Thursday, October 08, 2015

प्यार की ताकत

आज जब सुबह साइकिलियाने तो 6 बज गए थे। किधर चलें सोचते-सोचते गाड़ी हनुमान मन्दिर तक पहुंच गई। लोग सड़क पर निकल लिए थे टहलने। कुछ छोटे बच्चे-बच्चियां सड़क और आसपास की लकड़ी सरपर लादे जा रहे थे। जब निकले होंगे बीनने तो और सबेरा रहा होगा। उस समय वो सब बच्चे अपने घर में आराम की नींद सो रहे होंगे जिनके घर में फेसबुक चलता होगा। बच्चे उठाये जाने पर कुनमुना कर फिर सो जाते होंगे-'मम्मी थोड़ा और। बस एक मिनट कहते हुए।'

एक पुलिया पर छट्ठू सिंह और चार लोगों के साथ बैठे थे। सर पर सहवाग स्टाइल में रुमाल और आँखों में दीप्ति नवल नुमा काला चश्मा धारण किये। दाढ़ी बुद्धिजीवी टाइप खिचड़ी। हम तबियत पूछे तो बोले-'सब एकदम ठीक। कूदने लगे अब तो। भूखे न लगत रहल। एक्को रोटी न खा पावत रहल। अब त छ छ रोटी खा रहे।'
हम बोले-वाह। ऐसे ही स्वस्थ बने रहो। साथ के दो लोग सिगरेट पी रहे थे। हम ठोंके तो एक ने तो आखिरी कश लेकर फेंक दी सिगरेट। दूसरे ने छिपा ली। बची होगी अभी। हम कौन सरकार थे जो हमारे विरोध में वो बची सिगरेट फूंक दें। छट्ठू सिंह ने चलते समय भगवान शंकर की जय बोले। वह सबका भला करें। वह 'हर हर महादेव' नहीं बोले तो हमें भी डर नहीं लगा।

आजकल हर नारा या उद्घोष डराने का काम करता है। लगता है यह नारा नहीं बोला तो बोलने वाला बुरा मान सकता है और बुरा मानने पर तो कोई भी कुछ भी कर गुजरता है आज के समय में।

एक महिला अपनी बच्ची को स्कूल भेजने के लिए शायद रिक्शे का इंतजार कर रही थी। बस्ता सड़क पर रखे किताबें/कापियां सहेज रही थी। बच्ची स्टेच्यू बनी सड़क पर खड़ी थी। मानो जनगणमन गा रही हो।

एक लड़की सड़क पर दौड़ का अभ्यास कर रही थी। दौड़ते हुए कन्धे से हटी टी शर्ट वापस जमा रही थी। कनखियों से बगल से गुजरते लोगों को भी देख रही थी। रिबन में बंधी बालों की चुटिया उसकी पीठ पर सरल आवर्त गति में इधर-उधर हो रही थी। ऐसे लगा कि उसकी चुटिया उसके शरीर का सन्तुलन बनाने का काम कर रही हो जैसे जहाजों में 'जाइरोस्कोप' उनका सन्तुलन बनाये रखते हैं। उस बच्ची के पास से होते हुए आगे निकलने के बाद काफी दूर तक उसके जूतों की आवाज धप-धप आती रही जो कि धीरे-धीरे सुनाई देनी बन्द हो गयी।

रांझी मोड़ पर अख़बार वाले दिखे। ज्यादातर अख़बार बिक चुके थे। आगे सब्जी वाले दिखे।और आगे दो आदमी दिखे जो कि उकडू बैठे एक छुटकी बच्ची से कुछ-कुछ बतिया रहे थे। हंस रहे थे।

चाय की दुकान पर मिसिर जी मिले। सर घुटाये थे। पितृ पक्ष में घुटा दिए थे। सबको ग्लास में चाय दे रहे थे। हमको कप में दिए। एक बस रुकी। बस से एक बच्चा उतरा। तीन ब्रेड लेकर वापस चढ़ गया। हम मिसरा जी से बात करते हुए चाय पीते रहे।

इस बीच एक लड़का वहां आया। निक्कर में जो छापे बने थे वो किसी कम्पनी का विज्ञापन टाइप लग रहे थे। हमको लगा आदमी का शरीर भी विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। हीरो हीरोइन तो करते ही हैं खूब पैसे लेकर। क्या पता कल को किसी कंपनी में कोई एम बी ए पढ़ा हुआ अधिकारी आइडिया दे कि होर्डिंग में लाखों रूपये फूंकने की बजाय गरीब लोगों के शरीर विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल किये जाएँ। उनके बदन पर कम्पनी का विज्ञापन छाप दिया जाये। उनको पैसा दिया जाए। विज्ञापन के साथ भुखमरी का इलाज मुफ़्त में। जिस कंपनी का लोगो धारण किये हुए लोग ज्यादा दिखें समझो वह कंपनी ज्यादा सफल। हो तो रहा ही है यह आज भी।।आगे और अच्छे तरीके से होगा।

बच्चे से बात होने लगी तो पता चला बच्चा सुबह अखबार बेंचता है। 50 अख़बार के 50 रूपये रोज के। फिर एक दुकान से लेकर चिकन सप्लाई करता है। उसके बाद कालेज जाता है। शाम को एक ड्राइविंग स्कूल में जाता है वहां एडमिशन का काम देखता है। 500 रूपये एक एडमिशन के मिलते हैं। फिर रनिंग के लिए और फिर जिम। फिर घर जाकर खाना खाकर सो जाता है। रोज 500 से 600 रूपये की कमाई हो जाती है।

बी कॉम 3 सरे सेमेस्टर में महाकोशल डिग्री कालेज में पढ़ता है बालक। 3 पक्के दोस्त हैं। कभी-कभी कालेज से पिक्चर देखने जाते हैं। तीनों की साझा सहेली है। उसके साथ पिक्चर जाते हैं। सहेली एम ए में पढ़ती है। चार महीने हुए दोस्ती के। तीन पिक्चर देखी इस बीच। सबसे नई 'सिंह इज ब्लिंक' देखी। अच्छी लगी। बाकी दो दोस्त कम जाते हैं। बालक ही ज्यादा जाता है सहेली के साथ पिक्चर देखने।

एम ए में है तो बड़ी होगी। हड़काती होगी। यह पूछने पर बताया बालक ने -'नहीं। अच्छा नेचर है। हड़काती नहीं। अच्छे से बात करती हैं।' पिक्चर का खर्च बच्चा उठाता है।

इसके पहले कोई दोस्त थी? पूछने पर बताया बालक ने -हां एक दोस्त थी न। केवी में हम साथ पढते थे। रोज उससे बात करते थे। दो साल साथ रहा उसका।उसके पापा आर्मी में थे। इंटरमीडिएट करने के बाद उसके पापा ने उसको महाराष्ट्र भेज दिया।

क्यों भेज दिया ? पूछने पर बताया- 'उसके पापा ने उसके पास मेरी फोटो देखी। उन्होंने मेरे घर शिकायत की। मम्मी से कहा। मम्मी ने कहा- ये तो मेरे घर रोज आती है। जब ट्यूशन पढ़ने जाती थी तो रोज आती थी वो मेरे घर। मेरे पापा 1998 में नहीं रहे। सिर्फ मम्मी हैं घर पर। मैं अकेला हूँ।'

अपने किस्से बताते हुए आगे बताया बालक ने- फिर उसके पापा ने उसको महाराष्ट भेज दिया। जब वो जा रही थी तब उसने मुझे स्टेशन बुलाया। मैं गया मिलने। उसके पापा ने देख लिया। फिर वापस नहीं बुलाया उसे। वहीं एडमिशन करा दिया।

उसकी यादें साझा करते छूटे बालक ने बताया- दो साल साथ रहा हमारा। हम पढ़ने में ऐसे ही थे। उसने कहा-तुमको टॉप करना है। हमने किया। 98/99 परसेन्ट नम्बर लाये।

प्यार में कितनी ताकत होती है यह एहसास फिर से हुआ। किसी के प्यार में दशरथ मांझी पहाड़ तोड़ देता है। किसी के प्यार में कोई फिसड्डी बच्चा टॉप कर जाता है।

बालक ने यादें साझा करते हुए बताया-'उसके साथ स्कूल में रहते थे। पिक्चर केवल एक बार गए-बेशरम। प्यार करते थे। रोज किस करते थे। जब गयी तो फोन नम्बर बदल गया। कुछ दिन पहले उसका फोन आया था तब मैंने उसकी बात दीदी (अभी की पिच्चर सहेली) से कराई। उसने किसी दुसरे के मोबाइल से फोन किया था। मेरे पास उसका नम्बर नहीं पर जब मैं पढाई पूरी कर लूँगा तब उसके घर जाऊँगा। उससे शादी करूँगा।'

दीदी के बारे में बताया कि उनकी 8 महीने में शादी होने वाली है।

क्या पता उसका किसी और से साथ हो जाये ? इस पर कहा बालक ने- 'हो जाएगा। तब की बात अलग। लेकिन मेरा तो नहीं होगा। वह भी इंतजार करेगी। मैं लॉ करके वकालत करूँगा। फिर उसके पापा से बात करूँगा। पूछूँगा-बताइये आपको क्या चाहिए अपनी लड़की के लिए। जो चाहिए वो सब करके दिखाऊंगा।'

आपने 4 साल पुरानी बात याद दिला दी।कहते हुए और भी तमाम यादें साझा की बालक ने। लड़की का फेसबुक खाता बालक ने ही बनाया। वह आपरेट नहीं करती। फोन भी नहीं है उसके पास। पापा ने दिया नहीं है। दूसरे के फोन से बात करती है।

पान मसाला खाता है बालक। पर कम। सब टोंकते हैं पर छोड़ नहीं पाता। जेब में बढ़िया स्मार्ट फोन। खूब सारी बातें हुईं बालक से। उसने खुद का नाम भी बताया। पिक्चर दीदी और केवी वाली गर्ल फ्रेंड का भी। फेसबुक एकाउंट भी दिखाया। लिखने के लिए मना भी नहीं किया। लेकिन मैं किसी के नाम नहीँ लिख रहा। मुझे लग रहा है कि बच्चियों के घर वाले कहीं यह पोस्ट देखेंगे तो उन बच्चियों को परेशानी न हो।

दो पीढ़ियों की सोच का अंतर है यह शायद।

आपका दिन शुभ हो।

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