Sunday, February 16, 2025

कोलम्बो के माउंट लाविनिया बीच की सुबह




 आज सुबह कोलंबो के माउंट लाविनिया बीच देखने आए। साथ में सुनील चतुर्वेदी Sunil Chaturvedi और उनके जीजा घनश्याम चतुर्वेदी जी । चार किलोमीटर की दूरी ऑटो से श्रीलंका के तीन सौ रुपये में तय हुई। बिल तो 309 रुपए का आया था। हमने पाँच सौ रुपए का नोट दिया तो आटो वाले रवि ने दो सौ रुपए वापस कर लिए। हमने भी हुज्जत नहीं की यह सोचकर कि 9 रुपए का डिस्काउंट मिला कोलम्बो में।

बीच के पहले रेलवे लाइन। उसके पार एक बच्ची दुकान कम घर ज़्यादा के सामने झाड़ू लगा रही थी। गंदगी नहीं थी फिर भी बार-बार रेत को सहेज रही थी। इससे बच्ची का सफ़ाई के प्रति लगाव साफ़ दिख रहा था। झाड़ू उस झाड़ू से अलग थी जो अभी तक दिल्ली में चल रही थी और अब जिसकी सींके बिखर गयीं हैं ।
हम पटरी पार कर रहे थे तब तक ट्रेन की सीटी सुनाई दी। हम बीच में थे लिहाज़ा जल्दी से लपककर पटरी पार कर गए। चतुर्वेदी द्वय जी दुर्घटना से देर भली पर अमल करते हुए ट्रेन के गुजरने का इंतजार करने के बाद पार आए।
बीच किनारे श्रीलंकन कोस्ट गार्ड का पोस्ट दिखा। लोगों को डूबने से बचाने के लिए। पोस्ट पर कोई दिखा नहीं, शायद इसीलिए कोई डूब भी नहीं रहा था।
वहाँ कुछ मछुवारे अपना जाल सुलझा रहे थे। पुलिस वाला उनके बगल में खड़ा था। शायद वह श्रीलंका कोस्ट गार्ड का सिपाही था।
लोग समुद्र किनारे टहलते, डुबकी लगाते, नहाते दिखे। कुछ लोग अपने साथियों की फोटो खींच रहे थे। फोटो खिंचवाने वालों में महिलाएं ज़्यादा थी, पुरुष उनकी फ़ोटो खींच रहे थे।
अपन लोग बीच किनारे ही एक पेड़ के तने पर बैठ गए। हमने अपने चतुर्वेदी जी ने हमारे फ़ोटो खींचे। हमारा समुद्र किनारे टहलते हुए वीडियो भी बनाया।
हमको एक दूसरे के फ़ोटो खींचते देखकर वहाँ साइकिल से टहलने आए एक कच्छाधारी भले मानस ने अपनी हमारे फ़ोटो खींचने के प्रस्ताव किया। हमने कैमरा उनको थमा दिया। उन्होंने हमारा फ़ोटो खींचा। हमने फ़ोटो खिंचते हुए उनका फ़ोटो खींच लिया। साईकिल के बगले में जाँघिया पहने झुके हुए फ़ोटो खींचते हुए फ़ोटोग्राफ़र पोज में बड़ा मज़ेदार फ़ोटो आया है।
कैमरा वापस करते हुए फ़ोटो खींचने वाले भाई जी ने बताया कि वे मूलतः केरल के रहने वाले हैं। मतलब उनके पिता केरल से हैं, माँ श्रीलंका की। यह परिचय उन्होंने अपने आप दिया। हमने सुनकर प्रसन्नता ज़ाहिर की। और कुछ बात करते तब तक वो समुद्र की तरफ़ बढ़ गए। कुछ देर बाद उनकी साइकिल भी नहीं दिखी। शायद वे चले गए थे।
हम जहां बैठे थे, सूरज हमारे पीछे था। हमारी छायाएँ बालू में लम्बी दिख रहीं थीं। हमको लगा अक्सर इमेज के साथ ऐसा ही होता है। दूसरे का सहारा लेकर लोग वास्तविकता से बड़ी छवियाँ बनाने, बनवाने का काम करते हैं। चूहे जैसे दिल वाले लोग अपने को बहादुर बताते हैं, पिद्दी सा हौसला रखने वाले अपनी छाती छप्पन इंच की बताते हैं, दुनिया भर की भ्रष्ट तरकीबें अपनाने वाले भारत माता की जय बोलकर अपने ईमानदार और देशप्रेमी बताते हैं। दुनिया भर में ऐसा हो रहा है। हमारी तस्वीर के साथ भी सही। हम सूरज को कुछ कह भी नहीं सकते। आप कुछ पूछ भी नहीं सकते क्योंकि ये हमारे और हमारी इमेज़ बनाने वाले सूरज भाई का व्यक्तिगत मामला है।
जो बड़ी इमेज हम लोगों की दिख रही थी उसके बीच में तमाम चप्पल जूतों के निशान भी दिख रहे थे। यह कुछ उसी तरह हैं कि जिस व्यक्ति की इमेज पीआर एजेंसी अच्छी बनाती है उस को तमाम लोग जुतियाने की मंशा भी रखते हैं। मन में ऐसा करते भी होंगे लेकिन मीडिया उसको सामने नहीं लाता।
इस बीच फ़ेसबुक पर Pradeep Sharma जी का एक कमेंट चमका तो हमने फ़ौरन उनको फ़ोन मिलाया और उनको कोलंबो के माउंट लाविनिया बीच के दर्शन मुफ़्त में कराए। साथ में इंदौर के घनश्याम चतुर्वेदी जी से बात भी कराई। दोनों इंदौरी बुजुर्ग इंदौर की बातों, गलियों, कूचे में घूमने लगे। मिलना-मिलाना भी तय हो गया। तब तक हम लोग बाक़ी समुद्र बीच के बाक़ी नज़ारे देखते रहे।

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