Friday, May 29, 2015

मजूरी के लिए निकली वीरांगनायें

सुबह उठकर आज सबसे पहले रॉबर्टसन झील की तरफ गए। झील सोई थी। पानी ठहरा। कोई छोटी मछली या कोई और जलजीव पानी में कूदता तो झील थोड़ा सा कुनमुनाकर फिर सो जाती। ऊपर से सूरज अपनी लाली से झील के पानी में उस जगह 'किरणपैड' सा बना रहा था जहां वह झील के पानी में उतरेगा।

शोभापुर रेलवे क्रासिंग बन्द थी। एक इंजन धड़धड़ाता हुआ पटरियों पर से निकला। पटरियां थरथराती हुई इंजन से मानों पूछती रहीं बहुत देर तक-'भईया अकेले आये। बच्चों को नहीं लाये।' इंजन बिना कोई जबाब दिए भड़भड़ाता चला गया।

लोग घरों के बाहर, सड़क पर, पेड़ के नीचे बैठे दिखे। कइयों के चेहरे पर नींद, उबासी,उनींदापन चिपका था।कुछ अनमने से भी दिखे लोग और कुछ उदास भी। कई लोग ऐसे भी दिखे तो तेजी से टहल रहे थे। उनके चेहरे के भाव कहीं रास्ते ने गिर गए होंगे शायद। चेहरे सपाट थे उनके।

क्रासिंग पार अधबने ओवरब्रिज के नीचे लोग चूल्हे जलाये खाना बनाने में जुटे हुए थे। कई घरों में उस समय बेड टी भी न बनी होगी जब इनका दिन का खाना बन रहा रहा।

चाय की दुकान पर लोग इकट्ठा थे।हंसी-मजाक के बीच गाली-गलौज कर रहे थे।शायद हमको प्रभावित करने के लिहाज से चुनिंदा गालियों की झड़ी लगा दी। कुछ ऐसे ही जैसे कोई बाहरी मेहमान आता है तो हम अपने सबसे दर्शनीय स्थल दिखाने ले जाते हैं।

एक ऑटो वाला खड़ा था। पता लगा नया ऑटो लिया है। ढाई लाख का। परमिट के पांच हजार। कानपुर में परमिट के तीन लाख से भी ज्यादा पड़ते हैं।लोगों ने बताया कि बीड़ी पीने का शौक ऐसा है ऑटो वाले भाई जी का कि अगर कोई सवारी बीड़ी के धुएं पर एतराज करती है तो सवारी उतार देते हैं।

चाय वाले से जब पूछा कि कितनी चाय दिन में बिक जाती हैं तो उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी उमर पूछने पर महिलाओं की होने की बात कही जाती है। बोले- 'ये गिनती तो अपन ने भी नहीं की कभी।'

आगे कंचनपुर में एक हैंडपंप के नीचे दो महिलाएं नहा रहीं थीं। एक महिला पूरा ऊपरी बदन उघारे तन्मय होकर साबुन लगा रही थी। हम आगे निकल गए लेकिन वह दृश्य बहुत देर तक पीछा करता रहा। अभी फिर सामने आकर खड़ा हो गया।



आगे आधारताल सब्जी मण्डी चौराहे के पास बिरसा मुंडा की मूर्ति के पास से वापस आने के लिए महाराजपुर की तरफ चल दिए। व्हीकल मोड़ से रिछाई की तरफ। रेलवे फाटक के पहले दो महिलाएं सर पर घड़े रखे आ रहीं थीं। वीरांगना सरीखी। सुबह-सुबह सर पर घड़े रखकर मजूरी के लिए निकली वीरांगना ही तो कहलायेगी। जीवन समर में मेहनत की तलवार से कठिनाइयों का संहार करती वीरांगनाएं हैं ये। जब तक ये युध्द में डटी हैं, मानवता का भविष्य सुरक्षित है।


रिछाई गाँव में कई लोग ईंट के भट्टों पर काम में जुटे थे। एक भट्टे पर एक परिवार के तीन लोग मिले। एक महिला और एक पुरुष मिटटी की लोई सरीखी बना रहे थे। आदमी उनको ईंट के साँचे में ढालता जा रहा था।
ईंट के लिए मिट्टी पास के एक गाँव से लाते हैं। 600 रूपये प्रति ट्राली जिसमें करीब 1000/1100 सौ ईंट बन जाती हैं। ईंधन,मेहनत लगाकर जो ईंटे बनती हैं वो 3/4 हजार रूपये प्रति हजार के हिसाब से बिकती हैं। दिन भर में सात आठ सौ ईंटे पाथ लेते हैं। 15 दिन के करीब भट्ठा लगाते हैं।

हम जब बात कर रहे थे पुरुष से तो महिला हल्की मुस्कान के धारण किये काम करती हुई सुन रहीं थी बातें। फोटो खींचने के लिए पूछा तो हाँ कहकर बताया -'कल भी एक जने खींचकर ले गए थे।'

कमाई का कोई साधन जब कौतुहल और फोटो खींचने का विषय बन जाए तो लगता है कि उसके कठिन दिन आ गए हैं। ऐसा मुझे वहां से लौटते हुए लगा।

लौटकर मेस आ गए। चाय मिल गयी। पीते हुए पोस्ट कर रहे हैं।

आपका दिन शुभ हो।मंगलमय हो।

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