Wednesday, May 06, 2015

छोटा परिवार सुखी परिवार

सुबह ठहलने निकले तो देखा गुलमोहर की एक डाली दीवार तक झुकी हुई थी। डाली के फूल दीवार को चूम रहे थे। हवा के झोंके से डाली इधर-उधर हो जाती। फूल दीवार से दूर हो जाता। फिर कुछ खुद की मेहनत से और कुछ हवा के सहारे दीवार के पास आ जाता और उसको चूमने लगता। गुलमोहर के बाकी फूल डाली के फूल की कोशिश और कलाएं देखकर खिलखिला रहे थे। डालियाँ और पत्तियां हवाओं के साथ मिलकर सीटी बजा रहीं थीं। पेड़ अपनी औलाद को बड़ा होते देख वात्सल्य से निहार रहा था। कायनात मुस्करा रही थी।

फैक्ट्री के सामने गोल पार्क में मई दिवस पर लगाई तिकोनी पत्तियां हवा में फ़ड़फ़ड़ा रही थीं।लाल रंग की तिकोनी पत्तियां देखकर लगा कि शायद मई दिवस मनाने वालों की बाकी गतिविधियों ने लाल तिकोन अपना लिया है ----'छोटा परिवार सुखी परिवार।'

आगे पुलिया पर एक बच्ची अपने दादा या नाना के साथ बैठी थी। दोनों आपस में बतिया रहे थे।

चार महिलाएं साथ साथ टहल रहीं थीं। उनमें से दो लोग यूकेलिप्टस की छाल बगल में दबाये थीं। जिस तरह से बगल में दबाये थीं उससे लग रहा था कि यह रोज का काम नहीं उनका। टहलने आयीं तो समेट लीं पेड़ की पपड़ी।

एक महिला आँखों में काला चश्मा धारण किये थीं।शायद आँख का आपरेशन हुआ हो। वे लकड़ी अपने सर पर रखे थीं।खाली हाथ चल रही महिला आसपास गुजरने वालों से राधे- राधे बोलती चल रही थी।


चाय की दूकान पर एक आदमी चाय पीते हुए बैंक वालों को माँ बहन की गालियों से नवाज रहा था।बता रहा था कि उसके खाते 12 हजार रूपये थे। अभी 700 ही बचे हैं। जबकि उसने पैसे निकाले भी नहीं।

हमने कहा किसी ने कुछ एटीएम कार्ड का दुरूपयोग करके निकाल लिए होंगे।

'हमने एटीएम कार्ड लिया ही नहीं है' यह बताते हुए तीन चार और मोटी पतली गालियां बैंक वालों के खाते में जमा कर दीं।

पता चला भाईसाहब जीआईएफ में काम करते हैं।रिछाई में रहते हैं। हमने पूछा - 'फैक्ट्री तो आठ बजे खुलती है। इतनी जल्दी क्यों निकल लिए घर से?'

'हम इसी टाइम आ जाते हैं। सुबह चार बजे उठे। थोड़ी देर घर की बगिया में टहले। नहाया धोया। पूजा पाठ किया। बहूरानी टिफिन दे देती है।हम निकल लेते हैं घर से।'--भाई जी ने जानकारी दी। पत्नी का जिक्र नहीं किया।शायद न रहीं हों।

फैक्ट्री के बारे में बताने लगे -'ओवरटाइम 51 घण्टे चल रहा है। काम कम है। लेकिन अपना काम तो पूरा करना पड़ता है। नहीं तो जब काम आएगा तो अफसर लिए रजिस्टर छाती पर चढ़ा रहता है कि काम लाओ। हमको तो काम से मतलब।'

चाय की दूकान के बगल में एक झोपड़ी नुमा टपरे पर साईं जी की मूर्ति रखी है। छोटी सी शिवलिंग के आकार की। भण्डारे का जिक्र भी है। यह झोपडी मन्दिर का ड्राफ्ट टाइप है। बड़ी बात नहीं कुछ दिन में यहां भव्य मन्दिर बन जाए और कोई महंत उसकी गद्दी पर काबिज हो जाये।

लौटते ने बाबा नातिन मिले। दो बच्चियां सायकिल पर जा रही थी। आपस में बात करते हुए। गोरी बची की नाक चपटी और कुछ लम्बी देखकर लगा कि नाक थोड़ी कम चपटी और कम लम्बी होती तो और अच्छा लगता। लेकिन मैंने 'लगने' को हड़काकर भगा दिया कि खुदा की कारीगरी में नुक्स निकालने वाले तुम कौन होते हो।

दीवार को गुलमोहर की डाल का फूल उसी तरह चूम रहा था। पेड़ वैसे ही खुश था। पत्तियां वैसे ही सीटियां बजा रहीं थीं। इस बीच सूरज भाई भी ड्यूटी पर आ चुके हैं। किरणें मुस्कराती हुई चारों तरफ पसर गयीं हैं। कायनात डबल मुस्कराती दिख है।

सबेरा हो गया है।

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