Sunday, May 03, 2015

अरुण पाण्डेय जी से मुलाक़ात

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.Shubham से हमारी मुलाक़ात हुई डुमना पार्क में पिछले इतवार को। उस मुलाक़ात के बारे में लिखा तो उसको अपने गुरूजी को दिखाया शुभम ने। फिर हमारी साइकिल फोटो भेजी। फ़ोटो देखकर कुछ दोस्तों ने कहा-इसको कवर फोटो बना लें।

शुभम ने बताया कि उनके गुरूजी हमसे मिलना चाहते हैं। गुरूजी का नाम पूछा तो बताया -अरुण पाण्डेय।नाम सुनते ही हमने पूछा- वही अरुण पाण्डेय जिन्होंने 'गुरु परसाई के व्यंग्य वाण' संकलित किये हैं? पता चला हाँ वही। सो हम फौरन मिलने के लिए उत्सुक हो गए।

परसाईजी से जुड़े रहे किसी भी व्यक्ति से मिलने का मुझे तुरन्त मन होता है। आज व्यंग्य तमाम लोग लिखते हैं। व्यंग्य के परसाई और जोशी से आगे जाने की बात भी करते हैं। बहुत बुद्धिमान भी हैं लोग। लेकिन परसाई जी के व्यंग्य आज भी अद्भुत लगते हैं। परसाई जी भले कहते थे कि कालजयी लेखन उनका उद्देश्य नहीं है। वे आज के लिए लिखते हैं।अपना लिखा रोज मरता देखते हैं। फिर भी परसाई जी का लेखन कालजयी है। उनके व्यंग्य लेख आज भी अद्भुत,मारक लगते हैं। इसका कारण क्या है?

इस बारे में परसाई जी के समकालीन रहे डा.शिव कुमार मिश्र जी बात हुई। उन्होंने कहा-'परसाई जी की संवेदना बहुत विराट थी। यही विराट सम्वेदना उनके लेखन की ताकत है।'

बहरहाल बात अरुण पाण्डेय जी की। पाण्डेयजी ने परसाई जी के लेखन के उद्धरण, सूक्ति वाक्य संकलित करके पुस्तक रूप में छपवाये हैं। जब तब इसमें से उद्धरण लेकर मैंने फेसबुक पर पोस्ट भी किये हैं। इस संकलन के चलते ही मेरा मन हुआ अरुण जी से मिला जाए।

गये शाम को तो एक स्कूल में नाटक का रिहर्सल चल रहा था। जमीन पर बिछी दरी के मंच पर नाटक का अभ्यास हो रहा था। पाण्डेय जी तीसरे अंपायर की तरह नाटक मंच से कुछ फ़ीट की दूरी से नाटक का अभ्यास देख रहे थे।वहीं Vinay Amber और Ramesh Saini जी से मिलना हुआ।

मूलत: बनारस के रहने वाले अरुण पाण्डेयजी 1975 में जबलपुर आये थे। पिताजी की एलआईसी की नौकरी थी। फिर यहीं पढ़े लिखे और बस भी गए। अखबारों में काम किया। पत्रकारिता और अखबार से जुड़े रहने के कारण परसाई जी जुड़ना हुआ। अखबार के साप्ताहिक लेख हासिल करना पाण्डेयजी की जिम्मेदारी थी।

बाद में रंगमंच से जुड़ाव के चलते अख़बार छोड़ दिया। विवेचना रंगमंडल के 'फ़ुलवक्ती' कार्यकर्ता बन गए। अखबार इसलिए छोड़ा क्योंकि अखबार और नाटक के अभ्यास का समय एक ही होता है-शाम का समय। दोनों एक साथ नहीं चल सकते थे।

नाटक कैसे चुनते हैं। लिखते हैं। नाट्य रूपान्तर करते हैं इस बारे में जानकारी भी मिली। परसाई जी के तमाम लेखों का नात्यरूपांतर किया है विवेचना रंगमंडल ने। एक नाटक के अभ्यास में लगभग एक महीना लगता है। जो नाटक एक बार किया जा चुका है वह हफ्ते भर में हो जाता है।

हमने अपने लेख 'छोटी ई,बड़ी ई और वर्णमाला' के बारे में बताया। इसके नात्यरूपांतर की संभावना के बारे में चर्चा की।


आजकल नाटक में नए बच्चे जो आ रहे हैं उनमें इंजीनियरिंग मेडिकल और साइंस के भी काफी बच्चे आते हैं। पहले आमतौर पर आर्ट्स के बच्चे आते थे। शुभम ने ही आई टी ब्रांच से इंजीनियरिंग की है। लेकिन नाटक से जुड़ाव और जुनून के चलते नौकरी नहीं की। साल भर में 11 नाटक में भाग लिया/ निर्देशन किया।फिलहाल एन एस डी में एडमिशन के लिये पढ़ाई कर रहा है। 'आषाढ़ का एक दिन' में विलोम का रोल कर रहा है। 17 मई को जबलपुर में एक और नाटक है। उसको देखने जाना है।

नाटक करना घर फूंक तमाशा जैसा है। हमने पूछा पाण्डेय जी तो कि खर्च कैसे चलता है नाटक से? तो उन्होंने कहा-"आप जैसे शुभचिंतकों के सहयोग से।" हमें लगा कि हम जैसे लोग तो नाटक होने पर मुफ़्त पास के जुगाड़ में रहती है।पैसे देकर देखना तो अंतिम विकल्प मानते हैं। हम क्या सहयोग देंगे। यह तो नाटक से जुड़े लोगों का जूनून ही है कि लोग करते रहते हैं।

यह जूनून ही कहा जाएगा कि अखबार की लगी लगी नौकरी छोड़कर नाटक से पूरे समय के लिए जुड़े। जिन गुरु परसाई जी के व्यंग्य बाण संकलित किये अरुण पाण्डेय जी ने उन्होंने भी तो लिखने के लिए अपनी नौकरी छोड़ी थी।

अरुण पाण्डेय जी से यह हमारी पहली मुलाक़ात थी। अच्छा लगा। जल्दी ही फिर मुलाक़ात होगी।संस्कारधानी के ' विवेचना रंगमण्डल' के बनारसी फुलटाइमर को हमारी शुभकामनाएं।

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