Sunday, May 10, 2015

रजनीगन्धा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में

मेरा जीवन कोरा कागज
कोरा ही रह गया।

मड़ई की चाय की दूकान पर यही गाना बज रहा है। दुकानदार जलेबी बना रहा है। गर्दन टेढ़ी करके हाथ हिलाते हुए जलेबी तेल में डालता जा रहा है। बगल में दो लोग समोसे के लिए आलू काट रहे हैं। महीन आलू छिलके समेत। हमने पूछा तो बोला-'छिलका पतला है।' शायद उसको पता है कि छिलके में विटामिन होते हैं। ग्राहकों को इससे क्यों वंचित किया जाए।
अगला गाना बजने लगा:

रजनीगन्धा फूल तुम्हारे
महके यूं ही जीवन में।

चाय पीकर चले रांझी की तरफ। एक आदमी तेजी से सड़क पर चलता दातून करता जा रहा था। एक महिला मुंह में पानी भरकर मुंह ऊपर करके पानी को मुंह में घुमा रही थी। मुंह की भूलभुलैया में पानी चकरा रहा होगा। बच्चे घर के सामने पगडण्डी की पिच पर क्रिकेट खेल रहे थे। आगे एक मादा सूअर आँख मूंदे अलसाई सी लेटी थी। उसके दुधमुंहे बच्चे उसके स्तनों से मुंह चिपकाए दूध पी रहे थे। मुझे बाबा नागार्जुन की कविता  की पंक्तियाँ याद आईं:

धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर…
जमना-किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!
रांझी में झकास टी स्टाल दिखा। लेकिन बन्द। सारी झकास चीजों के साथ ऐसा ही होता दीखता है आजकल। नाम बड़े दर्शन सन्नाटा। आगे एक मोटरसाइकिल सवार गोद में अखबार और कैरियर पर दूध के डिब्बे लिए चले जा रहा था। एक साइकिल वाला अपने कैरियर पर अख़बार लादे एक - एक कर अखबार घरों में फेंकता जा रहा था।

खरामा खरामा चलते हुए खमरिया पार हुए। चाय की दुकान पर अखबार देखा। दो खबरें खास लगीं:
1.दफ्तर में मसाला खाने सिगरेट पीने पर एक अधिकारी दिल्ली में निलम्बित।
2.अमेरिका में दो जुड़वाँ बच्चियों के पिता अलग अलग निकले।
Gyan जी की पोस्ट याद आई । फिर साईकिल के ब्रेक, चिमटा, स्पोक्स मतलब हर हिस्से पर बात और एक्सपर्ट कमेंट।
दूकान पर हमारी साइकिल का इंटरव्यू होने लगा। कित्ते की कसवाई? हमें

हमने चाबी दे दी। कहा-'चला के देखो।' जब तक वह लौट के नहीं आया हम बने बाबा भारती उसका इंतजार करते रहे। उसकी साईकिल वहीं खड़ी थी। उसके साथ के लोग वहां थे। वह खमरिया फैक्ट्री में काम करता है। सब जानते हुए भी मन का एक कोना अविश्वास प्रस्ताव लाता रहा। लौट के आते ही वह गिर भी गया। मन को धिक्कारा भी-'नासपीटे,शक्की कहीं के।' लौटकर भाई जी ने साइकिल को पास कर दिया-'पानी की तरह चलती है।'

फिर बात ब्रेक की चली। कुछ नुक्स बताये गए। यह भी की फेल हो सकते हैं ब्रेक। इस पर किसी ने डायलॉग मारा-'अरे ब्रेक तो साले आजकल हवाई जहाज के भी फेल हो जाते हैं। ससुरी साइकिल कौन चीज है।'

हमने फोटो खींचा। दिखाया। एक को बोला -मूंछे खूब आयीं हैं। वह बोला-'पहले बताते तो ताव देते हुए खिंचाते।' दूसरा बोला-'मूंछें हों तो नत्थू लाल जैसी।'


आगे जंगल शुरू हुआ। खमरिया का। सड़क पर तीन महिलाएं उनीदीं सी हाथ में गगरियाँ थामे पानी भरने जा रहीं थीं। एक आदमी साइकिल के हैंडल पर प्लास्टिक के डब्बों को बाल्टी की तरह लटकाये चला जा रहा था।सड़क किनारे हरियाली पसरी हुई थी।

पिपरिया गाँव में फिर चाय पी। मोड़ पर दो महिलाएं घड़े लिए बैठी थीं।पास के गाँव से चलकर यहां सुस्ताने को बैठीं थीं। फोटो खींचकर दिखाया तो खुश हुईं। उनकी उनकी डलिया उनके सर पर रखवाई तो बोलीं-'भैया सम्भाल के रखवाना।' घड़े टूट जाने का डर था मन में।

हममें से तमाम लोगों को अपना जीवन कठिन लगता है। होता भी होगा। कभी कभी खुद को भी लगता है।लेकिन जब मैं आसपास के लोगों को अपने से कई गुना ज्यादा कठिन जिंदगी मुस्कराते हुए जीते देखता हूँ तो अपनी जिंदगी के दुःख बौने नजर आते हैं।

रास्ते में एक महिला लकड़ी के टुकड़े आम के पेड़ पर मारते हुए आम तोड़ती दिखी। एक बच्ची साइकिल चलाती और उसके साथ एक आदमी तेज चलता दिखा। आगे चलकर आदमी ने बच्ची को साइकिल पर बैठाकर खुद चलाई। और आगे सड़क के किनारे नीचे बनी एक मजार पर दोनों सर झुकाये मिले।

एक घर के अंदर आम का पेड़ दिखा। उस पर अमिया बिजली की हरी झालर सरीखी लगीं।

लौटकर मेस आ गए हैं। चाय पीते हुए पोस्ट लिखते रहे हैं। बाहर धूप खिली हुई है। चिड़ियाँ कोरस में मार्निंग धुन बजा रहीं हैं। किरणें मुस्कराते हुए सुबह होने की घोषणा कर रहीं हैं।

सुबह हो गयी है। आपका दिन शुभ हो।


सभी को मातृ दिवस की शुभकामनाएं।

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