Wednesday, February 05, 2025

बहुत प्यार करते थे अम्मा-बप्पा


पिछले हफ़्ते रावतपुर नर्सरी जाना हुआ। घर के बगीचे में लगाने के लिए कुछ पौधे ख़रीदने थे।
पहले भी कई बार जा चुके हैं इस नर्सरी में। नर्सरी के बग़ल में मौजूद एक रेस्तराँ हैं। नाम है बगीचा कैफ़े (The Cafe Baggicha)। क़रीब साल भर पहले यहाँ आए थे तो चाय भी पी थी। कैफ़े चलाने वाले माँ-बेटे मिले थे। उन्होंने बताया था कि कैसे उन्होंने मुश्किल से इस कैफ़े को शुरू किया था। कैसे चलाते हैं।
कैफ़े की ख़ासियत वहाँ मौजूद किताबें थीं। कुछ किताबें एक छुटकी सेल्फ़ में रखी थीं। लोग पढ़ते तो नहीं दिखे लेकिन किताबों की मौजूदगी अपने आप में ख़ुशनुमा एहसास है।
इस बार गए तो बगीचा कैफ़े बंद था। पहले भी एक बार आए तब भी बंद दिखा था। नर्सरी वाले से पूछा तो उसने बताया-"कभी समय से नहीं खुलता। दोपहर बाद कभी-कभी खुलता है। ऐसे थोड़ी चलता है कैफ़े।"
हम क्या कहते कैसे चलता है कैफ़े लेकिन कभी-कभी मन करता है कहीं कोई कैफ़े हो जहाँ ख़ूब सारी किताबें हों जिनको पढ़ते हुए लोग चाय-काफ़ी पिएँ। लेकिन किसी के मन करने भर से कुछ थोड़ी हो जाता है। कुछ चाय की दुकानों अख़बार तो दिखते हैं सुबह लेकिन किताबों तक मामला नहीं पहुँचता।
पौधे ख़रीदने के बाद उनको कार की डिक्की में रखवाने के लिए हाथ ट्राली में लेकर एक महिला आईं। डिक्की में रखवाते हुए उनसे नाम पूछा तो बताया -'दुलारी।'
हमने कहा -'घर वालों की ख़ूब दुलारी रही होगी तभी नाम रखा दुलारी।'
इस पर वो हंसने लगीं। बोली -'हाँ , काहे नहीं। बहुत प्यार करते थे अम्मा-बप्पा।'
आगे बात करते हुए बताया दुलारी ने -"शादी के चार साल बाद पति नहीं रहे। एक बच्चा है। उसकी परवरिश के लिए मेहनत-मज़दूरी करते हुए ज़िंदगी जी। ससुराल में किसी ने सहयोग नहीं किया। बच्चे को पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। आज बेटा पुलिस में नौकरी करता है। बेटे को सीआरपीएफ, बीएसएफ और कई जगह से नौकरी की चिट्ठी आई थी। बेटे ने पुलिस की नौकरी की।"
बेटे को कई जगह से नौकरी का आफ़र आया बताते हुए दुलारी के चेहरे पर गर्व की भाव था। बेटे के लिए दुलहिन की खोज में लगी हैं अब दुलारी। माँ-पिता रहे नहीं अब। भाई-बहन हैं।
दुलारी ने बताया कि वे इस नर्सरी में पिछले 13-14 से हैं। घर मंधना में हैं। वहीं से रोज आती-जाती है। बस से। नर्सरी से रोज तीन सौ रुपए रोज मिलते हैं । 200 रुपए दिहाड़ी, सौ रुपया किराया के। बाक़ी जो कुछ किसी फूल-पौधे ले जाने वाले से मिल जाए। वो भी बहुत कम लोग ही देते हैं।
सरकार के द्वारा तय अकुशल मज़दूर की न्यूनतम मज़दूरी पाँच सौ रुपए के लगभग है। लेकिन दुलारी को 200 रुपए मिलते हैं। इसका कोई हिसाब नहीं है। कहीं रजिस्टर में उनका नाम भी नहीं होगा। उनके लिए शायद यही बहुत है कि रोज की दिहाड़ी मिल रही है।
न्यूनतम मज़दूरी का चक्रव्यूह बड़ा जटिल है। सरकारी संस्थानों में भी, जहाँ भुगतान न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से ही होता है, कर्मचारी को उनकी मज़दूरी का बड़ा हिस्सा कटकर ही मिलता है। भुगतान मज़दूर के खाते में पूरा होता है। लेकिन मज़दूर को मिलता ठेकेदार द्वारा अपना हिस्सा काट लेने के बाद ही। ठेकेदार द्वारा अपना हिस्सा काटकर भुगतान करने की तरह-तरह की तरकीबें हैं। सबको पता रहता है इस बारे में लेकिन कोई कुछ कर नहीं पाता। सरकार न्यूनतम मज़दूरी भले बढ़ाती रहे लेकिन मज़दूरों को भुगतान वही होता है जितना ठेकेदार चाहता है।
अभी टेलीविजन पर दिल्ली चुनाव में वोटिंग की खबरें आ रही हैं। हर पार्टी अपनी जीत का दावा कर रही है। अभी तक प्रधानमंत्री जी की संगम में डुबकी लगाती हुई खबरें शूरु नहीं हुईं हैं। शायद कुछ देर में दिखें।

ख़ैर, जो होगा देखा जाएगा। फ़िलहाल तो मस्त रहा जाए। 

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