Monday, May 18, 2015

चलो हम दीया बन जाते हैं

आज सुबह उठने में फिर देर हो गयी। हुआ कुछ ऐसा कि श्रीमती जी को सुबह जल्दी उठना था। वो रात भर घड़ी- घड़ी जागकर घड़ी देखती रहती हैं। हमने कहा -'तुम चैन से सो जाओ। हम जगा देंगे।' उन्होंने कहा-'ओक्केय।जगा देना। पक्का।'

हम अलार्म लगाकर सोये। सुबह अलार्म बजा। हम जगे। पत्नीश्री को फोन किया। पता चला वो नहा रही थीं। मतलब हमारे जगाने से पहले ही जगी हुई थीं। आज भी रात भर बार बार घड़ी देखतीं रहीं। यह अक्सर होता है। हम जब भी जगाते हैं उनको पता चलता है वो पहले से ही जगी हुई हैं। जिस किसी दिन फोन न किया जाए उस दिन सुनना पड़ता है--'आज उठने में देर हो गई। तुमने भी नहीं जगाया।'

बहरहाल जगे हुए को फिर से जगाकर हम फिर से सो गए थोड़ी देर के लिए।सोचा थी कि थोड़ी देर में जगेगें और जाएंगे घूमने। लेकिन जब जगे तब तक घड़ी 7 पार हो चुकी थी। फिर भी जाने की सोची लेकिन सोचने लगे कि पास में फुटकर पैसे नहीं हैं। 100 का नोट है। पता नहीं सुबह सुबह चाय मिलेगी कि नहीं। सोच ही रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई और मेस से सोनू हमारे 'दो कपिया थर्मस में चाय' और साथ में अखबार लेकर आ गए। मतलब सुबह की साईकिल सवारी आज भी स्थगित।

कल से एनडीटीवी में एक खबर चल रही है। लखनऊ विश्वविद्यालय की अध्यापक प्रीति चौधरी ने बुन्देलखण्ड के किसानों की फसल बर्बाद हो जाने पर अपनी और अपने पति की एक महीने की तनख्वाह (2 लाख) उन किसानों के परिजनों को देने की सूचना फेसबुक पर देते हुए अपने मित्रों से अनुरोध किया कि वे अपनी एक दिन की तनख्वाह उन किसानों के सहयोग के लिए दें।

प्रीति के आह्वान पर उनके मित्रों ने 15 दिन में 33 लाख का सहयोग दिया। प्रीति ने 33 किसानों के नाम एक-एक लाख की एफ डी कराकर उनको दी। झांसी से इस घटना की रिपोर्टिंग करते हुए एनडीटीवी के कमाल खान ने एक प्रभावित महिला का बयान सुनवाया। उसमें महिला कह रही थी-'इतना तो अपने भी नहीं करते।' खबर यहां देख सकते हैं http://khabar.ndtv.com/…/lacknow-university-professor-colle…

छोटे-छोटे सहयोग से कितने बड़े और प्यारे और अनुकरणीय काम हो सकते हैं इसका परिचायक है यह घटना। प्रीति चौधरी और उनके पति बधाई और तारीफ़ के पात्र हैं जिन्होंने फेसबुक का उपयोग करते हुए यह भला काम किया।


कल ही मिलना हुआ बोधिसत्व और आभा और भानी से। बनारस जाती हुई गाड़ी दस मिनट के लिए रूकती है जबलपुर में। एक घण्टा लेट हुई केवल।दस में पांच मिनट फोटोबाजी में उपयोग हुए। बाकी में कुशल क्षेम और लौटते समय फिर मिलने का वायदा।

टीवी प्रधानमन्त्री के सियोल दौरे की और मंगोलिया में भेंट में मिले घोड़े की खबर चल रही है। टीवी के ऊपर घड़ी बता रही है कि दफ्तर के लिए तैयार होने का समय हो गया। चलते हैं अब। चलते चलते बांचिये आभा की यह प्रेम कविता।
चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती ...
हमें सात फेरों या कि कुबूल है से
क्या लेना-देना
हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया-बाती के
सम्बन्ध को......... मसलन रोशनी
हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज़्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम-प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा ख़त हमारी चमक में ।
तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना....कुछ पल........
दिनेश राय द्विवेदी जी ने सूचना दी की आज आभा-बोधिसत्व की वैवाहिक वर्षगांठ है। उनको उनकी शादी की सालगिरह पर हार्दिक मंगलकामनायें।

आप भी अपने साथियों के साथ जगर-मगर यात्रा में चलना शुरू कीजिये। आपका दिन मंगलमय हो। शुभ हो।Abha Bodhisatva Bodhi Sattva

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