Thursday, February 27, 2025

विजय नगर चौराहा

 


कल विजयनगर चौराहे से गुजरते हुए देखा कि मेट्रो के खम्भे के आसपास लगा टीन-टप्पर खुल गया है। खंभा साफ़ दिखने लगा है।

विजय नगर चौराहा पहले पहले गंदा नाला चौराहा के नाम से जाना जाता था। आटो वाले एक सवारी गंदा नाला, गंदा नाला कहते सुनाई देते थे। आजकल विजय नगर चौराहा ज़्यादा सुनाई देता। हालाँकि नाला वहीं है, चौराहा भी वही है।
जिस चौराहे पर आज मेट्रो का खंभा दिखा वहाँ पहले वीर रस के कवि भूषण की मूर्ति थी। भूषण जी कानपुर ज़िले की घाटमपुर तहसील के टिकवापुर गाँव में पैदा हुए थे। वे मोरंग, कुमायूँ, श्रीनगर, जयपुर, जोधपुर, रीवाँ, छत्रपती शिवाजी महाराज और छत्रसाल आदि के आश्रय में रहे, परन्तु इनके पसंदीदा नरेश छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराजा छत्रसाल थे। वे कहते हैं :
और राव राजा एक मन में न ल्याऊं अब।
साहू को सराहों कै सराहौं छत्रसाल को॥
(और किसी राजा के बारे में नहीं सोचता। या तो शिवाजी की सराहना करूँ या छत्रसाल की)
भूषण जी यह उक्ति इसी तरह की है जैसे कोई नौकरी पेशा व्यक्ति कहे इतनी जगह नौकरी की लेकिन मज़ा दो जगह आया।
विजयनगर चौराहे पर कवि भूषण जी की मूर्ति की स्थापना में स्व बद्री प्रसाद तिवारी जी का बड़ा योगदान था। उन्होंने शहर में कई जगह शहर से जुड़े महापुरुषों की मूर्तियाँ लगवाईं थी। अब वे नहीं हैं। भूषण जी की मूर्ति अब कहीं लगेगी या नहीं कहना मुश्किल। सम्भव है जब विजयनगर मेट्रो बने तो भूषण जी की प्रतिमा वहाँ लग जाए। कानपुर इतिहास समिति शायद इस बारे में आवाज़ उठाए।
गुमटी में एक दुकान के बाहर एक स्त्री मैनीक्वीन के हिस्से सड़क पर पड़े थे। टाँगे अलग धड़ अलग। सर नदारद। शायद दो मैनीक्वीन के ख़राब टुकड़े बाहर फेंक दिए गए थे। ऐसा जैसे खबरों में लिखा होता है -'महिला के शव के टुकड़े पाए गए। टाँगे और धड़ अलग-अलग शरीर के। सर लापता।' वैसे भी महिलाओं के सर वाले हिस्से से दुनिया असहज रहती है। इसी लिए सर ग़ायब कर दिया।
कहानी लिखने का हुनर और धीरज होता तो इसी पर एक कहानी खैंच देते।
मैनीक्वीन से याद आया कि हमारे कपड़ों की जब कोई तारीफ़ करता है तो हम कहते हैं जो कि सच भी है -"हम तो मैनीक्वीन हैं। जो कपड़े पहना दिए जाते हैं पहन लेते हैं। हमारी अपनी कोई पसंद नहीं।"
लौटते में एक दुकान पर गन्ने का रस पीने के लिए रूके। बीस रुपए का एक ग्लास। रस पीते हुए कुलदीप नैयर जी का लिखा एक क़िस्सा याद आया जिसमें उन्होंने बताया था कि एक बार वो शास्त्री जी के साथ कहीं जा रहे थे। क्रासिंग बंद थी तो शास्त्री जी ने कहा -'जब तक क्रासिंग खुलती है तब तक आइए गन्ने का रस पी लेते हैं।' उन लोगों ने रस लिया और क्रासिंग खुलने पर आगे बढ़े।
गन्ने की दुकान पर बैठी महिला ने बताया कि उसका मायका ग़ाज़ीपुर में है। बचपन से ही पिता यहाँ आ गए तो यहीं पली-बढ़ी यहीं शादी हुई । यहीं रहना हो रहा है।
हमने पूछा कि गर्मी में गन्ने का रस बेचती हो। बाक़ी समय में क्या काम चलता है। उसने बताया -'साल भर यही काम चलता है।'
हमने बर्फ़ डालने से मना किया था तो मेरे रस पीते हुए पूछा -'ज़्यादा ठंडा तो नहीं?'
हमने रस पीकर काग़ज़ का ग्लास डस्ट बिन में डालते हुए देखा कि उसमें कोई और पहले से नहीं पड़ा था तो पूछा -'सबेरे से पहली ग्लास बिका क्या?' इस पर उसने कहा,' नहीं , और बिके हैं।' फिर उसने उचककर डस्टबिन देखी और कोई और ग्लास न पाकर कहा, 'कूड़ा वाला ले गया शायद।'
चलते समय फ़ोटो खींची। उसको दिखाई। फ़ोटो देखकर हंसते हुए सर पल्ला कर लिया। हमने नाम पूछा तो बोली -'अरे, नाम का क्या करना?'
उसकी बात सुनकर बहुत पहले शुक्लागंज की तरफ़ जाते हुए लइया-चने की दुकान पर मिली महिला की बात याद आ गयी। नाम पूछने पर बोली थी -'नाम कुछ नाईं है हमार। नाम हेरा गा है।' (हमारा नाम कुछ नहीं है। नाम खो गया है।)
(पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
दोपहर हो गयी थी। घर से बुलावा आ गया था। घर की बात से अपनी ही कविता की याद आ गयी :
"घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।"
हम घर लौट आए। सोचा आपको भी बता दें।

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