Saturday, February 08, 2025

पुस्तक मेले में

 


मेले में घुसते ही वही हुआ जिसका डर था। अभी अपन न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशंस के स्टाल पर पहुँचे ही थे, चंद्रा जी और आरिफा से बातचीत , शिकवे-शिकायत शुरू ही किए थे कि बगल के स्टाल से सैफ का फ़ोन आ गया। सैफ से बात पहले ही हो चुकी थी। सैफ ने मेरी किताब बेवक़ूफ़ी का सफ़र’ का कवर पेज बनाया था।

बात डर की ही रही थी। सैफ ने फ़ोन पर बताया कि बग़ल के शेवतवर्णा प्रकाशन पर वो हमारा इंतज़ार कर रहे थे। वहाँ पहुँचने पर देखा कि ज्ञानेन्द्र मोहन ‘ज्ञान’ और सरोज मिश्र जी अपनी कविता की किताब के विमोचन के लिए तैयार थे। दोनों हमारे शाहजहांपुर के साथी रहे हैं। दोनों की कविता की किताबों को सीने से सटाकर विमोचन टाइप हुआ। दोनों साथियों की कविताओं की तारीफ़ में बोला। हिंदी व्यंग्य के धुरंधर विमोचकों के वीडियो देखकर अभ्यास हो गया था इसलिए बोलने में हिचक नहीं हुई।इसके बाद दोनों मित्रों ने कविता पाठ भी किया।
चलते समय विमोचित किताबों की खरीद की। प्रकाशक ने स्व मधुकर त्रिपाठी जी का कविता संकलन भी दिया मुफ्त में। लेकिन काउंटर पर भुगतान करते समय वह कविता संकलन वापस धरा लिया गया। एक बार फिर साबित हुआ कि दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं होता।
बस 490 रुपये की चपत से पुस्तक मेले की बोहनी करके वापस न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर पहुँचे। किताबों में सबसे पहले पुष्पा तिवारी जी की कहानियों की किताब दिखी। उसको काउंटर पर रखा। उन्होंने अपनी दो किताबें जबलपुर के पते पर भेजी थीं। हमने किताबों की क़ीमत देने की पेशकश की तो इतना हड़काया उन्होंने फ़ोन पर कि सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हो गईं। अब जल्दी ही उनकी सब किताबें पढ़कर उनके बारे में लिखूँगा। कानपुर की है पुष्पा जी। इतना तो बनता है। देरी पहले ही हो चुकी पढ़ने में , अब और ठीक नहीं।
शरद काकोश जी की दोनों नई किताबें ‘एक पुरातत्व वेत्ता की डायरी’ और ‘बैतूल से भंडारा तक’ के अलावा कुछ और किताबें भी ख़रीदी।
वहीं इंजीनियर राजेश कुमार जी से मिलना हुआ। राजेश कुमार जी ने शाहजहांपुर में रहते हुए कई कहानियों और कविताओं का नाट्य रूपांतर किया है जिसको शाहजहांपुर के अभिव्यक्ति नाट्य मंच ने मंचित भी किया है। इनमें एकल नाटक ‘ वैष्णव की फिसलन’ , ‘मुग़लों ने सल्तनत बख्श दी’ एकल नाटक के बहुत शानदार मंचन कृष्णकुमार और शमीम आजाद ने किए हैं। निराला की प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ के नाट्य रूपांतर का एकल मंचन भी देखा था। सैफ के कारण राजेश कुमार जी से पहली बार मुलाकात हुई। उनकी किताब भी ख़रीदी।
सैफ ने अपना बनाया हुआ कवर पेज भी हमको भेंट किया। सैफ ने सुशील मानव जी की किताब का भी कवर पेज बनाया है । हमने वह किताब भी ख़रीदी ।
इस बीच फ़ोन पर अरविंद तिवारी जी बात हुई। वे सेतु प्रकाशन के स्टाल पर थे । उनको साथ लेकर मेले में फिर घूमे। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर फिर आए। वहाँ सुरेश नीरव जी , रजनीकांत शुक्ल जी शीला पांडे जी से मुलाक़ात हुई। महेश आलोक जी अरविंद तिवारी जी के साथ पहले से ही थे। शीला पांडे जी ने अपनी किताब अरविंद तिवारी जी को भेंट की।
इसके बाद अरविंद तिवारी जी की व्यंग्य संग्रह ‘सदन में हमाम के मजे ‘ का विमोचन हुआ। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर तमाम व्यंग्यकारों की किताबें एक कोने में रखी अपनी हालत का बयान कर रहीं थीं। चंद्रा जी से अरविंद तिवारी जी की किताबों की रायल्टी देने के लिए कहा तो उन्होंने कहा मार्च के बाद सबका हिसाब करेंगे। इस बारे में हुई बाकी बातचीत निजता के दायरे में आती है जिसका खुलासा ठीक नहीं क्योंकि वो सबको पता है।
बोधि प्रकाशन में प्रकाशन के तीस वर्ष होने के उपलक्ष्य में कुछ किताबें पाँच-पाँच रुपये की मिल रहीं थीं। अपन ने निवेदिता भावसार, ध्रुव गुप्त, और प्रियदर्शन जी आदि की किताबे ली। सुनील जैन राही का नया कविता संग्रह भी लिया।
अलंकार रस्तोगी ने अद्विक प्रकाशन से अपनी किताब ख़रीदने की बात कही थी। चाय मिलेगी यह भी कहा था। दुकान गए तो पूछा गया कौन अलंकार ? फिर नाम बताने पर किताब मिल गई । लेकिन चाय की कोई बात नहीं हुई। असल में लेखक लोग बहुत मुग़ालते में रहते हैं। यह छोड़ देना चाहिए। अलंकार ने अपना परिचय भी इसी अंदाज़ में लिखा है। अब अंदर का हाल बाद में पता चलेगा।
भावना प्रकाशन से तीन किताबें ख़रीदीं। अर्चना चतुर्वेदी का व्यंग्य संग्रह डर के मारे , डा असीमित का उनकी उनकी बीहड़ नेटवर्किंग के चलते और उर्मिलिया जी का उपन्यास इसलिए भी कि इसमें शुक्ल जी एक पात्र हैं।
भावना प्रकाशन में ही नीरज जी ने बताया कि सुभाष चंदर जी भी आए है मेले में और लेखक की दौड़ लेखक मंच तक के हिसाब से हाल नंबर दो के लेखक मंच पर मौजूद हैं। सुभाष जी साथ ही वहाँ गिरीश पंकज जी और फ़ारूख़ अफ़रीदी जी भी मिले। कृष्ण कल्पित जी से नमस्ते किया और उनकी किसी किताब की तारीफ़ भी की। कृष्ण कल्पित से पैटिस खाते हुए बगल की दुकान में चले गए। अपन लोग सुभाष जी को साथ लेकर चाय पीने बाहर आ गए।
इसके पहले अरविंद तिवारी जी के साथ भी चाय पान हो चुका था। साथ में महेश आलोक जी थे। महेश जी जेएनयू से पढ़े हैं । अपने गुरु केदारनाथ सिंह जी पढ़ाने के कई किस्से बयान किए।
शोभना श्याम जी से भी मुलाकात हुई वहीं। शोभना जी ने अरविंद तिवारी जी से कहा -आप तो अपने लेखन से सबको उखाड़ देते हैं।’ अरविंद तिवारी जी ने एक और महिला पाठिका के इसी तरह के वक्तव्य के बारे में बताया। इससे पता चलता है पुरुष लेखक महिला पाठिकाओं की तारीफ़ को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
दिविक मिश्रा से भी मुलाक़ात हुई। काफ़ी दिन पहले वे हमारे जबलपुर वाले कमरे में मिलने आए थे। यहाँ काफ़ी देर साथ रहे हम लोग ।
चलते समय हम लोग लालित्य ललित जी से मिलने गए। उन्होंने चाय पिलाने का वादा किया था और उसे निभाया भी। थीम पवेलियन के इंतजाम का जिम्मा संभाले हुए लालित्य जी ने बताया कि वीआईपी और बड़े लोगों के मेले में आने पर उनका इंतजाम करने की जिम्मेदारी उनकी है। एक दिन पहले किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष के आने की जानकारी दी उन्होंने। यह भी बताया कि अगर कार से आयें और बता दें तो उसके आने की व्यवस्था वो कर देते। हमने बताया कि ठीक बात लेकिन हम थोड़ी बड़ी गाड़ी , मेट्रो, से आए हैं इसलिए अंदर आना मुश्किल था।
लौटते हुए हिन्द युग्म प्रकाशन होते हुए आए। हिंद युग्म प्रकाशन की दीवार पर दिल के आकार की तमाम चिप्पियाँ लगी थीं। चिप्पियों पर लोगों ने अपने दिल की बातें लिखीं थीं। कुछ अश्लील बातें भी। दिल की बात में कुछ अश्लील कहाँ होता है । शैलेश की सलाह पर हमने कुछ किताबें ख़रीदीं उनमें से एक विनोद कुमार शुक्ल जी की पुरानी अप्रकाशित कविताएँ थीं। कविताएँ विनोद जी की हस्तलिपि में भी हैं । सुंदर प्रकाशन।
हिंदयुग्म प्रकाशन पर ही ज्योति त्रिपाठी से भी मिलना हुआ। इसके बाद अपन साथ-साथ लौटे लेकिन बाहर आते-आते अलग-अलग हो गए।
मेले में जाने से पहले तमाम किताबें ख़रीदने की लिस्ट बनाई थी। मेले में पहुंचकर किसी किताब का नाम भूल गया , किसी का प्रकाशन। घर पहुंचकर अरुण अर्णव खरे जी का मेसेज देखा कि हमको इंक पब्लिकेशंस जाना था और उनकी किताब मुफ्त में लेनी थी। लेकिन मुफ्त की चीजें लगता है अपने भाग्य में नहीं। खैर, फिर सही।
मेले से लौटकर सब किताबों को उलटपुलटकर देखा। बाद में पढ़ने के लिए रख दिया। देर रात श्रीलंका के लिए फ्लाइट पकड़ने के लिए निकलना था।
अब श्रीलंका पहुँचकर यह पोस्ट लिख रहे हैं। पुस्तक मेले के बारे में फ़िलहाल इतना ही। बाक़ी किस्से फिर कभी।

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