कल इंदिरा नगर मेट्रो स्टेशन से मेट्रो पकड़ी। तलाशी वाले मुकाम से निकलने के बाद ऊपर मेट्रो की आज सुनाई दी। एक लड़का लपककर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेट्रो पकड़ने के लिए लपका। अपन और आराम से चलते हुए आगे बढ़े। कोई हड़बड़ी नहीं। अगली वाली पकड़ेंगे। ऊपर पहुँचने पर मेट्रो को सामने से निकलते देखा।
अगली मेट्रो ट्रेन आने में चार मिनट थे। प्लेटफार्म पर हमारे अलावा साथ-आठ यात्री थे। हमारे अलावा एक और लड़का, बाकी लड़कियां। प्लेटफार्म पर आते ही सब अपने मोबाइल में डूब गए। ट्रेन आने पर मोबाइल सहित उसमें बैठ गए।
अगले स्टेशन पर एक लड़का चढ़ा। पीठ पर मोटा बस्ता। सीट खाली होने के बावजूद बच्चा खड़ा रहा। हमने बैठ जाने को कहा तो वह मेरे बगल में बैठ गया। उसकी टी शर्ट पसीने में भीगी थी। हमने उससे बात शुरू कर दी।
पता चला बच्चा कोचिंग पढ़कर लौट रहा था। पीसीएम मतलब फिजिक्स, कैमेस्ट्री, मैथ्स पढ़ता है कोचिंग में। सिटी माँटेसरी स्कूल का छात्र है। सुबह सात से बारह तक स्कूल में पढ़ता है। फिर चार-पाँच घंटे कोचिंग। सुबह का निकला बालक शाम को घर पहुंचता है। दिन भर ज्ञान ग्रहण करते बीतता है। शाम को घर में ख़ुद पढ़ता है। इतनी मेहनत के बाद किसी इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियर बन जाएगा। फिर शायद मैनेजमेंट की पढ़ाई करके कहीं मैनेजर बन जाये। बच्चे का चेहरा पढ़ाई के बोझ से गंभीर था। यह ऐसा बोझ जिसे साझा भी नहीं किया जा सकता।
सिटी मांटेसरी स्कूल,लखनऊ के सबसे अच्छे , काम भर के मंहगे, स्कूलों में माने जाते हैं। यहाँ पढ़ने वाले बच्चे स्कूल के बाद चार-पाँच घंटे कोचिंग पढ़ें। इसके बाद अपनी पढ़ाई पढ़ें। यह अपने यहाँ की पढ़ाई व्यवस्था की कहानी है।
मेट्रो में बैठे सभी यात्री गंभीर, तनावग्रस्त, चितिंत, सोच में डूबे जैसे लगे। किसी के चेहरे पर मुस्कान या हँसी नहीं दिखी। शायद लोगों को डर होगा कि मुस्काते दिखे तो कहीं मुस्कान पर जीएसटी न लगे। हँसते पकड़े गए तो कहीं कोई ख़ुशी टैक्स न ठोंक दे। ईडी का छापा न पड़ जाये कहीं कि देश के सामने इतनी समस्याएँ हैं और खुश होने की कोशिश कर रहा है।कहीं इसकी ख़ुशी में विदेशी सहायता तो नहीं शामिल है।
मेट्रो स्टेशन से बाहर आते हुए लिफ्ट बंद होती दिखी। तब तक लिफ्ट पकड़ने के लिए लपकती एक बालिका ने लिफ्ट के दरवाजों के बीच अपना झोला अड़ा दिया। बंद होते दरवाज़े खुलने लगे। जब तक दरवाज़े पूरे खुलें तब तक हम आराम से लिफ्ट के पास पहुंच गए।कुछ और लोग भी आ गए थे इस बीच। लिफ्ट में दाखिल होने के बाद हमने दो और यात्रियो के लिए दरवाजे खुले रखे। दो मिनट पहले जो लिफ्ट अकेले जा रही थी नीचे वह अब भरी-पूरी जा रही थी।
बंद होती लिफ्ट में झोला अड़ाने वाली बालिका का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होगा। लेकिन यह कोई नई बात नहीं। दुनिया में हर पल ऐसे अनगिनत ऐतिहासिक काम होते रहते हैं जिनको कहीं इतिहास में दर्ज नहीं किया जाता।
मेट्रो स्टेशन से बाहर दो खूबसूरत लड़के दिखे। वे कुछ खिलाने के लिए कह रहे थे। शक्ल, सूरत, पहनावे कहीं से भी ग़रीब न दिखते हुए मांगते बच्चे देखकर थोड़ा ताज्जुब लगा। लेकिन फिर अब मांगने वालों के लिए शायद ग़रीब दिखना जरूरी नहीं रहा।
बच्चों ने सामने लगे रस के ठेले से जूस पिला देने की बात कही। हमने रस वाले से उनके लिए दो ग्लास रस का आर्डर किया। उसने रस दे दिया। बच्चे हमसे निर्लिप्त रस पीने में जुट गए। हमने दो बार भुगतान का प्रयास किया। हुआ नहीं। तब तक हमारा ऑटो आ गया। हमने रस वाले के स्कैनर की फ़ोटो खींचकर कहा -"हम भुगतान कर देंगे। नहीं हुआ तो शाम को नक़द देंगे आकर।"
रस वाले ने अगले ग्राहक के लिए रस निकालते हुए मुण्डी हिलाई। हम चल दिए। घंटे भर बाद हमने उसके स्कैनर के फ़ोटो से दुबारा भुगतान की कोशिश की। इस बार हो गया भुगतान। पहले दो असफल भुगतान के प्रयास भी दर्ज थे। स्कैनर पर नाम लिखा था -रियासुद्दीन।
शाम को लौटते समय सोचा रियासुद्दीन से बता दें कि पैसे भेज दिए थे। लेकिन लौटने तक वो चले गये थे। अगले दिन भी दिखे नहीं। शायद कहीं और लगा रहे हों ठेला। बच्चे भी नहीं दिखे। शायद वे भी कहीं और किसी और से कुछ खिलाने के लिए कह रहे हों।
आज लखनऊ में सुबह हो गई है। सड़कें बारिश के पानी में भीगकर ख़ुश होने की कोशिश कर रही हैं। आप भी खुश हो जाइए। ख़ुशी अभी टैक्स फ्री है।

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