Saturday, March 01, 2025

श्रीलंका में वीडियोबाज़ी


श्रीलंका पहुँचने के दूसरे दिन सुबह होटल के लाउंज में नाश्ता करने के लिए जिस जगह बैठे थे वहाँ से सड़क का नजारा भी दिख रहा था। सड़क पर आते-जाते लोग और वाहन दिख रहे थे। वाहनों में आटो ही ज़्यादा थे। बाद में पता चला कि आटो को यहाँ टुकटुक कहते हैं। शायद अपने यहाँ भी कहते हों किसी इलाक़े में।
कानपुर में पहले जिस तरह जो टेम्पो चलते थे उनको उनके दिखावट के कारण लोग गणेश जी और सुअर कहते थे। कहने को तो कोई कुछ भी कह सकता लेकिन लेकिन नाम चलन में तभी आता है जब आम जनता उसको अमल में लाती है। किसी भी नाम के चलन के लिए आम जनता सक्षम अधिकारी होती है।
अपने यहाँ कई शहरों और जगहों के नाम बदले लेकिन उनमें से कई को लोग पुराने नाम से ही जानते हैं। इलाहाबाद के मुक़ाबले हमें आज भी प्रयागराज पराया नाम लगता है। ऐसे जैसे अपने घर के लोगों का घर का पुकारने का नाम ही ज़बान पर ज़्यादा आता है। स्कूल में लिखा नाम याद करना पड़ता है।
बहरहाल, होटल में नाश्ता करते हुए ख़्याल आया कि यात्राओं और वृत्तांतों का वीडियो बनाया जाए। ख़्याल पर फ़ौरन अमल किया गया। वीडियो बनाया गया जिसमें सड़क और होटल के सीन शामिल थे। वीडियो में आवाज़ धीमी थी। सोचा कि आडियो माइक का प्रयोग किया जाए। आडियो माइक लाएँगे तब वीडियो भी बनाएँगे। पोस्ट में लगाया है वीडियो। सुनकर अपनी राय बताइए। अगर ठीक लगा तो आगे भी बनाएँगे और वीडियोबाजी की शुरुआत का श्रेय श्रीलंका यात्रा को जाएगा।
होटल से निकलकर हम लोग म्यूज़ियम देखने निकले। इतवार की छुट्टी होने के कारण सड़क पर ज़्यादा भीड़ नहीं थी। थोड़ी ही देर में म्यूज़ियम पहुँच गए।
म्यूज़ियम के बाहर ही एक बड़ा पेड़ था। सबने बारी-बारी से पेड़ के साथ फ़ोटो खिंचवाया। पेड़ बेचारा सबके साथ खड़ा चुपचाप फ़ोटो खिंचवाता रहा। लोग अलग-अलग पोज में फ़ोटो खिंचाते रहे लेकिन पेड़ एक ही पोज में रहा। उसको जैसे किसी ने सटेच्यु बोल दिया हो।
म्यूज़ियम के टिकट लेकर हम अंदर गए। एक लम्बे गलियारे को पार करके फिर म्यूज़ियम है। म्यूज़ियम में प्रकृति-पर्यावरण, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के बारे में तमाम जानकारियाँ दी हुईं थी। चित्रों के माध्यम से समझाया गया था प्रकृति और जीव जंतु में क्या सम्बंध हैं।
एक हाथी के चित्र के माध्यम से बताया गया था कि हाथी जब मरता है तो उसका जीवाश्म कैसे रूप बदलता है। मोर, मधुमक्खी, तितली, हिरन, मछली आदि से जुड़ी अनेक जानकारियाँ जिनको देखने और समझने में पूरे दिन का समय भी कम होता हम लोग आधे घंटे से भी कम समय में सरपट देखकर बाहर निकल आए।
हमें लगा कि म्यूज़ियम में श्रीलंका के इतिहास की जानकारी तो कुछ है ही नहीं। लेकिन पता चला कि इतिहास से जुड़ी जानकारी वाला म्यूज़ियम अलग है। हम लोग म्यूज़ियम का वह हिस्सा भी देखने गए।
म्यूज़ियम के बाहर साफ़-सफ़ाई चाक-चौबंद थी। एक महिला पेड़ से गिरी पत्तियाँ झाड़ू से किनारे करती हुई दिखी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर सड़क पर पेड़ों की पत्तियाँ अच्छी लगती हैं। रास्तों पर पत्तियाँ देखकर ऐसे लगता है मानों रास्तों की ड्रेस पर पत्तियों की पेंटिंग कर दी हो प्रकृति ने। लेकिन साफ़-सफ़ाई पसंद लोगों को सब कुछ साफ़ ही अच्छा लगता है।
एक जाल में प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा की हुई थीं। श्रीलंका में साफ़-सफ़ाई का यह स्तर देखकर अच्छा लगा। काश अपने यहाँ भी सार्वजनिक स्थलों पर ऐसी साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था की जाती।
सोचने की कोई फ़ीस श्रीलंका में भी नहीं लगती इसलिए ऐसा सोचते हुए हम मुख्य म्यूज़ियम की तरफ़ बढ़ गए।

#श्रीलंका,#shrilanka-17

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