Sunday, May 24, 2015

जलेबी, आधे सर का दर्द और कुत्ता कूरियर कम्पनी

हमारे मित्र डॉ आर के त्रिपाठी आज जबलपुर से त्रिची तबादले पर गए। जबलपुर में पिछले साढ़े पांच साल से थे।त्रिची पदोन्नति पर जा रहे हैं। वहां अस्पताल के इंचार्ज होंगे।

हमारा डॉ त्रिपाठी से परिचय 25 साल पुराना है। 1989 में जब बलांगीर फैक्ट्री में थे तब से। जंगल में बनी इस फैक्ट्री में बहुत बड़ा अस्पताल था। स्पेसिलिटी अस्पताल। लेकिन डॉक्टर केवल तीन थे शुरू में। डॉ त्रिपाठी, डॉ दास और डॉ कानूनगो। जंगल में कहीँ भी बिच्छू,सांप या जंगली जानवर निकल आते। ऐसी जगह सबको स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या कराई जहां से सबसे पास का ठीक ठाक अस्पताल 200 किमी दूर था।

एयरपोर्ट पर हम अकेले थे डॉ त्रिपाठी के साथ। कवि अजय गुप्त की ये पंक्तियाँ याद करते हुए :

गर चापलूस होते
तो पुरखुलूस होते
चलते न यूं अकेले
पूरे जुलूस होते।


डॉ त्रिपाठी को विदा करने के बाद रांझी में एक दुकान पर जलेबी बन रही थी। ताज़ी जलेबी खाये हुए बहुत दिन हुए। आज मौका मिला तो तौला लिए 100 ग्राम अपने और संगी ड्राइवर के लिए। कटोरी में दही साथ में।

जलेबी बनाने वाले रवि गोस्वामी बड़े मन से जलेबी बना रहे थे। हमने फ़ोटो खींची तो दुकान में एक बच्चा बोला-'आप बाहर के हौ का? विदेश के? जो फोटो खैंचत हौ'। हम बोले -'बहुत दिन बाद दिखी जलेबी सो खैंच रहे।' रवि बोले -'याददाश्त के लिए खिंचवाते हैं फोटो न लोग। उसई तरह है।'

जलेबी बनाते-बनाते रवि ने बताया कि सुबह-सुबह जलेबी दही खाने से आधे सर का दर्द नहीं होता। इसीलिये लोग पोहा-जलेबी खाते हैं। सर झुकाये जलेबी बनाते रवि जलेबी के छल्लों को एक दुसरे से जोड़ते हुये बढ़ाते जा रहे थे। जब पांच-छह गोल जलेबी में लम्बाई पूरी हो जाती तो ऊपर से मैदा की लाईन खींच देते। इससे सब जलेबियाँ आपस में जुडी रहतीं। एक तरह से छत पर बिछी ईंटों के बीच सरिया जैसे ईंटों को साथ रखती है। वैसे ही जलेबी के ऊपर खींची मैदे की लकीर जलेबियों को साथ रखती है। सेंकते समय उलटने-पुलटने में आसानी रहती है।


रवि को जलेबी बनाते देखकर लगा कि सामान्य सी लगनी वाली चीजों की निर्माण प्रक्रिया में कितनी कलाकारियां छिपी होती हैं।

रवि बनारस के सिगरा के रहने वाले हैं। पिताजी वीएफजे से 1998 में रिटायर हुए। यहां केटरिंग का धंधा है। सुबह जलेबी बनाते हैं।

बनारस की बात चली तो बताया कि वहां शहर बन रहा है। फुटपाथ निकल रहीं हैं। ओवरब्रिज बन रहे हैं। घाट साफ़ हो रहे हैं।

दूकान पर पैसे देते हुए ध्यान आया कि आगे ही महेश यादव की दूध की गुमटी है। उनकी बिटिया 14 महीने की है। एक ठो चॉकलेट ले लिए। महेश से मिले। उन्होंने बताया कि डेयरी में दूध के दाम बढ़ गए हैं लेकिन उन्होंने अभी बढ़ाये नहीं हैं दाम। 200 रूपये रोज का नुकसान हो रहा है।


बिटिया के लिए चॉकलेट दिया तो खुश हुए। नाम बताया उसका-आराध्या। हमने खुद को छोटी चॉकलेट लेने के लिए कोसा। परसाई जी का लेख -'सड़ी सुपारी की संस्कॄति 'याद करते हुए। महेश ने घर आने निमंत्रण दिया। यह हमारी उससे दूसरी ही मुलाक़ात है।

चलने से पहले एक आदमी दूध लेने आया। साथ में उसके कुत्ता था। दूध के पैसे उसने दिए। दूध पालीथीन में भरकर कुत्ते के मुंह में पकड़ा दिया। कुत्ता खरामा-खरामा चलता हुआ निकल गया । मालिक पीछे-पीछे आराम से।

कुत्ते को दूध ले जाते देख मुझे याद आया कि कूरियर कम्पनियां सामान डिलिवरी के लिए कूरियर बच्चों को काम पर लगाती हैं। उनको पेट्रॉल और शायद मोबाइल का खर्च के साथ 5/7 हजार रुपया देती हैं। जिस तेजी से पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं और कम्पनियां कम्पटीशन के चक्कर में लागत कीमत कम करने की जद्दोजहद करती रहती हैं उससे बड़ी बात नहीं की कोई कम्पनी आये और कुत्तों को सामान डिलिवरी के लिये इस्तेमाल करे। पते की जगह जिस घर में सामान डिलीवर करना है उस घर का कोई सामान जमा करना होगा कूरियर कम्पनी के पास। 'कुत्ता कूरियर कम्पनी' के कुत्ते सूँघकर सामान पहुंचा दिया करेंगे।


इसके बाद कूरियर सेवा में लगे बच्चों का क्या होगा। क्या पता वे फिर कुत्तों से भी कम पैसे में सामान पहुंचाने के लिए तैयार हो जाए। जिन्दा रहने के लिए सब कुछ करना पड़ता है भाई।

मेस में आये तो मेस के बच्चे चाय थर्मस में भरकर दे गए। लैपटाप पर चाय का कप धरे चाय की चुस्कियां लेते हुए स्टेट्स लिख रहे हैं।  पेश है इतवारी तुकबंदी भी:

सुबह से टहलते रहे,
इधर उधर ही यार ।
बीत गया इस बीच
चवन्नी भर इतवार।

दोस्तों की छुट्टी है
होंगे बांचने को बेकरार।
अब और देर न करो
पोस्ट कर दो यार।


सुबह हो गयी है। आपको छुट्टी का दिन मुबारक को।

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