गंगा रामया मंदिर (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में) के बाद हम लोग थोड़ी ही दूर स्थित श्रीलंका का आज़ादी का स्मारक देखने गए।
श्रीलंका पर पुर्तगाली, डच और अंग्रेजों का अधिकार रहा। सबसे आख़िरी क़ब्ज़ा अंग्रेजों का रहा। भारत की आज़ादी के छह महीने से भी कम समय में अंग्रेज श्रीलंका को भी छोड़कर चल दिए। भारत से भरी बरसात में गए तो श्रीलंका से जाड़े मौसम में।
श्रीलंका 4 फ़रवरी, 1948 को आज़ाद हुआ। हम लोग आठ फ़रवरी को श्रीलंका में थे। मतलब हमारे श्रीलंका दौरे की शुरुआत के चार दिन पहले ही श्रीलंका की आज़ादी की सालगिरह मनाई गयी थी।
श्रीलंका की आज़ादी में भारत में हुई घटनाओं और गतिविधियों का ज़रूर प्रभाव रहा होगा। श्रीलंका की आज़ादी के पहले भी कई विद्रोह हुए थे लेकिन वे दबा दिए गए। 1915 में श्रीलंका हुए बौद्ध - मुस्लिम दंगे में तमाम लोग मारे गए। इसके बाद श्रीलंका में मध्यम वर्ग का राजनीति में बड़े पैमाने पर प्रवेश हुआ। अंतत: 4 फ़रवरी, 1948 को श्रीलंका में अंग्रेज लोग सत्ता श्रीलंका के लोगों को छोड़ कर निकल लिए।
स्वतंत्रता स्मारक के बनने की शुरुआत देश की आज़ादी के एक साल बाद 4 फ़रवरी, 1949 को हुई। 1953 को निर्माण पूरा हुआ। यह स्मारक श्रीलंका के लोगों ने आज़ाद होने के बाद बनवाया। इसका निर्माण श्रीलंका के सबसे प्रसिद्ध कैंडी साम्राज्य के दरबार हाल की तर्ज़ पर किया गया।
खंभों पर टिकी खुली इमारत के सामने श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री Don Stephen Senanayake की मूर्ति बनी हुई है। श्रीलंका की आज़ादी में सरनायक का अहम योगदान रहा। आज़ादी के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने।
डी एस सरनायक जी के बारे में पढ़ने पर पता चला कि वे पढ़ने लिखने में सामान्य ही थे। क्रिकेट अच्छा खेलते थे। शुरू में क्लर्क का काम किया। बाद में ससुराल से मिली ग्रेफ़ाइट की खान देखते हुए आराम का मिडिल क्लास जीवन जीते रहे।
1915 में श्रीलंका में बड़ा बौद्ध -मुस्लिम दंगा हुआ। भारत की तर्ज़ पर वहाँ भी दंगों की शुरुआत अंग्रेजों के आने के बाद ही हुई होगी। दंगे के बाद बड़ी संख्या में लोग गिरफ़्तार किए गया। इनमें सरनायक जी के दो भाई भी थे। जिनको बिना सबूत के 46 दिन तक जेल में रखा गया। इस घटना के बाद सरनायक जी सार्वजनिक जीवन और राजनीति में आए। विभिन्न कमेटियों में रहे। अनुभव लिए। अंतत: श्रीलंका की आज़ादी के बाद वहाँ के पहले प्रधानमंत्री बने। जीवन पर्यंत प्रधानमंत्री बने रहे।
आज़ादी का स्मारक एक बड़े खुले मैदान में बना है। कोई दीवार नहीं, कोई दरवाज़ा नहीं। सब तरफ़ से खुला स्मारक। 4 फ़रवरी, 1948 को देश की आज़ादी का महोत्सव इसी जगह पर मनाया गया। नई पार्लियामेंट बनने तक देश की लोकसभा, राज्यसभा के रूप में इसी जगह का उपयोग होता रहा। आजकल इस इमारत का उपयोग धार्मिक और राष्ट्रीय पर्वों के मनाने के लिए होता है।
इमारत एक ऊँचे चबूतरे पर बनी है। चारों तरफ़ से ऊपर जाने की सीढ़ियाँ बनी हैं। 10000 वर्ग फुट एरिया में बनी इमारत के खंभों के साथ फ़ोटो खिंचाने के कई लोग वहाँ मौजूद थे। खूबसूरत खंभों के साथ, खूबसूरत लोग, अपनी खूबसूरत यादों को संजो रहे थे। हमारे साथ के लोगों ने ख़ूब फ़ोटोबाज़ी की। खंभों के साथ सटकर, उनके पास बैठकर, खड़े होकर, आड़े-तिरछे पोज में फ़ोटो खिंचवाए।
मैं सामने से फ़ोटो खींचने के लिए इमारत के नीचे उतर आया। दो लड़कियाँ इमारत के खंभे के पास बैठी बतिया रही थीं। बतियाती चली जा रहीं थी। दूर होने के कारण उनकी बातें सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं। लेकिन कायनात ज़रूर कान लगाए उनकी बातें सुन रही होगी। इमारत के याद-स्टोर में अनगिनत लोगों की सुनी हुई बातचीतों का संग्रह होगा। यह अलग बात कि लोगों की निजता के संरक्षण का ख़्याल रखते हुए किसी को बताती नहीं।
नीचे मैदान पर एक बुजुर्ग महिला योगा मैट बिछाए कसरत कर रही थी। टांग उठाते-नीचे करते हुए टांग-व्यायाम कर रही थी। ऊपर उठाते हुए उसकी टांग टेढ़ी हो रही थी। वह फिर से उसको सीधा करने की कोशिश कर रही थी लेकिन टांग उसकी बात मान नहीं रही थी। अपनी टांग की हुकुम अदूली सहती हुई वह महिला व्यायाम करती रही।
वहीं मैदान में एक परिवार अपने बच्चों के साथ घूमने आया था। बच्चे पूरी मैदान में उछलते-कूदते खेल रहे थे। महिला बच्चों को टोकते-समझाते हुए उनको अपनी मर्ज़ी के हिसाब से खेलने दे रही थी। पुरुष इधर-उधर देखता हुआ कुछ-कुछ बोलता जा रहा था। मैदान में और कोई नहीं था।
स्मारक के सामने आने पर जब मैंने बड़ी मूर्ति लगी देखी तो उसका फ़ोटो लिया। मूर्ति का परिचय श्रीलंका की स्थानीय भाषाओं में लिखा था। मैं उस समय जान नहीं सका कि वह मूर्ति किस महापुरुष की है। बाद में इमारत के बारे में पढ़ा तो पता चला कि वे श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री थे। वहाँ के राष्ट्रपिता जैसे थे। अपने आस-पड़ोस के बारे हम कितना काम जानते हैं। बड़ी बात नहीं कि श्रीलंका के तमाम लोग गांधी जी के बारे में न जानते हों।
श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री के बारे में पढ़ने पर पता चला कि उनकी मौत घुड़सवारी के दौरान घोड़े से गिरने पर हुई। घोड़े से गिरकर वे काफ़ी देर तक कोमा में रहे। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन ने उनके लिए डाक्टर भेजने की व्यवस्था की। भारत से डाक्टर भेजे गए। लेकिन वे बच नहीं सके।
श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री के कार्यकलाप के बारे में पढ़ने पर पता चला कि उनके समय में क़रीब सात लाख तमिलों को श्रीलंका का निवासी नहीं माना गया था। इसका वहाँ के तमिल नेताओं ने विरोध किया था। श्रीलंका की राजनीति में इस घटना का भी लम्बा इतिहास रहा है।
स्मारक के चारों तरफ़ की सड़क पर गाड़ियाँ आ-जा रहीं थी। किसी देश के आज़ादी के स्मारक में खड़े होकर लोगों को आते-जाते देखने का यह अनूठा अनुभव था। हमने वहाँ का वीडियो भी बनाया। आज़ादी का म्यूज़ियम भी था वहाँ लेकिन हमारे पहूंचने तक बंद हो चुका था लिहाज़ा हम उसे देख नहीं पाए।
श्रीलंका के आज़ादी का स्मारक देखते हुए शाम हो गयी थी। अपन सामने खड़ी अपनी बस की तरफ़ बढ़े । थोड़ी दूर ही गए थे कि देखा बस स्टार्ट होकर चल दी। दूर थे तो चिल्लाकर तो बोल नहीं सकते थे। बेटे को फ़ोन किया कि हम तो यहीं छूट गए। परदेश के आज़ादी के स्मारक में बस हमसे आज़ाद हो गयी। ख़ैर बस थोड़ी देर में घूमकर हमको लेने आयी। हम आगे बढ़े। इस घटना के बाद से बस चलने के पहले लोगों की गिनती का नियम लागू हो गया। जब तक सोलह खोपड़ियाँ जिन नहीं जाती तब तक बस ड्राइवर को चलने के नहीं कहा जाता।
गड़बड़ी सुधार की जननी होती है।हर समाज में सुधारों की इमारत गड़बड़ियों की नींव पर खड़ी होती है।

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