Thursday, February 27, 2025

विजय नगर चौराहा

 


कल विजयनगर चौराहे से गुजरते हुए देखा कि मेट्रो के खम्भे के आसपास लगा टीन-टप्पर खुल गया है। खंभा साफ़ दिखने लगा है।

विजय नगर चौराहा पहले पहले गंदा नाला चौराहा के नाम से जाना जाता था। आटो वाले एक सवारी गंदा नाला, गंदा नाला कहते सुनाई देते थे। आजकल विजय नगर चौराहा ज़्यादा सुनाई देता। हालाँकि नाला वहीं है, चौराहा भी वही है।
जिस चौराहे पर आज मेट्रो का खंभा दिखा वहाँ पहले वीर रस के कवि भूषण की मूर्ति थी। भूषण जी कानपुर ज़िले की घाटमपुर तहसील के टिकवापुर गाँव में पैदा हुए थे। वे मोरंग, कुमायूँ, श्रीनगर, जयपुर, जोधपुर, रीवाँ, छत्रपती शिवाजी महाराज और छत्रसाल आदि के आश्रय में रहे, परन्तु इनके पसंदीदा नरेश छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराजा छत्रसाल थे। वे कहते हैं :
और राव राजा एक मन में न ल्याऊं अब।
साहू को सराहों कै सराहौं छत्रसाल को॥
(और किसी राजा के बारे में नहीं सोचता। या तो शिवाजी की सराहना करूँ या छत्रसाल की)
भूषण जी यह उक्ति इसी तरह की है जैसे कोई नौकरी पेशा व्यक्ति कहे इतनी जगह नौकरी की लेकिन मज़ा दो जगह आया।
विजयनगर चौराहे पर कवि भूषण जी की मूर्ति की स्थापना में स्व बद्री प्रसाद तिवारी जी का बड़ा योगदान था। उन्होंने शहर में कई जगह शहर से जुड़े महापुरुषों की मूर्तियाँ लगवाईं थी। अब वे नहीं हैं। भूषण जी की मूर्ति अब कहीं लगेगी या नहीं कहना मुश्किल। सम्भव है जब विजयनगर मेट्रो बने तो भूषण जी की प्रतिमा वहाँ लग जाए। कानपुर इतिहास समिति शायद इस बारे में आवाज़ उठाए।
गुमटी में एक दुकान के बाहर एक स्त्री मैनीक्वीन के हिस्से सड़क पर पड़े थे। टाँगे अलग धड़ अलग। सर नदारद। शायद दो मैनीक्वीन के ख़राब टुकड़े बाहर फेंक दिए गए थे। ऐसा जैसे खबरों में लिखा होता है -'महिला के शव के टुकड़े पाए गए। टाँगे और धड़ अलग-अलग शरीर के। सर लापता।' वैसे भी महिलाओं के सर वाले हिस्से से दुनिया असहज रहती है। इसी लिए सर ग़ायब कर दिया।
कहानी लिखने का हुनर और धीरज होता तो इसी पर एक कहानी खैंच देते।
मैनीक्वीन से याद आया कि हमारे कपड़ों की जब कोई तारीफ़ करता है तो हम कहते हैं जो कि सच भी है -"हम तो मैनीक्वीन हैं। जो कपड़े पहना दिए जाते हैं पहन लेते हैं। हमारी अपनी कोई पसंद नहीं।"
लौटते में एक दुकान पर गन्ने का रस पीने के लिए रूके। बीस रुपए का एक ग्लास। रस पीते हुए कुलदीप नैयर जी का लिखा एक क़िस्सा याद आया जिसमें उन्होंने बताया था कि एक बार वो शास्त्री जी के साथ कहीं जा रहे थे। क्रासिंग बंद थी तो शास्त्री जी ने कहा -'जब तक क्रासिंग खुलती है तब तक आइए गन्ने का रस पी लेते हैं।' उन लोगों ने रस लिया और क्रासिंग खुलने पर आगे बढ़े।
गन्ने की दुकान पर बैठी महिला ने बताया कि उसका मायका ग़ाज़ीपुर में है। बचपन से ही पिता यहाँ आ गए तो यहीं पली-बढ़ी यहीं शादी हुई । यहीं रहना हो रहा है।
हमने पूछा कि गर्मी में गन्ने का रस बेचती हो। बाक़ी समय में क्या काम चलता है। उसने बताया -'साल भर यही काम चलता है।'
हमने बर्फ़ डालने से मना किया था तो मेरे रस पीते हुए पूछा -'ज़्यादा ठंडा तो नहीं?'
हमने रस पीकर काग़ज़ का ग्लास डस्ट बिन में डालते हुए देखा कि उसमें कोई और पहले से नहीं पड़ा था तो पूछा -'सबेरे से पहली ग्लास बिका क्या?' इस पर उसने कहा,' नहीं , और बिके हैं।' फिर उसने उचककर डस्टबिन देखी और कोई और ग्लास न पाकर कहा, 'कूड़ा वाला ले गया शायद।'
चलते समय फ़ोटो खींची। उसको दिखाई। फ़ोटो देखकर हंसते हुए सर पल्ला कर लिया। हमने नाम पूछा तो बोली -'अरे, नाम का क्या करना?'
उसकी बात सुनकर बहुत पहले शुक्लागंज की तरफ़ जाते हुए लइया-चने की दुकान पर मिली महिला की बात याद आ गयी। नाम पूछने पर बोली थी -'नाम कुछ नाईं है हमार। नाम हेरा गा है।' (हमारा नाम कुछ नहीं है। नाम खो गया है।)
(पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
दोपहर हो गयी थी। घर से बुलावा आ गया था। घर की बात से अपनी ही कविता की याद आ गयी :
"घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।"
हम घर लौट आए। सोचा आपको भी बता दें।

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Wednesday, February 26, 2025

शादी नहीं तो नौकरी नहीं

 चीन की खबर कल अखबार में पढ़ी। शादी नहीं तो नौकरी नहीं। जिनके हाथ में व्यवस्था की ताक़त होती है वे अपनी बात मनवाने के लिए कोई भी शर्त लगा सकते हैं। क़ानून बना सकते हैं। कई बार विरोध होने पर क़ानून बदल दिया जाता है। कभी लागू रहता है।

आपातकाल में नसबंदी क़ानून कितनी बुरी तरह लागू हुआ। बाद में उसकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी रही कि आजतक किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई कि जनसंख्या नियंत्रण पर ठोस उपाय करे।
चीन की तर्ज पर कुछ कानून जो कोई कंपनी/सरकार लागू कर सकती है।
1. कुंभ स्नान नहीं तो क्या अगली किस्त नहीं । यह किस्त कुछ भी हो सकती है डीए एरियर, यात्रा भत्ता या कुछ और।
2. सस्ती भाषा नहीं तो एक दिन का वेतन काट लिया जाएगा। सस्ती भाषा बोलते हुए वीडियो कंपनी की साइट पर अपलोड करें।
3. सनातन की जय नहीं तो परिणाम भुगतने होंगे। सनातन विरोधी ताकत इसके कह सकतीं हैं -सनातन की तारीफ़ की तो खैर नहीं।
4. बेरोजगारों द्वारा नौकरी की माँग करने पर छिनेंगी डिग्रियाँ।
5. दिल्ली में महिलाओं द्वारा खाते में चुनाव वादे के रुपये की माँग करने पर लगाया जाएगा सरकार को अस्थिर करने का मुक़दमा। लगेगा हज़ार रुपए जुर्माना।
6. देश/प्रदेश की सरकार के किसी भी निर्णय, काम पर सवाल उठाने पर चेतावनी और विरोध करने पर सख्त कार्यवाही पर विचार।
7. प्रदेश सरकार के किसी भी कदम का विरोध करने पर उनके घर पर बुलडोजर चलाया जाएगा। घर विहीन लोगों के घर न होने पर सरकार की तरफ़ से उनको घर एलाट किया जाएगा ताकि उनके ख़िलाफ़ बुलडोजर कार्यवाही की जा सके।
बाक़ी संभावित क़ानून आप अपने हिसाब से बनायें। हरेक को अपनी समझ और ताक़त के दुरुपयोग का पूरा हक है।

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भविष्य की लोकतांत्रिक पार्टी का चुनावी एजेंडा

 आजकल पूरी दुनिया में सरकारें अपनी जनता की भलाई करने के लिए बवाल काटे हैं। लोकतंत्र की बहाली के लिए दुनिया भर की सरकारों के मुखिया मनमानी करते हुए तानाशाह हुए जा रहे हैं। लोकतंत्र के लिए कुछ भी करने को हलकान हुए जा रहे हैं। लोकतंत्र की बहाली और जनता के भले के लिए अपनी पार्टी की सरकार होना ज़रूरी है। लोकतंत्र का यह आवश्यक नाटक है। लोकतंत्र में सरकार बनाने के लिए चुनाव होते हैं। चुनाव में पार्टियाँ अपना एजेंडा बनाती हैं , पालन भले न करें।

आज जिस तरीक़े से लोकतांत्रिक देशों में चुनाव हो रहे हैं उनको देखते हुए आने वाले किसी समय में किसी देश में होने वाले किसी चुनाव के दौरान किसी लोकतांत्रिक पार्टी का सम्भावित एजेंडा यहाँ पेश है।
1. सरकार के किसी भी कदम का विरोध करने पर उसका घर बुलडोजर से गिरा दिया जाएगा।
2. बेघर विरोधियों के घर गिराने के लिए उनको ‘ बुलडोजर गृह योजना’ के अंतर्गत घर एलाट किए जायेंगे ताकि सरकार विरोधी कदम पर उनके घर गिराये जा सकें।
3. घर गिराने का खर्च सरकार विरोधियों से वसूल किया जाएगा। निर्धन सरकार विरोधियों को ‘गृह विध्वंस योजना’ से विशेष अनुदान दिया जाएगा ताकि वे अपने घर गिराये जाने का खर्च जमा कर सकें।
4. 'बुलडोज़र विध्वंस योजना' को आकर्षक एवं सुगंध मय बनाने के लिए इसका नाम 'पुष्पहार अर्पण' योजना रखा जाएगा।
5. सरकार का विरोध करने वालों को अपने विरोध की सार्वजनिक घोषणा करनी होगी। विरोधी लागों के वोट की गिनती नहीं की जायेगी। वे स्वतः निरस्त माने जायेंगे।
6. जिन लोगों ने सरकार के विरोध की सार्वजनिक घोषणा किए बिना सरकार के ख़िलाफ़ मतदान किया होगा उनके ख़िलाफ़ पारदर्शिता कानून के उल्लंघन का मुकदमा चलाया जाएगा जिसमें निष्कर्ष कुछ भी निकले सजा ज़रूर दी जाएगी और उनको सरकार समर्थक पार्टी में जबरियन शामिल कर लिया जाएगा।
7. बुद्धि , तर्क की बात करने वालों को चिन्हित किया जाएगा। उनकी किसी भी गतिविधि को सरकार विरोधी मानने के लिए सरकार सर्वथा स्वतंत्र होगी।
8. सरकार का समर्थन करने की किसी को भी खुली छूट होगी। सरकार के समर्थन में जो जितना जोर से जयकारा लगाएगा उसको उतना बड़ा देशप्रेमी समझा जाएगा। सरकार समर्थक जयकारा लगाने पर गला फटने की स्थिति में कोई मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा।
9. सरकार की बेवक़ूफ़ी की बातों का समर्थन करने पर हर तरह की आजादी होगी। सरकार के किसी भी क़दम को सार्वजनिक रूप से बेवक़ूफ़ी भरा बताना व्यवस्था विरोध माना जाएगा।
10. सरकार से कोई बात ज़्यादा ही बेवकूफ़ी की हो जाए तो उसे सरकार के मुखिया से व्यक्तिगत मुलाक़ात करके 'अलग तरह की समझदारी' कहते हुए तारीफ़ करके सूचित कर सकते हैं।
11. लोकतंत्र की रक्षा करते हुए देश के गौरव को ऊँचा उठाते हुए अगर जाने-अनजाने जनता की भलाई का कोई सरकार से हो जाए तो उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं होगी।
उपरोक्त योजना फ़िलहाल तो पूर्णतया काल्पनिक है। लेकिन यह अगर कहीं असलियत में साकार होती है तो उसके लिए हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। इसका पूरा दोष इसको अमल करने वाले पर होगा।

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Sunday, February 23, 2025

हारन होय तभी तो बजायें


 झांसी से कानपुर की बस निर्धारित समय से एक घंटे की देरी के बाद स्टार्ट हुई । सड़क पर खड़ी बसों के कारण आगे नहीं बढ़ पाई। कंडक्टर ने कहा , ‘ आगे बढ़ाओ यार, हिनई खड़े-खड़े हिलाय रहे बस।’

‘अरे आगे की बसें बढ़ें आगे तभई तो बढ़ायें आगे बस’- ड्राइवर जवाब दिया।
‘अरे तो हारन तो बजाव ‘- कंडक्टर ने कहा।
‘अरे हारन होय तब तौ बजायें’- ड्राइवर उवाच।
अब बस चल दी है। सड़क पर आ गई। हॉर्न भले न बज रहा हो , पूरी बस बज रही है।
‘अरे , ड्राइवर साहब आपका एक्सेलेटर ग़ायब हो गया क्या ?’- एक सवारी बोली।
‘कुछ देर बाद उसी सवारी ने पूछा’- भईया आज़ पहुँच जायेगी ।
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस सबसे निरपेक्ष चुपचाप सड़क पर सिंहनी की तरह चली जा रही है। हम बस में सवार हैं।
कंडक्टर ने टिकट काट दिया है। 400 रुपये लिए। टिकट काट के दे दिया। 24 रुपये उधार कर दिए। उतरने के पहले लेने हैं। आप ध्यान दिलाते रहना।

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हाजमें का हाजमा , जायके का जायका


 बस साढ़े सात बजे उरई पहुँची। झाँसी से करीब सौ किलोमीटर दूर। दो घण्टे में सौ किलोमीटर ठीक ही है।

उरई बस स्टैंड पर बस रुकी। पाँच मिनट के। सबारियाँ हल्के होने के लिए लपकीं। अपन ने भू छोटी शंका का समाधान करके बस में चढ़कर बैग फिर से देखा। उतरकर सामने की चाय की दुकान की तरफ़ लपके।
चाय पीने के पीछे मूल कारण पैसे फुटकर कराना था। फुटकर पैसे होंगे तो 24 रुपये वापस लेने ने आसानी होगी। सोचा कि तीस रुपये देकर पचास रुपये वापस ले लेंगे। कम से कम बीस रुपये तो वापस मिल जाएँगे।
चाय बस स्टैंड वाली ही थी। हमने कुछ कहा नहीं , चुपचाप पैसे वापस लेकर चले आये। चाय वालों का कुछ भरोसा नहीं , क्या कह दें , क्या कर दें।
बस के पास खड़े होकर कंडक्टर साहब पैसे वापस कर रहे थे। हमारे भी कर दिए।। पूरे चौबीस रुपये। बहुत अच्छा लगा। एक रुपये के चार सिक्के बहुत दिन बाद देखे। बहुत प्यार उमड़ा उनको देखकर।
पैसे मिलने की ख़ुशी को सेलिब्रेट करने फिर चाय की दुकान की तरफ़ लपके। बगल में दादी की दुकान थी। दादी की दुकान पर दादी नहीं थी। चाय भी रखी हुई थी। बिना। चाय पिए लौट आए ।
फिर से बैग चेक किया। रखा था। फिर उतरकर टहले। फिर सीट पर बैठ गए।
एक आदमी झोला लेकर चढ़ा। हींग की गोली बेचने लगा। हाजमे का हाजमा , जायके का जायका। दस रुपये में एक डब्बी। निरपेक्ष भाव से प्रचार कर रहा था वह अपनी हींग की गोली का।
कुछ लोगों ने हींग की गोली ली। हाजमे के लिए या जायके के लिए या सिर्फ़ लेने के लिए यह कहना मुश्किल। थोड़ी ही देर में पूरी बस में टहलकर पाँच-सात गोली बेंच कर उतर गया वह।
बस फिर चल दी। कंडक्टर ने पूछा -‘कोई रह तो नहीं गया?’ कोई जबाब नहीं आया। कंडकटर ने फिर लोगों से पूछकर पैसे। वापस करने शुरू कर दिए। हमसे भी पूछा , हमने कहा -हमको मिल गए।
उरई से चढ़ी सवारी ने सीट पर रखे हमारे बैग को देखकर कहा -“भाई साहब थोड़ा बैठायेंगे?” हमने कहा -“काहे नहीं बैठायेंगे ? पूरा बैठायेंगे।”
बैग को बगल में रखकर भाई साहब को बैठा लिया। थोड़ी देर बाद भाई साहब ने कहा -“थोड़ा और एडजस्ट कर लीजिए।” हमने कर लिया। बैग को और किनारे चिपका के एकाध इंच जगह और निकाल दी। भाई साहब एडजस्ट हो गए। अब हमसे कुछ कह तो नहीं रहे हैं लेकिन हर दो मिनट में थोड़ा उचककर बार-बार एडजस्ट हो रहे हैं। हमने उनकी उचकन देखकर बैग को गोद में रख लिए। भाई साहब लपककर और एडजस्ट हो गए।
इस बीच एक महिला सवारी बस में चढ़ी। हमने सोचा उसको अपनी सीट दे देंगे। लेकिन फिर याद आया कि अपन भी तो वरिष्ठ नागरिक हो गए। महिला युवा है। कहीं बुज़ुर्गियत का लिहाज करके मना न कर दे। हम दुविधा में पड़ गये ।
लेकिन हम कुछ कहें तब तक हमारे आगे की एक सवारी ने उस महिला को सीट आफर कर दी। उसके चेहरे पर त्याग का सुख चमचमा रहा था। महिला लपककर सीट पर बैठ गई। हमको लगा कि अच्छा किया हड़बड़ी नहीं की सीट आफर करने में । दूसरे को त्याग का मौक़ा देने का सुकून महसूस करके ही ख़ुश हो गए।
लेकिन वह महिला थोड़ी देर बाद ही उतर गई। पहले पता होता तो लपककर उसको सीट आफर करते।
बस पुखरायाँ पहुँच गई है। दो तिहाई सागर पूरा हो गया। एक तिहाई बचा है। बस आगे बढ़ रही है। सफर पूरा करके ही मानेगी ।

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झाँसी का क़िला दर्शन


 दूसरे दिन हम लोग झाँसी का क़िला देखने गए। सबेरे दस बजे खुलता है क़िला दर्शन के लिए। हम लोग मतलब अपन और प्रोफ़ेसर Alok Puranik होटल में नाश्ता करके दस बजे क़िले पहुँच गए। बारह बजे से सत्र शुरू होना था। सोचा था सत्र शुरू के पहले क़िला दर्शन कर लिया जाए।

सौ रुपए किराया पड़ा आटो का होटल से । चार किलोमीटर के सौ रुपए यह कहकर चार्ज किए आटो वाले ने कि क़िले से वापसी की सवारी नहीं मिलती।
झाँसी का क़िला बुन्देल राजा बीरसिंह जुदेव ने 1613 में बनवाया था। क़िले पर मुग़लों, मराठों और अंग्रेजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारुशंकर ने 1729-30 में इस क़िले का पुनर्निर्माण कराया और क़िला शंकरगढ़ के नाम से जाना गया। 1857 की आज़ादी की लड़ाई में झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई ने इस क़िले से लड़ाई की। अंग्रेजों द्वारा घेर लिए जाने पर क़िले से अपने घोड़े पर बैठकर निकल गयीं। आगे वे ग्वालियर के पास शहीद हुईं। उनको याद करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की पंक्तियाँ क़िले में जगह-जगह उत्कीर्ण हैं :
बुंदेलो हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह टो झाँसी वाली रानी थी।
क़िले का टिकट 25 रुपए है। डिजिटल पेमेंट करने पर बीस रुपए। पाँच रुपए प्रति टिकट के दस रुपए की बचत की अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर आलोक पुराणिक जी ने।
इतवार होने के कारण छुट्टी का दिन था। तमाम लोग क़िला देखने आए थे। लोग जगह-जगह फ़ोटो खिंचा रहे थे। एक लड़का अपने दोस्त के मोबाइल कैमरे के सामने स्टाइल में फ़ोटो खिंचा रहे थे। हमने उससे पूछा -'शाहरुख़ खान की इस्टाइल है क्या यह?' उसने मेरी इस्टाइल समझ पर तरस खाते हुये बताया-'नहीं ये अमिताभ बच्चन की इस्टाइल है।' इसके बाद उसने हाथ फैलाकर बताया -'ये है शाहरुख़ खान की इस्टाइल।'
मंदिर के प्रवेश द्वार के पास ही कड़क बिजली तोप देखने के बाद टहलते हुए पूरा क़िला घूम। गणेश मंदिर, शिव मंदिर, रानी का पंच महल, रानी झाँसी के तोपचियों की समाधियाँ और वह जगह जहां से कूदकर रानी झाँसी क़िले से निकली थी। कूदान स्थल के पास भी खड़े होकर हमने फ़ोटो खिंचवाए।
कूदान स्थल से बुंदेलखंड लिट्रेचर मेला का मैदान दिख रहा था। ऊँचाई से घोड़े से कूदकर रानी कैसे निकली होंगी क़िले से यह सोचकर ताज्जुब करते रहे।
क़िला क़रीब घंटे भर में घूम लिया हम लोगों। इसके बाद क़िले के फाटक के पास एक चबूतरे पर बैठकर आराम करते हुए क़िले के पर्यटकों को आते-जाते देखते रहे। किसी स्कूल के बच्चों को उसके मास्टर साहब क़िला घुमाने लाए थे। एक युवा गाइड उन बच्चों को झाँसी के क़िले का इतिहास बता रहा था:
" 1842 में विवाह के समय रानी लक्ष्मीबाई की उमर 13 वर्ष और उनके पति गंगाधर राव की उमर 45 वर्ष थी। दोनों के उमर में 32 वर्ष का अंतर था। राजा गंगाधर राव का निधन 1853 में हुआ। मतलब रानी का वैवाहिक जीवन लगभग 11 वर्ष रहा।"
बच्चों को उनके मास्टरों के हवाले छोड़कर हम लोग टहलते हुए क़िले से बाहर आ गए। जनरल विपिन रावत शहीद पार्क पर BLF हमारा इंतज़ार कर रहा था।

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Saturday, February 22, 2025

बुंदेलखंड मेले में मानदान और कटप्पा की चाय


 कल सबेरे होटल में नाश्ता करने के बाद होटल बदल गया। Alok Puranik और Neeraj Badhwar नज़दीकी के चलते होटल ट्विन्स से होटल लेमन ट्री में आ गए। बड़े लोगों की संगत का फ़ायदा होता है।

होटल में सामान धर के अपन आलोक पुराणिक जी के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे। नीरज बधवार को कुछ काम करना था सो वे होटल में रुक गए, बाद में आने के लिए।
कार्यक्रम स्थल पर अक्षत-रोली का टीका हुआ। आत्मीय स्वागत हुआ। स्वागत के बाद हमारे लिए एक बिल्ला दिया गया जिस पर 'मानदान' लिखा था। मानदान मतलब मान्य। बुंदेलखंड में मान्य उन रिश्तेदारों को कहते हैं जिनके यहाँ घर की कन्यायों के विवाह होते है। फूफा, जीजा, दीदी, बुआ आदि रिश्ते मान्य में गिने जाते हैं। उनका बुंदेलखंड में बहुत सम्मान होता है। आयोजन के काम में लगे लोग 'घराती' का बैज लगाए हुए। घराती मतलब घर के लोग जिनको अपने आमंत्रित आगंतुकों का ख़्याल रखना है। इतने आत्मीय स्वागत से मन खुश हो गया।
कार्यक्रम का झाँसी के क़िले के नीचे जनरल विपिन रावत शहीद उद्यान में हो रहा है। खूबसूरत, विस्तृत पार्क में भव्य आयोजन। वहाँ किताबों की दुकानें, खेल-खिलौने वाली गाड़ियाँ और मनोरंजन के ठिकाने भी।
लोग बाग वहाँ मेले में घूमते हुए मज़े ले रहे थे। एक बालिका ने अपनी माता जी को कहा -'अम्मा तुम लोग मेला घूम आओ तब तक हम यहाँ वीडियो बना रहे।'
किताबों की दुकान से हम लोगों ने कुछ किताबें भी लीं। इनमें एक किताब हमारे वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न DrArvind Mishra (जो आजकल भक्त समुदाय में शामिल होकर जीवन का आनंद ले रहे हैं) की थी। 'कुम्भ मेले में मंगलवासी' शीर्षक इस किताब में विज्ञान गल्प कथाएँ हैं। 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी इस किताब के पहले उनकी विज्ञान गल्प की एक और किताब 'एक और क्रौंच वध' छपी थी। बारह विज्ञान गल्प वाली उस किताब के बारे में लिखी पोस्ट और उस पर साथियों की टिप्पणियों को अभी फिर से पढ़ते हुए उस समय के आपसी सम्बन्ध की याद आ गयी। अरविंद मिश्र जी को विज्ञान गल्प लिखते रहना चाहिए।
दूसरी किताब आलोक पुराणिक Alok Puranik जी की सलाह पर ली - विश्वास पाटिल की लिखी किताब पानीपत। इसे बहुत ज़रूरी किताब बताया है आलोक पुराणिक जी ने।
कार्यक्रम के उद्घाटन के बाद विभिन्न सत्र हुए। लंच की शानदार व्यवस्था वहीं उद्यान में थी। लंच करके हम लोग पास ही स्थित झाँसी म्यूज़ियम देखने चले गए। झाँसी और बुंदेलखंड से जुड़ी तमाम धरोहरों को देखा। झाँसी की रानी से जुड़ी कई स्मृतियाँ वहाँ मौजूद हैं। हेलिकाप्टर की वर्चुअल राइड में आसपास की इमारतों का हवाई सर्वे भी कर लिया। विभिन्न समय के सिक्के देखे। इसके अलावा झाँसी के प्रसिद्ध साहित्यकार वृंदावन लाल वर्मा जी से जुड़ी तमाम यादें देखें। उनके हस्तलेख में लिखे उनके उपन्यासों के पेज वहाँ मौजूद थे।
म्यूजियम से निकलकर हम लोगों ने कटप्पा मामा की चाय की दुकान पर चाय पी। दुकान पर सामने की तरफ़ लिखा था -'मेरे करन अर्जुन चाय पीने आएँगे!' इस आशा जनक बयान के बाद चाय की ठेलिया पर ग्राहक की तरफ़ से लिखा था -
'जब तक तुम चाय बनाते रहोगे,
मैं चाय पीने आता रहूँगा मामा!'
चाय पीकर लौटते में कुशवाहा जी चाय स्टाल भी मिला। वहाँ चाय नहीं पी, बस फ़ोटो खैंच ली।
कार्यक्रम स्थल पर लौटकर वहाँ चल रहे विभिन्न सत्रों की बातचीत सुनी। इनमें आदिवासी चिंतन: अस्तित्व का संकट, वर्तमान परिवेश में उच्च शिक्षा, कुछ राग कुछ रंग और आख़ीर में नीरज बधवार का जुमला जंक्शन पर बातचीत थी। आदिवासी चिंतन वाले सत्र के बाद में लेखक संदीप मुरारका की किताबों के विमोचन में हम लोग भी मंच पर बुला लिए गए। उसकी फ़ोटो भी आज अमर उजाला में छपी। वर्तमान परिवेश में उच्च शिक्षा सत्र में डा रचना विमल दुबे ने उच्च शिक्षा के विविध पहलुओं पर अच्छी बातचीत की।
पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे। उन्होंने अपनी बातचीत के दौरान अपने लेखन और प्रशासकीय अनुभव साझा किए। अपने सेवा काल के दौरान तनाव से बचने के उपायों में से एक उन्होंने बताया कि वे बेगम अख़्तर और मेहंदी हसन की ग़ज़लें सुना करते थे।
जुमला जंक्शन में आज की मीडिया, जुमलेबाज़ी, सामाजिक मीडिया पर बहुत अच्छी बातचीत की। उनके साथ अनुज खरे को भी आना था लेकिन वे आ नहीं पाए। नीरज बधवार से बातचीत की वरिष्ठ पत्रकार अरिंदम घोष ने। वहाँ मौजूद बच्चों ने कई सवाल भी पूछे। बहुत अच्छा सत्र रहा।
सत्र के बाद हम लोगों ने वहीं रात का खाना खाया। खाना खाकर होटल आ गए।
बुंदेलखंड लिटरेचर फ़ेस्टीवल में आयोजकों का सुंदर, आत्मीय व्यवहार और हर चीज़ को यथा सम्भव अच्छा करने की कोशिश लगातार दिखी। मुख्य आयोजक चंद्रप्रताप नेपथ्य से कार्यक्रम का संचालन करते दिखे। सबसे सुखद अनुभव आयोजन से जुड़ी युवा लोगों की टीम को देखकर हुआ। सब युवा बच्चे अपने-अपने कामकाज छोड़कर कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास में जुटे रहे। इधर-उधर दौड़ते-भागते इंतज़ाम में जुटे हैं। कई लोग कार्यक्रम के आयोजन के लिए बाहर से भी आए हैं, कोई गुड़गाँव से, कोई दिल्ली से, कोई कहीं और से। दफ़्तर से छुट्टी लेकर, इम्तहान की तैयारी स्थगित, कोई कालेज छोड़कर कार्यक्रम को सफल बनाने में लगे हैं। प्रशाशनिक लफड़ों के चलते कार्यक्रम स्थल अटल पार्क से बदलकर जनरन विपिन रावत पार्क होने के कारण भी बहुत मेहनत करनी पड़ी पूरी टीम को। सबको कार्यक्रम की सफलता के लिए जुटा देखकर बहुत अच्छा लगा। इस सुखद अनुभूति के लिए चंद्रप्रताप जी और उनकी पूरी टीम को बहुत बधाई , शुभकामनाएं।

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