रात झाँसी आए। बुंदेलखंड लिट्रेचर फेस्टिवल में शिरकत करने। चौथा फेस्टिवल है। किसी लिट्रेचर फेस्टिवल में शिरकत करने का पहला मौक़ा है। तीन दिन के इस कार्यक्रम में हमारे अलावा साहित्य जगत के बड़े ख़लीफ़ा आलोक पुराणिक Alok Puranik, नीरज बधवार Neeraj Badhwar , अनुज खरे Anuj Khare और बाबुशा कोहली Baabusha Kohli ( हमारी जबलपुरिया मोगैम्बो) भी पधार रहे हैं। आना ज्ञान चतुर्वेदी जी को भी था। उनके कार्यक्रम के संचालन के लिए हमको 23 तारीख को रोका गया था। इसी हिसाब से टिकट बनवाया गया। लेकिन कल पता चला कि ज्ञान जी नहीं आ रहे हैं। अब पहले निकलने का हिसाब देखेंगे या घूम लेंगे एक दिन झाँसी और।
झाँसी पहली बार आए थे 1983 में। साइकिल से भारत यात्रा करते हुए लौटते में। तीन दिन ठहरे थे। उसके बाद तो कई बार आना हुआ झाँसी। पिछली बार एक शादी में आए थे। ओरछा भी गए थे। ओरछा में कुछ जगहें और बेतवा नदी में नहाना रह गया था। क्या पता इसीलिए आख़िरी दिन रुकना हो रहा हो।
सबेरे टहलने निकले। सड़क पर कूड़ा जमा करने वाली गाड़ी में होटल वाला कूड़ा जमा कर रहा था। ड्राइवर सीट पर बैठा बहादुर मोबाइल देख रहा था। शायद स्टेटस अपडेट कर रहा होगा -‘कूड़ा बटोर रहे हैं।’
सड़क पर एक नौजवान पिट्ठू बैग पीठ पर लादे मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। किक पर किक मारे जा रहा था लेकिन मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी। हम उसको देखते हुए आगे बढ़ गए। कुछ कर भी तो नहीं सकते थे। कोई बालिका होती तो शायद कहते कि लाओ हम लगा के देखें किक शायद स्टार्ट हो जाये। जेंडर की बड़ी भूमिका होती है सहायता करने में।
आगे ओवरब्रिज के नीचे बुंदेलखंड के कई महापुरुषों के चित्र खंभे में बने थे। उनके नीचे लिखा था -‘बुंदेलखंड के गौरव।’
उनको देखकर लगा कि बेचारे सर्दी, गर्मी, बरसात में हमारे ये आदरणीय, पूजनीय खम्भे में टिके गौरव बढ़ते रहते हैं, इनके नाम पर गौरवान्वित लोग मजे से मलाई खाते रहते हैं।
चौराहे पर चाय की दुकान पर चाय पीने के लिए रुके। बेंच पर बैठकर चाय पीने की मंशा से अंदर घुसते ही ऊपर का डाला सर पर लगा। सर सहलाते हुए दुकान वाले से शिकायत की तो बोला -‘उल्टा लग गया है।’
अंदर बैठकर फिर शिकायत की तो उसने मुआवजे के रूप ने चाय का ग्लास पकड़ाकर मेरा मुँह बंद कर दिया। फिर बयान जारी किया -‘इसे ठीक करवाना है।’
हमको लगा कुंभ और दिल्ली में ट्रेन दुर्घटना के फौरन बाद मुवावजे की घोषणा और व्यवस्था बनाने की घोषणा सरकारों ने इस चाय वाले से सीखी होगी।इस तरह की हरकतों का कोई कापी राइट भी तो नहीं होता।
चाय पीते हुए एक महिला की एक ऑटो वाले से बहस और गाली गलौज भी सुनी। एक भिखारिन महिला जमकर आटोवाले को किसी बात पर गरिया रही थी। आटोवाला हंसते हुए उसका जवाब दे रहा था। चाय वाला मुस्कराते हुए चाय छानते हुए गाली-जुगलबंदी सुन रहा था। कुछ देर बाद आटोवाला चला गया। महिला भी शांत होकर इधर हो गई।
चाय में बुंदेली अंदाज़ में चीनी पड़ी थी। कई दिन से कम चीनी का कोटा पूरा हो गया।
लौटते हुए देखा एक नई के पानी में लगे रबड़ की पाइप से दो महिलायें पानी पालीथीन के बोरे दो रहीं थीं। थोड़ी दूर पर खड़े दो आदमी उनको यह करता देख रहे थे। हम उन लोगों को सड़क की दूसरी तरफ़ से देख रहे थे। क्या पता कुछ और लोग भी इस देखा-देखी में लगे हों। मेहनत करने वाले दो, देखने वाले बीस।
वहीं पर कर्मयोगी ध्यानचंद की प्रतिमा लगी देखी। पीछे बुंदेलखंड लिट्रेचर फेस्टिवल का बड़ा बोर्ड खम्भे पर लगा था। अपना कमरे में लौट के आए। हमारे पीछे चाय भी आ गई।
चाय पीते हुए कार्यक्रम का विवरण देखा। हमारे नाम के आगे डा लिखा था। डा अनूप शुक्ल। हमने यह डाक्टरी वापस करने की कोशिश की। आयोजकों को बताया कि हम डाक्टर न हैं। उन्होंने कहा , अब तो पोस्टर छप गए हैं। अब कुछ नहीं हो सकता। कार्यक्रम के दौरान तो डाक्टरी बरदाश्त करनी पड़ेगी। हमने भी सोचा कोई बात नहीं पड़ी रहेगी डिग्री मानद उपाधि की तरह। कभी विरोध करना होगा तो वापस करने के काम आएगी।
आलोक पुराणिक Alok Puranik हर बात को आर्थिक नज़रिए से देखते हैं। उन्होंने सलाह दी -'कोई पूछे तो बता देना शर्तिया इलाज वाले डाक्टर हैं। बहुत स्कोप है इस धंधे में। ख़ूब कमाई होगी।'

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