Tuesday, May 05, 2015

बड़ा डिफाल्टर समय चल रहा है

सबेरे निकले साइकिलियाने तो चिड़ियाँ ने चहचहाते हुए गुडमार्निंग बोला। सामने मैदान में बच्चे फुटबाल खेल रहे थे। दो बच्ची तीन बच्चे। फ़ुटबाल को इधर उधर लुढ़काते हुए।

सड़क पर एक महिला स्कूटी चलाना सीख रही थी शायद। अचानक स्कूटी पैरों के स्टैंड पर खडाकरके रुक गयी। स्कूटी सरकारी ग्रांट रुक जाने पर किसी परियोजना की प्रगति सरीखी बीच सड़क पर ठहर गयी। मैने सोचा कि पूछें क्या समस्या है।लेकिन सोचते सोचते 5 पैडल मार चुके थे। फिर पलटकर नहीं पूछा।

एक भाईसाहब बस स्टैंड की रेलिंग के सहारे वर्जिश कर रहे थे। हर बार मुंह से काँखने की आवाज निकालते हुए।सामने सड़क पर देखते भी जा रहे थे कि लोग उनको वर्जिश करते हुए देख रहे हैं।

एक बच्ची सड़क पर टहल रही थी। गोरा रंग। गहरे भूरे बाल कन्धे के नीचे तक बराबर कटे हुए। दायीं तरफ के बाल हवा में लहराने के बहाने बच्ची की गर्दन और गाल छूने की कोशिश कर रहे थे।नीचे गिर रहे थे। फिर उचक रहे थे। बड़ी होती बच्ची बालों की हरकत पर मुस्करा सी रही थी।

पांच लड़के टहल रहे थे। एक के कान में इयरप्लग और दो के मुंह में गुटका था। बाकी दो नार्मल। खरामा खरामा टहल रहे थे।

दो महाराष्ट्रियन सहेलियां मराठी में बतियाती चली जा रहीं थी। उनके बगल से निकलते हुए उनकी बातें सुनते हुए फोटो लेने का मन हुआ। आगे रूककर फोटो लिया। एक महिला ने मुझे फ़ोटो लेते देखा तो पल्लू सर पर रख लिया। महिलाओं की सौंदर्य के प्रति सहज रूप से सजग होती हैं।

रांझी रोड पर एक महिला अपने घर का कूड़ा सड़क पार करके दूसरी तरफ फेंक रही थी। दूसरी तरफ वाली भी अपना कूड़ा सड़क की दूसरी तरफ फेकती होंगी।

आगे कालोनी दिखा। नाम लिखा था -'जजेज कालोनी।' अंग्रेजी को देवनागरी में लिख दिया। बस हो गयी हिंदी। बेहतर होता कि बीच का 'जे' उड़ाकर 'जज कालोनी' लिख देते या फिर 'जे' शुरू में लिखते और आखिर में 'है' जोड़ देते तो नाम का जबलपुरीकरण ही हो जाता -'जेजज कालोनी है' मतलब यह जज कालोनी है।

जज की बात पर शाहजहाँपुर के हृदयेश जी के उपन्यास 'सफेद घोड़ा काला सवार' का एक किस्सा याद आ गया। एक जज साहब ऊँचा सुनते थे। सुनने की मशीन लगाते थे। एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान उनकी कान की मशीन ख़राब हो गयी। उनको कुछ समझ नहीं आया। सुनाई भी नहीं दिया। लेकिन किसी से कह भी नहीं पाये। बिना ठीक से बहस सुने ही मुकदमा सुना दिया माननीय ने।

अक्सर लोगों को अदालतों के फैसले से निराशा होती है। ऐसे में लोग न्यायाधीश को कोसते हैं। लेकिन कभी कभी ऐसे मामलों में देश के तकनीकी अविकास का भी योगदान होता है। सब दोष माननीय का ही नहीं होता।
चाय की दुकान पर चाय वाला किसी को माँ बहन की गाली देते हुए भन्ना रहा था। ध्यान से सुना तो वह आजकल की लड़कियों को कोस रहा था जो कि स्कूल और कोचिंग जाने के बहाने न जाने किससे किससे मिलती हैं। बतियाती हैं। काम भर का कोसने के बाद शायद ब्रेक लेते हुए वह बोला-'बड़ा डिफाल्टर समय चल रहा है।'

हमने ऐसे ही उसका हितचिंतक बनते हुए पुछा-'क्या आपके घर की कोई बच्ची ऐसा करती है?'

'हमारे घर की लड़की ऐसा करती तो फाड़ न डालते।हम तो जमाने के चलन की बात कर रहे हैं।'साथ के एक भाई साहब ने स्वत:स्फूर्त जबाब दिया।

बगल के रेडियो में गाना बज रहा था-

'तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो
तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्ही हो।'
पता नहीं जिन माता,पिता,बन्धु,सखा की बात गाने में की गयी है उनके विचार इस बारे में क्या होंगे। क्या वो भी बच्चियों के किसी से बात करने पर उनको फाड़ डालने की सोचते होंगे।

सामने से कुछ महिलायें और बच्चे आते हैं। सबसे बुजुर्ग महिला अपने सर पर झोला रखे रखे ऑटो से किराया तय करके सबको साथ लेकर चली गयी।

सड़क की दूसरी तरफ एक बुजुर्ग सबको राधे राधे बोलते जा रहे हैं। एक घर के बाहर खटिया पर बैठे आदमी को चाय देती है।महिला भी सामने चाय के ग्लास को दोनों हाथों के बीच थामे उकड़ू बैठे सड़क पर आते जाते लोगों को देखते हुए चाय पी रही है।

लौटते हुए वह भूरे बाल वाली बच्ची फिर दिखती है। टहलते हुए तक जाने के चलते शायद फुटपाथ पर बैठकर सुस्ता रही है। पिछली जगह जहां वह दिखी थी उस जगह से यह जगह 1 किमी दूर होगी। इस बीच मेरा करीब 7-8 किमी का चक्कर हो गया।

मेस के पास एक आदमी साइकिल के कैरियर पर लकड़ी इकठ्ठा करते हुए जा रहा है।एक जगह पेड़ की बड़ी छाल सी दिखी तो साइकिल रोककर उसको उठाकर कैरियर पर रखा। पुलिया पर एक बहन जी बैग थामे बैठी हैं। शायद किसी सवारी का इन्तजार है।

मेस में लौटकर साइकिल खड़ी करते हुए पसीना महसूस करते हैं। पसीने की बात पर नन्दन जी कविता याद आती है जिसमें आदमी और घोड़े के पसीने का जिक्र है।

कितना टहला दिया आपको सुबह सुबह।

चलिए।आपको आज का दिन शुभ हो।मंगलमय हो।

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