Saturday, October 10, 2015

पुरस्कार- विरोध बनाम राजनीति

पिछले दिनों कुछ बुद्धिजीवियों की हत्याएं हुईं। कट्टरपंथियों की निंदा हुई। फिर कुछ साहित्यकारों ने अपनी उपाधियाँ और इनाम लौटाए। इस पर साहित्यकारों की कर्मकुंडली बांचते हुए इसको दिखावा बताया और सवाल किया कि उन वीर साहित्यकारों ने ऐसा उस समय क्यों नहीं किया ? ऐसा उस समय क्यों नहीं किया?

ये सवाल इतनी तेजी से किये गए कि जिन साहित्यकारों ने विरोध किया उनका विरोध उनकी अवसरवादिता बना ही साथ-साथ उन बुद्धिजीवियों की हत्याएं के प्रति विरोध भी गड्ढे में चला गया। चूंकि विरोध करने वाले अवसरवादी रहे हैं इसलिए उनका यह विरोध भी अवसरवाद ही होगा।इसलिए उनका विरोध खारिज। मतलब किसी गलत बात का विरोध तभी जायज माना जाएगा जबकि विरोध करने वाला खुद पूरी तरह पाक साफ हो। विरोध करने का अधिकार पवित्रात्माओं के पास सुरक्षित है।

आज जटिल होते आधुनिक समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के समझौते करते हुए जीता है। हर व्यक्ति किसी न किसी सन्दर्भ में कभी न कभी किसी कुछ गलत लोगों के साथ खड़ा हुआ होगा। ऐसे तो समाज का कोई भी व्यक्ति किसी के भी विरोध का हकदार रहेगा ही नहीं।

जिन साहित्यकारों ने बुद्धिजीवियों की हत्याओं का विरोध करते हुए अपनी उपाधियाँ लौटाने की घोषणा की है उनकी तमाम पुरानी अवसरवादी घटनाओं की लिस्ट बताते हुए जितनी जोर से उनकी निंदा हो रही है उससे कट्टरवादियों को लगता होगा कि पूरा समाज हमारे समर्थन में खड़ा है।

आज नई दुनिया के पेज नंबर 14 पर दो साहित्यकारों द्वारा अपने पुरस्कार लौटाने/पद से त्यागपत्र देने की घोषणा की है। इनमें से एक उर्दू उपन्यासकार रहमान अब्बास हैं जिन्होंने अपना 'महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार' दादरी घटना के विरोध में लौटाने की घोषणा की। दूसरी हैं उपन्यासकार शशि देशपांडे जिन्होंने कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्जी की हत्या पर साहित्य अकादमी की चुप्पी के विरोध में साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद से त्यागपत्र दिया।

मैं इन लेखकों के बारे में कुछ नहीं जानता। इंतजार कर रहा हूँ किसी प्रतिक्रिया का जो यह बताएगी की इन्होंने जो किया वह इनकी अवसरवादिता है। इन्होंने यह तब क्यों नहीं किया जब यह हुआ था , जब वह हुआ था।
यह लिखने के बाद सोच रहा हूँ कि कोई हमसे पूछेगा कि तुमने अब यह क्यों लिखा ? उस समय क्यों नहीँ लिखा जब वह हुआ था।

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