बस साढ़े सात बजे उरई पहुँची। झाँसी से करीब सौ किलोमीटर दूर। दो घण्टे में सौ किलोमीटर ठीक ही है।
उरई बस स्टैंड पर बस रुकी। पाँच मिनट के। सबारियाँ हल्के होने के लिए लपकीं। अपन ने भू छोटी शंका का समाधान करके बस में चढ़कर बैग फिर से देखा। उतरकर सामने की चाय की दुकान की तरफ़ लपके।
चाय पीने के पीछे मूल कारण पैसे फुटकर कराना था। फुटकर पैसे होंगे तो 24 रुपये वापस लेने ने आसानी होगी। सोचा कि तीस रुपये देकर पचास रुपये वापस ले लेंगे। कम से कम बीस रुपये तो वापस मिल जाएँगे।
चाय बस स्टैंड वाली ही थी। हमने कुछ कहा नहीं , चुपचाप पैसे वापस लेकर चले आये। चाय वालों का कुछ भरोसा नहीं , क्या कह दें , क्या कर दें।
बस के पास खड़े होकर कंडक्टर साहब पैसे वापस कर रहे थे। हमारे भी कर दिए।। पूरे चौबीस रुपये। बहुत अच्छा लगा। एक रुपये के चार सिक्के बहुत दिन बाद देखे। बहुत प्यार उमड़ा उनको देखकर।
पैसे मिलने की ख़ुशी को सेलिब्रेट करने फिर चाय की दुकान की तरफ़ लपके। बगल में दादी की दुकान थी। दादी की दुकान पर दादी नहीं थी। चाय भी रखी हुई थी। बिना। चाय पिए लौट आए ।
फिर से बैग चेक किया। रखा था। फिर उतरकर टहले। फिर सीट पर बैठ गए।
एक आदमी झोला लेकर चढ़ा। हींग की गोली बेचने लगा। हाजमे का हाजमा , जायके का जायका। दस रुपये में एक डब्बी। निरपेक्ष भाव से प्रचार कर रहा था वह अपनी हींग की गोली का।
कुछ लोगों ने हींग की गोली ली। हाजमे के लिए या जायके के लिए या सिर्फ़ लेने के लिए यह कहना मुश्किल। थोड़ी ही देर में पूरी बस में टहलकर पाँच-सात गोली बेंच कर उतर गया वह।
बस फिर चल दी। कंडक्टर ने पूछा -‘कोई रह तो नहीं गया?’ कोई जबाब नहीं आया। कंडकटर ने फिर लोगों से पूछकर पैसे। वापस करने शुरू कर दिए। हमसे भी पूछा , हमने कहा -हमको मिल गए।
उरई से चढ़ी सवारी ने सीट पर रखे हमारे बैग को देखकर कहा -“भाई साहब थोड़ा बैठायेंगे?” हमने कहा -“काहे नहीं बैठायेंगे ? पूरा बैठायेंगे।”
बैग को बगल में रखकर भाई साहब को बैठा लिया। थोड़ी देर बाद भाई साहब ने कहा -“थोड़ा और एडजस्ट कर लीजिए।” हमने कर लिया। बैग को और किनारे चिपका के एकाध इंच जगह और निकाल दी। भाई साहब एडजस्ट हो गए। अब हमसे कुछ कह तो नहीं रहे हैं लेकिन हर दो मिनट में थोड़ा उचककर बार-बार एडजस्ट हो रहे हैं। हमने उनकी उचकन देखकर बैग को गोद में रख लिए। भाई साहब लपककर और एडजस्ट हो गए।
इस बीच एक महिला सवारी बस में चढ़ी। हमने सोचा उसको अपनी सीट दे देंगे। लेकिन फिर याद आया कि अपन भी तो वरिष्ठ नागरिक हो गए। महिला युवा है। कहीं बुज़ुर्गियत का लिहाज करके मना न कर दे। हम दुविधा में पड़ गये ।
लेकिन हम कुछ कहें तब तक हमारे आगे की एक सवारी ने उस महिला को सीट आफर कर दी। उसके चेहरे पर त्याग का सुख चमचमा रहा था। महिला लपककर सीट पर बैठ गई। हमको लगा कि अच्छा किया हड़बड़ी नहीं की सीट आफर करने में । दूसरे को त्याग का मौक़ा देने का सुकून महसूस करके ही ख़ुश हो गए।
लेकिन वह महिला थोड़ी देर बाद ही उतर गई। पहले पता होता तो लपककर उसको सीट आफर करते।
बस पुखरायाँ पहुँच गई है। दो तिहाई सागर पूरा हो गया। एक तिहाई बचा है। बस आगे बढ़ रही है। सफर पूरा करके ही मानेगी ।

No comments:
Post a Comment