कल सबेरे होटल में नाश्ता करने के बाद होटल बदल गया। Alok Puranik और Neeraj Badhwar नज़दीकी के चलते होटल ट्विन्स से होटल लेमन ट्री में आ गए। बड़े लोगों की संगत का फ़ायदा होता है।
होटल में सामान धर के अपन आलोक पुराणिक जी के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे। नीरज बधवार को कुछ काम करना था सो वे होटल में रुक गए, बाद में आने के लिए।
कार्यक्रम स्थल पर अक्षत-रोली का टीका हुआ। आत्मीय स्वागत हुआ। स्वागत के बाद हमारे लिए एक बिल्ला दिया गया जिस पर 'मानदान' लिखा था। मानदान मतलब मान्य। बुंदेलखंड में मान्य उन रिश्तेदारों को कहते हैं जिनके यहाँ घर की कन्यायों के विवाह होते है। फूफा, जीजा, दीदी, बुआ आदि रिश्ते मान्य में गिने जाते हैं। उनका बुंदेलखंड में बहुत सम्मान होता है। आयोजन के काम में लगे लोग 'घराती' का बैज लगाए हुए। घराती मतलब घर के लोग जिनको अपने आमंत्रित आगंतुकों का ख़्याल रखना है। इतने आत्मीय स्वागत से मन खुश हो गया।
कार्यक्रम का झाँसी के क़िले के नीचे जनरल विपिन रावत शहीद उद्यान में हो रहा है। खूबसूरत, विस्तृत पार्क में भव्य आयोजन। वहाँ किताबों की दुकानें, खेल-खिलौने वाली गाड़ियाँ और मनोरंजन के ठिकाने भी।
लोग बाग वहाँ मेले में घूमते हुए मज़े ले रहे थे। एक बालिका ने अपनी माता जी को कहा -'अम्मा तुम लोग मेला घूम आओ तब तक हम यहाँ वीडियो बना रहे।'
किताबों की दुकान से हम लोगों ने कुछ किताबें भी लीं। इनमें एक किताब हमारे वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न DrArvind Mishra (जो आजकल भक्त समुदाय में शामिल होकर जीवन का आनंद ले रहे हैं) की थी। 'कुम्भ मेले में मंगलवासी' शीर्षक इस किताब में विज्ञान गल्प कथाएँ हैं। 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी इस किताब के पहले उनकी विज्ञान गल्प की एक और किताब 'एक और क्रौंच वध' छपी थी। बारह विज्ञान गल्प वाली उस किताब के बारे में लिखी पोस्ट और उस पर साथियों की टिप्पणियों को अभी फिर से पढ़ते हुए उस समय के आपसी सम्बन्ध की याद आ गयी। अरविंद मिश्र जी को विज्ञान गल्प लिखते रहना चाहिए।
दूसरी किताब आलोक पुराणिक Alok Puranik जी की सलाह पर ली - विश्वास पाटिल की लिखी किताब पानीपत। इसे बहुत ज़रूरी किताब बताया है आलोक पुराणिक जी ने।
कार्यक्रम के उद्घाटन के बाद विभिन्न सत्र हुए। लंच की शानदार व्यवस्था वहीं उद्यान में थी। लंच करके हम लोग पास ही स्थित झाँसी म्यूज़ियम देखने चले गए। झाँसी और बुंदेलखंड से जुड़ी तमाम धरोहरों को देखा। झाँसी की रानी से जुड़ी कई स्मृतियाँ वहाँ मौजूद हैं। हेलिकाप्टर की वर्चुअल राइड में आसपास की इमारतों का हवाई सर्वे भी कर लिया। विभिन्न समय के सिक्के देखे। इसके अलावा झाँसी के प्रसिद्ध साहित्यकार वृंदावन लाल वर्मा जी से जुड़ी तमाम यादें देखें। उनके हस्तलेख में लिखे उनके उपन्यासों के पेज वहाँ मौजूद थे।
म्यूजियम से निकलकर हम लोगों ने कटप्पा मामा की चाय की दुकान पर चाय पी। दुकान पर सामने की तरफ़ लिखा था -'मेरे करन अर्जुन चाय पीने आएँगे!' इस आशा जनक बयान के बाद चाय की ठेलिया पर ग्राहक की तरफ़ से लिखा था -
'जब तक तुम चाय बनाते रहोगे,
मैं चाय पीने आता रहूँगा मामा!'
चाय पीकर लौटते में कुशवाहा जी चाय स्टाल भी मिला। वहाँ चाय नहीं पी, बस फ़ोटो खैंच ली।
कार्यक्रम स्थल पर लौटकर वहाँ चल रहे विभिन्न सत्रों की बातचीत सुनी। इनमें आदिवासी चिंतन: अस्तित्व का संकट, वर्तमान परिवेश में उच्च शिक्षा, कुछ राग कुछ रंग और आख़ीर में नीरज बधवार का जुमला जंक्शन पर बातचीत थी। आदिवासी चिंतन वाले सत्र के बाद में लेखक संदीप मुरारका की किताबों के विमोचन में हम लोग भी मंच पर बुला लिए गए। उसकी फ़ोटो भी आज अमर उजाला में छपी। वर्तमान परिवेश में उच्च शिक्षा सत्र में डा रचना विमल दुबे ने उच्च शिक्षा के विविध पहलुओं पर अच्छी बातचीत की।
पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। उन्होंने अपनी बातचीत के दौरान अपने लेखन और प्रशासकीय अनुभव साझा किए। अपने सेवा काल के दौरान तनाव से बचने के उपायों में से एक उन्होंने बताया कि वे बेगम अख़्तर और मेहंदी हसन की ग़ज़लें सुना करते थे।
जुमला जंक्शन में आज की मीडिया, जुमलेबाज़ी, सामाजिक मीडिया पर बहुत अच्छी बातचीत की। उनके साथ अनुज खरे को भी आना था लेकिन वे आ नहीं पाए। नीरज बधवार से बातचीत की वरिष्ठ पत्रकार अरिंदम घोष ने। वहाँ मौजूद बच्चों ने कई सवाल भी पूछे। बहुत अच्छा सत्र रहा।
सत्र के बाद हम लोगों ने वहीं रात का खाना खाया। खाना खाकर होटल आ गए।
बुंदेलखंड लिटरेचर फ़ेस्टीवल में आयोजकों का सुंदर, आत्मीय व्यवहार और हर चीज़ को यथा सम्भव अच्छा करने की कोशिश लगातार दिखी। मुख्य आयोजक चंद्रप्रताप नेपथ्य से कार्यक्रम का संचालन करते दिखे। सबसे सुखद अनुभव आयोजन से जुड़ी युवा लोगों की टीम को देखकर हुआ। सब युवा बच्चे अपने-अपने कामकाज छोड़कर कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास में जुटे रहे। इधर-उधर दौड़ते-भागते इंतज़ाम में जुटे हैं। कई लोग कार्यक्रम के आयोजन के लिए बाहर से भी आए हैं, कोई गुड़गाँव से, कोई दिल्ली से, कोई कहीं और से। दफ़्तर से छुट्टी लेकर, इम्तहान की तैयारी स्थगित, कोई कालेज छोड़कर कार्यक्रम को सफल बनाने में लगे हैं। प्रशाशनिक लफड़ों के चलते कार्यक्रम स्थल अटल पार्क से बदलकर जनरन विपिन रावत पार्क होने के कारण भी बहुत मेहनत करनी पड़ी पूरी टीम को। सबको कार्यक्रम की सफलता के लिए जुटा देखकर बहुत अच्छा लगा। इस सुखद अनुभूति के लिए चंद्रप्रताप जी और उनकी पूरी टीम को बहुत बधाई , शुभकामनाएं।

No comments:
Post a Comment