Wednesday, May 20, 2015

भैंस बियानी गढ़ महुबे में

आज सुबह निकले सूरज भाई आसमान पर मौजूद थे। सर्चलाइट की तरह। लगता है किसी ने उनको बता दिया होगा कि कल उनकी 'लेट' लगते हुए बची।
केवी स्कूल के पास एक आदमी लकड़ियां और पेड़ों की छाल बटोरकर साईकिल के कैरियर पर धर रहा था।पेड़ रोज कुछ लकड़ी और छाल गिरा देते हैं जिनको लोग बटोर लेते हैं। ये तो बढ़िया बात है कि पेड़ पौधे जो लकड़ी,आक्सीजन, फूल देते हैं उनपर एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स नहीं लगता अभी। वरना अनगिनत पेड़ों को रोज नोटिस मिलता। कुछ अंदर भी हो जाते।
आज काली मन्दिर के पास रहते लोगों से बतियाये। लोग सुबह की गतिविधियों में लगे थे। खाना बनाने, मुंह धोते, सब्जी काटते, उंघते, जागते, बतियाते लोग।आसपास के शहरों से आये हुए लोग हैं ये। गाँव घर में छोटी मोटी खेती है। हफ्ते,पन्द्रह दिन,महीना भर के लिए आते हैं। मजूरी करते हैं। वापस चले जाते हैं।फिर आते हैं। आते-जाते रहते हैं।
जिनसे बतियाये वो कुंडम जिले के पास किसी गाँव से आये हैं। नर्मदा की सहायक हिरन नदी के किनारे है गाँव। कोदों सवा की खेती होती है गाँव में।
एक बुजुर्ग खाना बना रहे थे। एक अलम्युनियम की पतीली को दो चट्टान के बीच बने चूल्हे पर रखे भात पका रहे थे। जब पक गया तो अपने खुरदुरे हाथ से उतार लिया। भात को अलम्युनियम की थाली में फैला लिया। पतीली में दाल चढ़ा दी। हमने कहा ये भात तो ठंडा हो जाएगा कुछ देर में। इस पर वहीं खड़े एक आदमी ने कहा-'उससे क्या हुआ? दाल तो गरम होगी। मिलाकर खा लेंगे।'
अनगिनत परिवार खुले में पेड़ों की छाया में रहते हैं।अचानक पानी बरसता है भागकर पुल के नीचे शरण लेते हैं। बरसात में या तो घर चले जाते हैं या फिर बरसाती तानते हैं। जाड़े में भी यही हाल। मच्छर बहुत काटते हैं। लोग नहाये हुए थे लेकिन बिना नहाये लग रहे थे। बोरा,पालीथीन बिछाये सोये लोग धूल,मिट्टी से जुड़े हुए थे।
एक आदमी आहिस्ते-आहिस्ते टमाटर प्याज काट रहा था। उसकी घरैतिन हमको लोगों से बतियाते हुए देखती हुई खाना बना रही थी। फिर कटे हुए टमाटर प्याज बटलोई में डालकर चलाने लगी।
बतियाते हुए लोग बुजुर्ग से मौज लेते जा रहे थे। बोले-'दादा शादी भी कराते हैं। दादी घर में इन्तजार करती हैं। हर हफ्ते चले जाते हैं। बच्चे भी हैं घर में।'दादा मुस्कराते हुए खाना बनाते रहे।
फोटो दिखाई तो लोग बोले-'वाह ये तो बढ़िया बन गई।' फिर बगल में खाना बनाते लोगों की फोटो भी खींचने को कहा। महिलाएं खाना बना रहीं थीं। एक आदमी ऊंघता हुआ भी दिखा। शायद खाना बन जाने के बाद खाने के लिए उठे।
पुल के नीचे एक आदमी थाली को तवे की तरह चूल्हे पर रखे रोटी सेंक रहा था। बेलन और चौकी के बिना हाथ से लोई को पहले शंकु जैसा बनाकर फिर दोनों हाथ से थपकते हुए गोल रोटी बना रहा था। थाली की रोटी जब कुछ सिंक गयी तो उसे उँगलियों के चिमटे से उतार कर चूल्हे की आग की अदालत में पेश कर दिया। आग ने उसे सेंक दिया तो उसने उसे उठाकर दूसरी थाली में धर दिया। मोटी रोटी ऐसी ही लग रही थी जिसकी अनगिनत कवि,लेखक सोंधी रोटी बताते हुए न जाने क्या,क्या लिखते हैं उसके सोंधेपन के बारे में। रोटी बनाते आदमी के पीछे खम्भे पर अंग्रेजी सिखाने का विज्ञापन दिख रहा था। आदमी उससे बेपरवाह अगली रोटी बनाने में तल्लीन हो गया।
चाय की दूकान पर कुछ लोग बैठे बतिया रहे थे। बीड़ी पीते हुए। एक ने बताया कि लाइटर 10 रूपये का आता है। उसमें गैस 5 रूपये की भरती है हर बार।
वहां मौजूद आदमी मजेदार अंदाज में अपनी हांक रहा था। कुछ सुनिये आप भी-' दिन में पचास बीड़ी पी जाते हैं। पहले चोरी-चोरी पीते थे। 25 साल की उम्र से। अब 52 के हो गए। इसके बिना चैन नहीं। बिना पिये रह नहीं सकते। डाक्टर बोला है कि बीड़ी छोड़ दो वरना दांत की माँ-बहन हो जायेगी। लेकिन हम नहीं छोड़ पाते। छोड़े वो जिसको ज्यादा जीना है। अपन तो खा-पीकर जाएंगे आराम से। कुछ करते नहीं। तीन लड़के हैं। खाने-पीने और दारु का पैसा देते हैं। फिर किस बात की चिंता करना।'
पीने की बात चली तो बोले-'नीट पीते हैं। पानी नहीं मिलाते।पूछ लो किसी से। रोज डेढ़ पाव पीते हैं।मिलो कभी तो फिर बताते हैं। अभी सुबह सुबह क्या बताएं।' काम काज के बारे में बोले-'अब कुछ नहीं करते। बच्चे एवन निकले। कभी-कभी मछली पकड़ने चले जाते हैं।'
साथ में एक कुत्ता था। बोले-'कुत्ता ब्रह्मचारी है। कितनी भी गरम कुतिया दिखे इसे लेकिन यह सूँघता तक नहीं।' हमने कहा-' कैसा कुत्ता है तुम्हारा भाई। खुद के तीन बच्चे। कुत्ते के एक भी नहीं।' इस पर उसने यही कहा-'बुढ्ढा हो गया है अब।'
चाय वाला इस सबको सुनता हुआ आराम से चाय छानता,ग्राहकों को देता रहा।
लौटते हुए एक पुलिया पर एक आदमी अपने पैर सहला रहा था। बगल में बिजली का प्लास रखा था।
लौटकर देखते हैं तो अखबार में एक सचिव के यहां करोड़ों की अधोषित सम्पत्ति पाये जाने की खबर छपी हुई थी। 20 एकड़ जमीन, 4 मकान और 1 होटल मिला उसके पास। मुझे फिर खुल्ले में खाना बनाते हुए वो लोग याद आये जिनसे सुबह मिले थे। इनकी सम्पत्ति में उनकी हड़पी हुई कितनी है कहना मुश्किल है।
परसाईजी का एक लेख भी याद आया-' शहर में एक सड़क बनती है। उससे दूर कहीं एक कोठी निकल आती है--भैस बियानी गढ़ महुबे में, पड़वा गिरा कनौजे जाय।'
कहां से शुरू हुए कहां पहुंच गए। दफ्तर का समय हो गया। चलें।
आपका दिन मंगलमय हो।

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1 comment:

  1. क्या खूब सुवह की सैर का जीवान्त बर्णन ।अपने पास तो साईकिल नहीं है। आपका साईकिल से भ्रमण देख कर मेरा मन भी साई|किल खरीदने को लालाईत हो रहा है।

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