Monday, May 25, 2015

बदहाल शिक्षा व्यवस्था

मजाक-मजाक में मई 25 हो गयी आज। सुबह जगे तो देर तक सोचते रहे किधर निकलें आज। सुबह निकलने के पहले रोज यही होता है।सोचते रहते हैं। सोचें न तो बहुत पहले ही निकल लें। कभी-कभी यह भी मन आता है कि बिना बिचारे निकल लें। लेकिन वो दोहा सामने आकर खड़ा हो जाता है:

"बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछिताय।"

बहरहाल, आज व्हीकल मोड़ की चाय की दूकान पर अड्डा जमा। दो बुजुर्ग आपस में बतिया रहे थे। चाय पीते हुए। अपने नातियों के किस्से सुना रहे थे। नाती उनसे कैसे मासूमियत से पैसे मांगते हैं और मिल जाने पर कैसे खुश हो जाते हैं यह बताते हुए उनके चेहरे पर जो मुस्कान चस्पां हुई उसे देखकर लगा कि अपने नाती की मुस्कान की फोटोकॉपी चिपकाएं हों मुखड़े पर।

नाम बताया नारायण प्रसाद। 2005 में वीएफजे से रिटायर हुए। 35 साल 8 महीने की नौकरी के बाद। बोले- "न हम आईटीआई न डिप्लोमा, लेकिन जो जॉब बाँध दिया मशीन पर वो बना के ही उतारा। कोई सा भी जॉब ऐसा नहीं जिसको हम बना न पाएं। रिटायर पर फ़ोटू हुई तो जीएम बोला-'हम आठ फैक्ट्री घूम आये। आज तक कोई ऐसा न मिला जिसकी 35 साल की सर्विस में न एक्को लेट,न कोई मेमो, न कोई चार्जशीट। हमारे हाथ में होता तो हम पांच साल की सर्विस अभी बढ़ा देते।' हमने कही-'साहब,आपने इत्ता कहा बस वही हमारे लिए बहुत है।'"
चहकते हुए बताते नारायण प्रसाद फोटो खिंचाते हुए गम्भीर हो से हो गए। मुस्कराने को बोला तो और तन गए।फोटो दिखाई तो खुश हो गए।

अपने काम को लेकर जो गर्व का भाव 70 साल के बुजुर्ग के चेहरे पर दिखा।वह आजकल कम होता नजर आता है। कम क्या खत्तम टाइप हो रहा है सब।जाने कैसी पढ़ाई होती है आजकल।


और पढ़ाई तो माशाअल्लाह। इंजीनियरिंग कालेज के बच्चे पहले तो भर्ती के लिए कोचिंग की शरण में जाते थे। अब वे इंजीनियरिंग कालेज में पास होने के लिए भी कोचिंग करते हैं। कल एक बच्चे को फोन किया तो पता लगा कि सर्वेयिंग (सिविल इंजिनियरिंग) के लिये कोचिंग क्लास में था। बताया की कालेज में फैकल्टी नहीं है।
कल के अखबार में खबर छपी थी -'प्रदेश में हर साल बन रहे 33 हजार 847 इंजीनियर, काम के सिर्फ 746' । प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज फायदे का सौदा नजर आया तो कालेज ऐसे खोले भाई लोगों ने जैसे हर गुमटी वाला पान मसाले की पुड़िया लटका लेता है बेचने के लिए। हर अगले फ़ार्म हॉउस पर एक प्रोफेशनल कालेज की होर्डिंग लगी है। फैकल्टी नहीं, लैब नहीं, रोजगार नहीं लेकिन कालेज तो है। जगह-जगह प्रोफेशनल पढ़ाई के नाम पर मध्यमवर्ग के पैसे चूसक ठीहे खुले हैं।

हाल यह है कि इन कॉलेजों से बीटेक/एम टेक किये लड़के स्टोरकीपर, दरबान की नौकरी में (जिनके लिए दसवीं/बाहरवीं पास जरूरत है) आ रहे हैं। यह चलन बढ़ता जा रहा है।

होना तो यह चाहिए कि जिन प्राइवेट कालेज में फैकल्टी नहीं है उनको फौरन बन्द कर देना चाहिए। लेकिन यह निर्णय कैसे होगा। जिनके कालेज हैं वे ही निर्णय लेने वाले हैं। अपने पेट पर क्यों लात मारेगा कोई।

लौटते समय पुलिया पर दो महिलाएं बैठीं मिलीं।फैक्ट्री खुलने के इन्तजार में हैं। 7.30 पर अंदर हो जाएंगी। घर से खाना बनाकर और खुद के लिए भी लेकर निकली हैं।पति फैक्ट्री में थे। नहीं रहे तो उनकी जगह नौकरी पायी हैं। 10 साल कर चुकीं 10 अभी और बाकी है।यह सरकार संस्थान हैं मृतक आश्रित को सहारा देते हैं। निजी संस्थान होता तो बहुत हुआ तो एकमुश्त कुछ पैसा देकर छुट्टी पा लेते।

अभी गाना बज रहा है:

......पूरा लन्दन ठुमकता।

लन्दन तो खैर अभी जगा नहीं होगा। आप जग गए होंगे तो उठिए अब। गुडमॉर्निंग बोलिये खुद को और मुस्कराते हुए दिन शुरू करिये। जो होगा देखा जाएगा।

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