दूसरे दिन हम लोग झाँसी का क़िला देखने गए। सबेरे दस बजे खुलता है क़िला दर्शन के लिए। हम लोग मतलब अपन और प्रोफ़ेसर Alok Puranik होटल में नाश्ता करके दस बजे क़िले पहुँच गए। बारह बजे से सत्र शुरू होना था। सोचा था सत्र शुरू के पहले क़िला दर्शन कर लिया जाए।
सौ रुपए किराया पड़ा आटो का होटल से । चार किलोमीटर के सौ रुपए यह कहकर चार्ज किए आटो वाले ने कि क़िले से वापसी की सवारी नहीं मिलती।
झाँसी का क़िला बुन्देल राजा बीरसिंह जुदेव ने 1613 में बनवाया था। क़िले पर मुग़लों, मराठों और अंग्रेजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारुशंकर ने 1729-30 में इस क़िले का पुनर्निर्माण कराया और क़िला शंकरगढ़ के नाम से जाना गया। 1857 की आज़ादी की लड़ाई में झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई ने इस क़िले से लड़ाई की। अंग्रेजों द्वारा घेर लिए जाने पर क़िले से अपने घोड़े पर बैठकर निकल गयीं। आगे वे ग्वालियर के पास शहीद हुईं। उनको याद करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की पंक्तियाँ क़िले में जगह-जगह उत्कीर्ण हैं :
बुंदेलो हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह टो झाँसी वाली रानी थी।
क़िले का टिकट 25 रुपए है। डिजिटल पेमेंट करने पर बीस रुपए। पाँच रुपए प्रति टिकट के दस रुपए की बचत की अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर आलोक पुराणिक जी ने।
इतवार होने के कारण छुट्टी का दिन था। तमाम लोग क़िला देखने आए थे। लोग जगह-जगह फ़ोटो खिंचा रहे थे। एक लड़का अपने दोस्त के मोबाइल कैमरे के सामने स्टाइल में फ़ोटो खिंचा रहे थे। हमने उससे पूछा -'शाहरुख़ खान की इस्टाइल है क्या यह?' उसने मेरी इस्टाइल समझ पर तरस खाते हुये बताया-'नहीं ये अमिताभ बच्चन की इस्टाइल है।' इसके बाद उसने हाथ फैलाकर बताया -'ये है शाहरुख़ खान की इस्टाइल।'
मंदिर के प्रवेश द्वार के पास ही कड़क बिजली तोप देखने के बाद टहलते हुए पूरा क़िला घूम। गणेश मंदिर, शिव मंदिर, रानी का पंच महल, रानी झाँसी के तोपचियों की समाधियाँ और वह जगह जहां से कूदकर रानी झाँसी क़िले से निकली थी। कूदान स्थल के पास भी खड़े होकर हमने फ़ोटो खिंचवाए।
कूदान स्थल से बुंदेलखंड लिट्रेचर मेला का मैदान दिख रहा था। ऊँचाई से घोड़े से कूदकर रानी कैसे निकली होंगी क़िले से यह सोचकर ताज्जुब करते रहे।
क़िला क़रीब घंटे भर में घूम लिया हम लोगों। इसके बाद क़िले के फाटक के पास एक चबूतरे पर बैठकर आराम करते हुए क़िले के पर्यटकों को आते-जाते देखते रहे। किसी स्कूल के बच्चों को उसके मास्टर साहब क़िला घुमाने लाए थे। एक युवा गाइड उन बच्चों को झाँसी के क़िले का इतिहास बता रहा था:
" 1842 में विवाह के समय रानी लक्ष्मीबाई की उमर 13 वर्ष और उनके पति गंगाधर राव की उमर 45 वर्ष थी। दोनों के उमर में 32 वर्ष का अंतर था। राजा गंगाधर राव का निधन 1853 में हुआ। मतलब रानी का वैवाहिक जीवन लगभग 11 वर्ष रहा।"
बच्चों को उनके मास्टरों के हवाले छोड़कर हम लोग टहलते हुए क़िले से बाहर आ गए। जनरल विपिन रावत शहीद पार्क पर BLF हमारा इंतज़ार कर रहा था।

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