ठी बहुत पसंद है। इतनी पसंद कि इस लंबी कहानी को खुद से टाइप करके मैंने इसे अपने ब्लाग में पोस्ट किया था ( आप भी पढ़ सकते हैं।लिंक टिप्पणी में दिया है)
कविता संकलन पर विचार विमर्श के बात इंटरवल हो गया और आपस में चाय पर चर्चा शुरू हो गयी।
इंटरवल के दौरान खान अहमद फ़ारुख साहब से बातचीत हुई। अकार पत्रिका (अकार -68) के 'संस्मरण अंक' में फ़ारुख साहब का शम्सुर्रहमान फ़ारूखी जी पर लिखे बहुत आत्मीय, बहुत प्यारे संस्मरण की तारीफ़ की। यह तारीफ़ बहुत दिनों से उधार थी। अकार पत्रिका का यह अंक संग्रहणीय है। प्रिंट में उपलब्ध नहीं है। नाटनल साइट पर पढ़ सकते हैं।
इस इंटरवल के दौरान ही राजेश अरोड़ा जी ने अनीता मिश्रा को इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए अलग से धन्यवाद देते हुए बताया कि तीन दिन बाद पाँच फ़रवरी को उनकी वैवाहिक वर्षगाँठ है। उनका और रोमी का विवाह 5 फ़रवरी, 1989 को हुआ था।
कार्यक्रम की शुरुआत में, अनीता मिश्रा, संध्या त्रिपाठी जी और मौली सेठ जी जो कि बसंत पंचमी के अनुरूप बसंती वस्त्र धारण करके आईं थी, मेरे बहाने पुरुष बिरादरी से मज़े लेते हुए कहा, ' आमतौर पर पुरुषों को कपड़े पहनने का सलीका नहीं होता। अवसर के अनुकूल कपड़े पहनने के प्रति सजग नहीं रहते ।' इस सचाई पर कल तो कुछ नहीं कह पाए लेकिन आज यह पोस्ट लिखते समय श्रीमती जी को यह बात बताई तो उन्होंने कहा,' बसंत पंचमी आज ही है।' संयोग से आज जो ड्रेस हमको पहनने के लिए इशू हुई है उसमें पीली टी शर्ट भी शामिल है।
इंटरवल ख़त्म होने के बाद कविता पाठ हुआ। इसमें ख़ुशी गुप्ता, एसपीसिंह, नूर आलम, सीमा सिंह, रमाशंकर सिंह, राजेश अरोड़ा, शालिनी सिंह,डा संजीव सिकरोरिया, पंकज चतुर्वेदी और नलिन रंजन सिंह ने कविता पाठ किया।
लगभग सभी लोगों ने मोबाइल से देखते हुए कविता पाठ किया। आजकल कविता पाठ मोबाइल पाठ में बदल में गया है। लोग याद करके कविताएँ नहीं पढ़ते। आधा क्या पौना ध्यान मोबाइल खा जा जाता है। कविता के प्रभाव पर असर पड़ता है। मेरी समझ में कवियों को अपनी पसंदीदा कविताएँ याद कर लेनी चाहिए ताकि उसे बिना मोबाइल या काग़ज़ के प्रभावी अन्दाज़ में सुना सकें।
कार्यक्रम स्थल पर जनवादी लेखक संघ , उत्तरप्रदेश के कवियों की कविताओं का साझा संकलन ‘जनरव’ भी उपलब्ध था। 48 कवियों की कविताओं का सेतु प्रकाशन से प्रकाशित 299 रुपए का कविता संकलन दो सौ रुपए में मिल गया। सीमा सिंह और राजेश अरोड़ा के कविता संकलन भी होते तो और अच्छा रहता।
कार्यक्रम के सुंदर, सफल संचालन के लिए शालिनी सिंह जी को बधाई। कार्यक्रम में बुलौवे और इंतज़ाम के अनीता मिश्रा जी को धन्यवाद। कार्यक्रम में चाय-पानी-नाश्ते के इंतज़ाम के लिए राजेश अरोड़ा जी का आभार।
जैसा ख़ुशनुमा इतवार कल बीता वैसा हर इतवार बीते। सबका बीते ।
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