मेट्रो स्टेशन के रास्ते में कई मोटर साइकिलें खड़ी दिखी। मोटरसाइकिलों के पीछे खाना ले जाने वाले डब्बे लगे हुए थे। उनमें THE FOOD STOP लिखा था। फ़ूड स्टॉप मतलब खाने का अड्डा। 'नई उमर' से लेकर 'गई उमर' तक के लोग खाने का आर्डर ले जाने के लिए तैयार खड़े थे। सड़क पार ही फ़ूड स्टॉप का रेस्टोरेंट है। रेस्टोरेंट में आर्डर मिलने पर मोटरसाइकिल से भेजा जाता होगा।
फोटो से कई तरह के विज्ञापन किए जा सकते हैं । हर उम्र के लोगों के लिए रोजगार, मोटर साइकिल की बिक्री, फुटपाथ पर लोगों के खड़े होने की आजादी जैसी बातों का प्रचार किया जा सकता है। अँगौछे से मुँह पसीना पोछते बुजुर्ग ने बताया कि अभी आर्डर आयेगा रेस्टोरेंट में तब वे जाएँगे डिलीवरी करने।
कहने को तो भाषा का कोई क्रांतिकारी जानकार यह सच भी बयान कर सकता है कि यह इंतजाम जनता पर खाने पर रोक लगाने के लिए हैं।
मेट्रो में भीड़ नहीं थी। यात्री बड़ी गंभीरता से बैठे थे। सावधान। गंभीर। चुप। कोई आपस में बात करता नहीं दिखा। सब शायद 'पहले आप, पहले आप' सोच रहे थे। बातचीत के सिलसिले में याद आया कि उस्ताद शायर मीर तकी 'मीर' अपनी दिल्ली से लखनऊ की यात्रा में अपने सहयात्री से इसलिए संवाद नहीं किया क्योंकि उनको अंदेशा था कि कहीं उनकी ज़बान ख़राब ना हो जाए ।
एक बच्ची अलबत्ता बड़ी उत्फुल्लता से मेट्रो से बाहर के दृश्य को देख रही थी। बाहर की इमारतें चुपचाप मेट्रो को स्थिर निगाहों से गुज़रते देख रही थीं। क्या पता कहती भी हों -'तुम्हारा बढ़िया है। दिन में पचास बार इधर से उधर आती जाती हो। हम तो एक जगह खड़ी रहने को अभिशप्त हैं।'
इंदिरा नगर से मुंशी पुलिया एक मेट्रो स्टेशन का किराया नौ रुपए हुआ। मुंशी पुलिया मेट्रो स्टेशन पर पूर्वांचल की स्वादिष्ट बाटी चोखा बिक रही थी। लोग गाड़ी के चारों तरफ़ खड़े हुए बाटी चोखा खा रहे थे। एक चलती-फिरती गाड़ी में बाटी-चोखा की दुकान खुली थी। नीचे फुटपाथ पर मात्र 15 दिन में कार चलाना सीखने का विज्ञापन लगा था। बगल में बवाशीर, हाइड्रोसील और गुप्त रोग के इलाज का धुँधलाया बोर्ड लगा था। बाटी-चोखा वाला अपना विज्ञापन करते हुए कह सकता था -' बाटी-चोखा खाओ, बवाशीर, हाइड्रोसील भगाओ।'
लौटते समय मेट्रो रुकते समय एक महिला लड़खड़ा गई। हमने उससे मुफ्त की और बेमतलब (मुफ्त की सलाहें अमूनन बेमतलब की ही होती हैं) कहा -'आराम से उतारिए। मेट्रो आपको उतार कर जायेगी।' मेरे बगल की जेन Z से भी कम उम्र की बच्ची इस बात पर अचानक हंस दी। उसका चेहरा खिला हुआ था। बच्ची को हँसते देखकर सामने की सीट पर बैठा एक गंभीर टाइप का इंसान बच्ची को बगलिया कर हमारे और बच्ची के बीच बैठ गया। शायद वह बच्ची का पिता था। वह कुछ बोला नहीं लेकिन सामने से लपककर मेरे बगल में बैठना बच्ची के लिए 'हँसी ब्रेकर' जैसा था। बच्ची चुप हो गई।
हमने मेट्रो में बैठे तमाम लोगों को ध्यान से देखा। सबके चेहरे गंभीर थे। हर स्टेशन पर यात्री गंभीरता से चढ़ रहे थे, गंभीरता से बैठे थे, गंभीरता से उतर रहे थे। 'मुस्कराइए कि आप लखनऊ में है' के आह्वान का कोई पालन नहीं कर रहा था।
कल एक ऑटो पर लिखा दिखा -'Soory girls my wife very street' अपने हिसाब से इसके मतलब निकाले जा सकते हैं। एक मतलब यह माफ करना लड़कियों मेरी पत्नी बहुत सख़्त है। दुनिया के प्रेम संबंधों के प्रसार में जीवन साथी के प्रभाव का अध्ययन के लिए यह महत्वपूर्ण वाक्य हो सकता है।
जीवन साथी की बात पर याद आया कि दुनिया भर में 'ट्रम्प टैरिफ़ ' के विविध कारणों की चर्चा हो रही है। लेकिन अभी तक किसी ने इस पर ट्रम्प की जीवन संगिनी के असर की चर्चा नहीं की है। बुजुर्ग ट्रम्प के निर्णयों में उनकी युवा जीवन संगिनी का कितना असर है इस पर भी कई लेख लिखने , वीडियो बनाने का स्कोप है। अपने सेवा काल के दौरान मैंने देखा है कि जिन हाकिमों से फ़ोन तक पर बात करने पर उनके अधीनस्थ थर-थर काँपते थे उनमें से कुछ हाकिम अपनी जीवन संगिनी का फ़ोन खड़े होकर, लगभग काँपते हुए रिसीव करते थे और बात पूरी होने जो साँस लेते थे उसको ही आदर्श 'चैन की साँस' कहा जा सकता है।
अभी सुबह एक आदमी पार्क में लगे पेड़ से कनेर के फूल तोड़ रहा था। यह फूल पूजा में चढ़ेंगे। उसके आराध्य इसे ग्रहण करेंगे। अगर पार्क के पेड़ से फूल तोड़ना चोरी है तो उन फूलों को अपनी पूजा में स्वीकार करना चोरी में सहभागिता है। लेकिन दिन बंधु दीनानाथ से कौन क्या कहे?
दूर से कनेर का फूल तोड़ने वाले की फ़ोटो लेते हुए मुझे लगा कि यह उसकी निजता का हनन है। लेकिन फिर लगा कि निजता का अधिकार चोर की हैसियत के हिसाब से लागू होता है। छोटे चोर को सबूतों के आधार पकड़कर जेल में बंद करके सजा दी जा सकती है। लेकिन बड़े और हैसियत वाले चोर के ख़िलाफ़ सबूत पेश करने पर अदालतें उनकी निजता में हनन मानते हुए सबूत के प्रकाशन पर रोक लगा सकती हैं। बड़े चोरों की सुरक्षा चिरकुट लोकतंत्रों की सुरक्षा के लिए आवश्यक तत्व है।
सार्वजनिक जगहों ने फूल तोड़कर पूजा करने से रोकने का प्रयास करती अज्ञेय जी की एक कविता है (साम्राज्ञी का नैवेद्य दान) जिसमें उन्होंने 'जो फूल जहाँ है वहीं रहते हुए पूजा के लिए समर्पित है' जैसी बात कही थी। लेकिन सहज चोरी के समर्थक समाज में कविता का संदेश सहज रूप में बिसरा दिया गया है :
"जो कली खिलेगी जहाँ, खिली,
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघ्रात, अस्पृष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध!
अर्पित करती हूँ तुझे।"
सुबह टहलते हुए पास ही स्थित THE FOOD STOP देखने गए। अभी दुकान खुली नहीं थी। खाने पहुँचाने वाली मोटर साइकिलें चुपचाप , तसल्ली से एक-दूसरे से चुपचाप ऊँघते हुए गपिया रही होंगी। शायद वे अपने सवारों का इंतज़ार कर रहीं हों। क्या पता उनमें से कोई अपनी बगल वाली बाइक से हँसते हुए कह रही हो -'मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं।'

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