कल पुस्तक मेला जाना हुआ। दोपहर बाद निकले। नोयडा सिटी सेंटर से मेट्रो पकड़ी। मेट्रो में भीड़ नहीं थी लेकिन सीटें खाली नहीं थीं। खड़े-खड़े यात्रा शुरू हुई।
बगल में एक महिला किसी से वीडियो कॉल करते हुए बतिया रही थी। उसका बच्चा बगल में खड़ा पेप्सी की छुटकी बोतल का बंद ठक्कन मुंह से खोलने की कर रहा था। सामने एक लड़का-लड़की अपने-अपने कप से कुछ शिप करते हुए इतने धीरे-धीरे बतिया रहे थे कि शायद उनको भी सुनाई न दे रहा हो। वो बतियाने में मशगूल थे, लोग उनको बतियाते देखते हुए खिड़की के बाहर का नजारा देखते हुए स्टेशन गुजरते देख रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्ट्रेशन से उतरकर प्रगति मैदान पुस्तक मेला की तरफ गए। काफी आगे जाकर लिफ्ट से उतरकर सड़क पार करके प्रगति मैदान का रास्ता है। सड़क से गुजरती गाड़ियां इतना तेज भन्नाती हुई जा रही थीं मानो पुस्तक मेला जाने में नाराजगी का इजहार कर रही हों।
पुस्तक मेले की शुरुआत समांतर पुस्तक मेले से हुई। सड़क किनारे, फुटपाथ पर और जहां जगह मिली वहां कई किताबों की दुकानें लगी थीं। दुनिया भर के तमाम बेस्टसेलर लेखकों की किताबें पर बिकने को बेताब थीं। सभी दुकानों पर लगभग एक जैसी किताबें।
लोग फुटपाथ पर बिछी किताबो को उड़ती या टहलती नजर से देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ लोग किसी खास किताब के बारे में पूछते और अक्सर उत्तर नकार में मिलता। पूछने वाले को पैसे बचने और अपनी पसन्द की किताब के खास होने का सुख एक साथ मिलता।
किताबों की दुकानों के आगे खोमचों , ठेलियों पर चाट, छोला भटूरा और दीगर खाने के सामान धडल्ले से बिक रहे थे। कुछ सुरक्षा गार्ड किताबों की दुकानों वालों से अनमने ढंग से दुकानें हटाने को कह रहे थे। दुकान वाले भी सुरक्षा गार्ड को देखकर किताबें इधर से उधर कर देते। सुरक्षा गार्ड दूसरी दुकानों को हटाने के लिए आगे बढ़ जाते। साथ-साथ वे खोमचे वालों को हटाते जा रहे थे जो कि हटते-हटते वहीं जमे थे।
एक किताब वाले ने अपने सामने के खोमचे वाले को हटाने के लिए जोर से कहा -'हटो सामने से, छह दिन से बिक्री चौपट कर रखी है। खोमचा वाला थोड़ा हटकर दुकान के और ज्यादा आगे खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद फिर सब लोग एक दूसरे को हटने के लिये कहते हुए वहीं जमे रहे।
मेले के टिकट आनलाइन मिल रहे थे। मेट्रो एप डाउन लोड करना था उसके लिए। मतलब मेला केवल स्मार्ट फ़ोन धारियों के लिए है। यह बताने का यह मतलब कत्तई नहीं है कि अपन अपन को स्मार्ट कहलाना चाहते हैं। वैसे अगर आप मान भी लें तो अपन को एतराज नहीं होगा।
20 रुपए का टिकट ख़रीद कर आगे बढ़े। एक प्रकाशन की बस यात्रियों को पुस्तक मेला तक ले जाने के लिए लगी थी। लेकिन उसके लिए लंबी लाइन लगी थी।इसलिए अपन पैदल ही चल दिए ।
आगे अलग-अलग हाल में अलग-अलग प्रदर्शनी लगी दिखीं ।हाल 14 में नक्षत्रलोक सजा था। पुस्तक मेला हाल दो से पांच तक पुस्तक मेला सजा था।
बाहर लान में तमाम लोग मस्तियाते हुए मेले के मजे ले रहे थे। एक जगह कुछ लोग बैठकर शेरबाज़ी कर रहे थे। एक ने कोई शेर सुनाया तो बाक़ी लोग वाह , वाह क्या बात है , बहुत खूब करने लगे। एक लड़का और लड़की एक सेव हाथ में लिए एक दूसरे से खाने की मनुहार कर रहे थे। इस चक्कर में सेव बेचारा बोर हो रहा था। बाद में दोनों ने थोड़ा-थोड़ा सेव खाकर बातों के रथ हांकते रहे।
एक स्कूल की टीम के गुरु जी सबके साथ फ़ोटो लेते हुए कहा , फ़ोटो अच्छा आना चाहिए। कालेज की वेबसाइट पर लगायेंगे।
पुस्तक मेले की ओर बढ़ते हुए मन सहज डर हावी हो गया कि कहीं कोई ऐसा मित्र न मिल जाये जिसकी किताब पुस्तक मेले में मौजूद हो। मुरव्वत में किताब ख़रीदनी पड़ेगी , भले ही पढ़ना न हो सके।
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