Tuesday, February 04, 2025

सब मिले हुए हैं


 आज सबेरे-सबेरे दौड़ा दिए गए। चौराहे तक। बिना किसी काम के। ऐसा अक्सर होता है। कोई नई बात नहीं।

लौटते हुए सवारियों का इंतज़ार करते दो रिक्शे वाले दिखे। पास से गुजरे तो एक ने नमस्ते जैसा किया। हो सकता है उसने चेहरे से मक्खी उड़ाई हो जिसे मैंने नमस्ते समझा। मध्यमवर्गीय समाज में इस तरह की गलतफहमियाँ बड़ी सुकूनदेह होती हैं। बहरहाल, रुक गए। बतियाने लगे उनसे ।
"सवारियाँ मिल जाती हैं यहाँ से?" -बातचीत की शुरुआत करते हुए हमने पूछा।
"हाँ, मिल जाती हैं। बैंक, आवास विकास और इधर-उधर की तरफ़ की मिल जाती हैं।"- एक ने बताया।
रिक्शा काफ़ी पुराना देखकर मैंने कहा -"पिछले पहिए में मडगार्ड नहीं लगा इसमें।"
"अब रिक्शे ऐसे ही आते हैं। सन 2012 में लिया था इसे। पहले वाले रिक्शे में पीतल के मडगार्ड लगे आते थे। डायनामो लगे होते थे। पंखे लगे होते थे।"- रिक्शेवाले ने बताया।
पंखे और डायनामो की तो याद नहीं लेकिन रिक्शों के पहियों पर मडगार्ड लगे होते थे। तमाम नौजवान रिक्शेवाले अपने रिक्शों को चमकाते दिखते थे। मडगार्ड सड़क के कीचड़ से सवारियों को बचाते थे। अब शायद समय का चलन हो गया है कि किसी को कीचड़ से बचाने की बजाय कीचड़ अधिक से अधिक फैलाया जाए। इसीलिए कीचड़ फैसले से रोकने वाले हर जुगाड़ हटा लिए जाएँ।
रिक्शे के पहिए रिक्शेवालों के मुँह की तरह पिचके हुए थे। दोनों में हवा की कमी है शायद। लेकिन ऐसे ही चलता है इसलिए चल रहा है।
हमारे कहाँ रहते हो पूछने पर एक ने बताया -" यहीं मसवानपुर में रहते हैं। अपना खुद का मकान है।"
उमर पूछने पर उसने 75 साल बताई। देश की आज़ादी की उमर के बराबर। देश अमृतकाल मना रहा है। कुम्भ में अमृतस्नान हो रहा है। देश और समाज से होड़ लेता हुआ एक कनपुरिया बुजुर्ग अपनी अमृतउम्र में रिक्शा चला रहा है। पेट भरने के लिए किसी का मोहताज तो नहीं है।
आगे एक चबूतरे पर बैठे बतियाते लोगों में एक को कहते सुना -"बाबा लोगों को कुछ करना थोड़ी पड़ता है। बैठे-बैठे रोटी तोड़ते हैं।"
हमने रुककर उसकी बात सुनी और बाबा लोगों के बारे में उसकी धारणा को विस्तार से जानना चाहा। उसने कई लोगों के उदाहरण देते हुए बताया कि वे कुछ करते-धरते नहीं है। गंडा-ताबीज़ बाँटते हैं , झाड़-फूंक करके लोगों को 'जनता' बनाते हैं। हरामखोरी से पैसा कमाते हैं। निठल्लागीरी की कमाई करते हैं।
बाबा लोगों के बारे में उसकी धारणा से मुझे कष्ट हुआ। उसको पता नहीं आजकल बाबा लोग कितनी मेहनत कर रहे हैं। सरकारें बनवाने, बचवाने के लिए बयानबाज़ी करते हैं। अच्छा हुआ उसकी बात को किसी बाबा जी ने सुना नहीं वरना बाबा जी उनके ख़िलाफ़ कोई बयान जारी कर देते (श्राप देने लायक़ तपस्या शायद होती नहीं बाबा जी लोगों के पास)।
बाबाजी लोगों के निंदा स्थल के पास दो कुत्ते धूप में लेते हुए निद्रा तपस्या में लीन थे। उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे। एक दूसरे के अस्तित्व से उदासीन दोनों कुत्ते पूरी तसल्ली से धूप स्नान कर रहे थे। कुत्ते लोग सहअस्तित्व के सुंदर उदाहरण होते हैं। शांत रहते हैं तो सब एक साथ। भौंकते हैं तो सब एक साथ , एक सुर में। ये नहीं कि एक भौंके तो दूसरे चुप रहें। किसी मजमे में किसी नेता या हीरो का बार-बार नाम लेते हुए उसको लोकप्रिय बताने का हुनर प्रसंशको ने कुत्तों से सीखा या प्रसंशको से कुत्तों से इस बारे में कुछ कहना मुश्किल हैं मेरे लिए। समाजशास्त्री भले कुछ कहें।
आगे चौराहे पर भी कुछ कुत्ते आराम करते दिखे। बग़ल से गुजरते हुए उनमें से एक ने हमें जिस अन्दाज़ में देखा उससे लगा अगर वो बोल सकते तो हमें सुनाई देता -"कौन है बे जो सुबह-सुबह माबदौलत की नींद में खलल डालने की हिमाक़त कर रहा है।"
हमारे बग़ल से गुजर जाने के बाद कुत्ते फिर सुबह की नींद सो गए। आगे कुछ चैतन्य कुत्ते भी दिखे। वर्जिश जैसी करते हुए वे एक स्कूटर के पीछे कुछ दूर भागे फिर वापस लौटकर दूसरी सवारी का इंतज़ार करने लगे जिसके पीछे वे भाग सकें।
सड़क किनारे खड़े अमलताश के पेड़ अपने फूल खिलाने की तैयारी में जुटे दिखे। आगे एक जगह दो हरे पेड़ों के बीच एक पीला पड़ता बुजुर्ग पेड़ दिखा। ऐसा लगा कि दो जवान हरे पेड़ एक बुजुर्ग पेड़ को अपने कंधे का सहारा देते हुए किसी अस्पताल ले जा रहे हैं। शायद पेड़ों में अपने बुजुर्गों की देखभाल की आदत बची हुयी है।
आगे सड़क पर एक दूसरी के विपरीत दिशा में मोटरसाइकिल का मुँह किए दो लोग मुँह में मुँह जोड़कर बतियाते दिखे। उनको देखकर लगा कि आज की दुनिया में पक्ष-विपक्ष, झूठे-गुंडे, ये और वो सब मिले हुए हैं।
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