Saturday, May 16, 2015

बुरा भी उतना बुरा नहीं यहां


दुनिया को बहुत जल्दी है,
जिन्दा को गिराने की, मुर्दे को उठाने की।
कुछ ऐसा ही शेर कल कक्काजी ने सुनाया कल शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में मंचित नाटक 'बाबूजी' की समाप्ति पर अपनी बात कहते हुए।

नौटंकी शैली में खेले गए नाटक बाबू जी में 'लल्लन सिंह' केंद्रीय पात्र हैं। समाज की परवाह न करते हुए अपने हिसाब से जीने वाले लल्लन सिंह समाज द्वारा लांछित स्त्री कौशल्या से विवाह करते हैं। समाज को ठेंगे पर रखकर अकेले बारात लेकर जाते हैं। शादी करते हैं। पत्नी को बराबरी का हक है। लेकिन न तुम हमको टोंको न हम तुमको वाला भाव भी।

लल्लन सिंह का नौटंकी से प्रेम है। वे एक नौटंकी कम्पनी बनाते हैं।घर में अभ्यास करते हैं। नौटंकी कम्पनी के लिए आई 'सुरसती', घर में दिन रात होते अभ्यास और शराब को कौशल्या सहन नहीं कर पाती। कई दिनों की खटपट के बाद कौशल्या अपने बच्चों के साथ लल्लन सिंह का घर छोड़कर चली जाती है।

लल्लन सिंह का परिवार कुछ दिन बाद लौट आता है। उनके बड़े बेटे 'बड़कऊ' पिता की खिलाफत करते हैं। लल्लन सिंह अपने घर से ही बेदखल होकर आँगन में पड़े रहते हैं। अपने साथियों के साथ नौटंकी का अभ्यास करते हैं।

फिर लल्लन सिंह अपना सब कुछ बेंचकर नौटंकी कम्पनी बनाते हैं। उसकी ख्याति ऐसी कि उनके खिलाफ रहने वाले भी उनकी नौटंकी देखने आते हैं।

लल्लन सिंह के यहां नाचने वाली से ठाकुर बदसलूकी करता है। अपने कारिंदे की तरफ इशारा करते हुए कहता है- 'इसका गाल चूमो, दांत से काटो। जितने दांत के निशान इसके गाल में बनेंगे उतने सौ रूपये इनाम मिलेंगे।' लड़की मना कर देती है काटने से।ठाकुर उसका हाथ पकड़कर जबरियन ऐसा करने को कहता है। लल्लन सिंह विरोध करते हैं। ठाकुर के गुंडे उसको लाठियों से बिछा देते हैं। उसी से अंतत: लल्लन सिंह की मौत होती है।

मरने के पहले सब साथ छोड़ जाते हैं लल्लन सिंह का सिवाय सुरसती के। अंतिम समय लल्लन सिंह नौटंकी ’अमरसिंह राठौर’ के डायलाग बोलने को कहते हैं सुरसती से। वह बोलती है तो वे भी डायलाग बोलते हैं। नौटंकी के पात्र को जीते हैं। शायद उस नौटंकी में शराब का सीन होगा इसलिए शराब पिलाने की जिद करते हैं। सुरसती बाबू जी की जिद पूरी करती है। वे नौटंकी का रोल अदा करते हुए ही आखिरी साँस लेते हैं।
नाटक की शुरुआत बाबूजी की मौत के सीन से होते है।उनका बेटा छुटकऊ फ्लैशबैक में जाकर बाबू जी के बारे में बताता है ।

ढाई घण्टे से ऊपर के इस संगीत शैली में खेले गए इस नाटक में बड़े बाबू के माध्यम से समाज के दोहरे चरित्र की कई झलकियां हैं। लल्लन सिंह चूँकि छिपाते नहीं इस लिए बुरे हैं। बाकी के पाप छिपे हैं इसलिए वे संभ्रांत हैं। सुरसती बदनाम है क्योंकि वह नाचने का काम करती है। लेकिन यह सरसुती ही है जो बाबूजी का साथ तब भी नहीं छोड़ती जब सब उनको छोड़ जाते हैं।

छुटकऊ न बताते तो बाबूजी मतलब लल्लन सिंह एक बदनाम व्यक्ति ही बने रहते और सुरसती एक रण्डी पतुरिया। छोटकऊ के माध्यम से विभिन्न चरित्रों के बारे में पता चलता है। एक बार फिर यह कविता याद आती है:
बुरा भी उतना बुरा नहीं यहां
न भला एकदम निष्पाप
अथक सिलसिला है
कीचड़ से पानी से कमल तक जाने का।
पाप में उतरता है आदमी
फिर पश्चाताप से गुजरता है
मारना आने से पहले
हर कोई कई तरह से मरता है
यह अलग बात है कि
इस मरण धर्मा संसार में
कोई ही कोई ठीक तरह मरता है।
कम से कम तुम ठीक तरह मरना।

नाटक में बाबूजी मर्द बने हैं। वे औरत के साथ बराबरी की बात तो करते हैं लेकिन कौशल्या को अपनी बात समझाकर अपने जूनून को पूरा करने की फुरसत उनके पास नहीं हैं। वे जब कौशल्या के लौटने पर उसको और अपने बच्चों को पहचानने से इंकार करते हुए कहते हैं- 'कई औरतों से सम्बन्ध रहे होंगे मेरे लेकिन किसी के साथ जबरदस्ती तो नहीं की'। तो लल्लन सिंह में आज के सक्षम और मन भरा (मन न मिला) तो पल्ला छुड़ा लिया वाले मर्द के दर्शन होते हैं।

नाटक में लल्लन सिंह स्त्री पुरुष की बराबरी की बात करते हैं। किसी पेशे को गलत नहीं मानते। जबरदस्ती से नहीं बनाये सम्बन्ध को उचित मानते हैं। देखने में यह समानता की बात लगती है लेकिन सामर्थ्य के लिहाज से गैरबराबर लोगों से समान व्यवहार की आशा करना घोड़े और घास की समानता की बात करना है।
लेकिन नाटक का उद्धेश्य किसी आदर्श की स्थापना नहीं है। नाटक यह बताना चाहता है कि हर व्यक्तित्व में कुछ ऐसे पहलू भी होते हैं जिनको हम अपने पूर्वाग्रह के चलते देख नहीं पाते। इस लिहाज से यह बेहतरीन नाटक रहा।

कथाकार मिथिलेश्वर द्वारा लिखे इस नाटक का नाट्य रूपांतरण किया है विभांशु वैभव ने। मूल परिकल्पना और निर्देशन था स्व. ब.व. कारन्त का। नाटक के निर्देशक थे राजेश तिवारी।

रघुवीर यादव ने भी नाटक के बारे में अपने विचार बताये। फिर जनता की बेहद मांग पर गाना भी सुनाया :
"सखी सैंया तो खूब ही कमात है,
मंहगाई डायन खाये जात है’’
'विवेचना रंगमंडल जबलपुर' के 'रंगशिविर- 2015' के समापन समारोह की प्रथम चरण की प्रस्तुति थी यह। अगले चरण का समापन जून के दूसरे सप्ताह में होगा। उसमें असगर वजाहत द्वारा लिखित नाटक जिसके मूल निर्देशक स्व. हबीब तनवीर थे -'जिन लाहौर नहीं देखा वो जनम्या ही नई' का मंचन होगा।

हमारे शुभम पाठक जिनके माध्यम से यह नाटक देखने को मिला इस नाटक में हारमोनियम पर कालीदीन बने थे। विवेचना रँगमण्डल के निर्देशक अरुण पाण्डेय जी गेट पर मुस्तैद मिले। जब मैं उनसे चन्चल बाई महिला महाविद्यालय में पहली बार मिला था तो इसी नाटक का रिहर्सल हो रहा होगा। नाटक के कला निर्देशक विनय अम्बर भी मिले।

आजकल के समय में नाटक करना घर फूंक तमाशा देखना जैसा है। ऐसे में विवेचना रँगमण्डल के लोग द्ववारा ऐसे शानदार नाटक करते देखकर उनको सलाम करने का मन होता है।
Shubham Pathak
ऊपर  के फोटो में
पहली फोटो में बड़कऊ पुलिस वालों के साथ जब पुलिस बाबू जी को उनकी शिकायत पर हड़काती है।
दूसरी में बाबू जी (तपन बैनर्जी)
तीसरी और चौथी फ़ोटो में नाटक की कार्यशाला और रिहर्सल
सूचना: नाटक का कल 17 मई को भी होगा। शहीद स्मारक प्रेक्षागृह ,गोलबाजार जबलपुर में। इसकी टिकट बिक्री की राशि नेपाल भूकम्प पीड़ितों की सहायता के लिए दी जायेगी।

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