Tuesday, October 13, 2015

कितनी मुद्दत बाद मिले हो

सुबह हुई आज 5 बजे। साईकल स्टार्ट हुई 6 बजने में कुछ मिनट पहले। कमरे से देखने पर लग रहा था कि बाहर अँधेरा है। पर बाहर निकले तो ढेर उजाला।कोई सफर शुरू होने पर लगता है कठिन होगा। पर निकलते ही वह सुहाना सा हो जाता है। इसलिए सफर पर निकलने के पहले बहुत सोचना नहीं चाहिए। निकल लेना चाहिए।

पुलिया पर एक आदमी मौनी बाबा टाइप मुंह किये बैठा था। खूब सारे लोग सड़क पर टहलने के लिए निकले हुए थे। फैक्ट्री के सामने दूर तक सामान लेकर आये ट्रकों की लाइन लगी थी। कल छुट्टी थी। कल सामान खाली नहीं हो पाया। आज स्टोर्स का काम बढ़ेगा।

कालोनी की तरफ से निकले। महिलाएं/बच्चियां अपने घर के बाहर सफाई कर रहीं थीं। कोई कूड़े को धक्का सा मारते हुए भगा रहीं थी। कोई प्यार से सहेजते हुए विदा कर रही थी कूड़े को।


सड़क पर महिलायें/बच्चियां हाथ में कांसे के लोटे में जल और थाली में फूल लिए पूजा के लिए निकलीं थीं। नवरात्र शुरू हो गया। एक जगह सात-आठ बच्चियां पूरी सड़क पर चहकती हुई चली जा रहीं थीं। पूजा करके लौट रहीं थीं। बताया-'काली मन्दिर होकर आये। पूजा करके।नवरात्र शुरू हो गए न अंकल।' हमने पूछा-'फोटो खींच लें?' इस पर एक बच्ची ने टीम प्रवक्ता का जिम्मा सम्भालते हुये कहा-'नहीं। हम खुद फेसबुक पर डाल देंगे। आप लाइक कर देना।' हमने कहा-' तुम खींचोगी कैसे? जब खींचोगी नहीं तो डालोगी कैसे? और हम तो तुम्हारे फ्रेंड हैं नहीं। कैसे लाइक करेंगे?' इस पर वो बोली -'अभी घर जाकर खिंचवाएंगे न। भाई खींचेगा। तब डालेंगे ऍफ़ बी पर।'
कांसे से राहत इंदौरी का शेर याद आया:
"वह खरीदना चाहता था कांसा(भिक्षा पात्र) मेरा
मैं उसके ताज की कीमत लगाकर लौट आया।"
रास्ते में दो कीर्तनिये मिले। गले में हारमोनियम और ढोलक लटकाये, गाते-बजाते कालोनी में टहल रहे थे। मथुरा-वृन्दावन से आये हैं। 25 सालों से आ रहे हैं। सुबह-सुबह साफ-सुथरे कपड़े पहने भजन गाते देखकर अच्छा लगा। ढोलक वाले के पैर में कुछ तकलीफ सी थी। लंगड़ाकर चल रहे थे।


आगे एक बच्ची अपनी दादी के साथ टहल रही थी। अंशिका नाम है बच्ची का। दादी बच्ची के सवालों का मुस्कराते हुए जबाब दे रही थी। मैंने सुना जब उसने बताया-'बन्दर उछलकर पेड़ पर चढ़ जाता है।'

आज दो साल की बच्ची कल को बड़ी होकर शायद किसी को बताये--'मुझे सबसे ज्यादा प्यार मेरी दादी करतीं थीं।रोज सुबह टहलाने ले जाती थीं।'

बच्ची-दादी की फोटो खींचकर चलने को हुए तो पता चला कि हमारी पेंट का पाँयचा साइकिल की चेन में फंस गया था। हमारे हाल ऐसे हो गए जैसे किसी सड़क पर स्टेच्यू बोल दिया हो। किनारे खड़े कुछ देर सोचते रहे क्या करें। तीन विकल्प सूझे:

1. पैन्ट खींचकर निकाल लें।
2.पैन्ट उतारकर फिर उसको साईकिल के चेन कवर से निकालने की कोशिश करें।
3. किसी को रोककर चेन से पैन्ट निकलवाने में सहायता करने को कहैं।

पहले विकल्प में पैन्ट फटने का खतरा था। दूसरे में सड़क पर 'छेम-छेम' का डर। तीसरे के लिए कोई दिखा नहीं। हारकर हमने 3 विकल्प निरस्त करके मामला सहज बुद्धि को सौंप दिया। सहज बुद्धि ने रास्ता सुझाया और हमने खड़े-खड़े साइकिल का पिछला पहिया उठाया और दूसरे पैर से आहिस्ते से पैडल चलाते हुए पैन्ट को चेन के बन्धन से मुक्त किया।

अभी कमरे पर आकर दूसरे उपाय के बारे में सोचा तो लगा कि वह तो सम्भव ही नहीं था साईकिल पर सवार होने के चलते मेरे दोनों पैर साइकिल के इधर-उधर 'इस पार प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा' वाली स्थिति में थे।

सोच तो यह भी रहे हैं कि साइकिल की चैन ने पाँयचा पकड़ा क्यों? शायद वह रोज पाँयचे को अपने नजदीक से गुजरते, छूकर निकलते महसूस करती होगी। आज मौका मिला होगा अकेले में तो उसने पकड़कर रगड़ दिया होगा आवारा पाँयचे को। कुछ देर तक साथ रहने के बाद फिर शायद बिछुड़ने का मन न हुआ हो। अब अलग होने पर शायद एक दूसरे की याद में डूबें हों। क्या पता।


बिरसा मुंडा चौराहे पर चाय पी। एक आदमी एक झंडा थामे चला जा रहा था। बताया मैहर देवी जा रहे हैं। 25 साल से जाते हैं। बेलदारी करते हैं। पैदल यात्री के साथ दो चप्पल धारी यात्री भी थे। वे दोनों पहली बार जा रहे थे। दूसरा भी मजूरी करता है। तीसरे ने फोटो नहीं खिंचाई। ग्रेजुएट है तीसरा। एम.बी.ए. कर रहा है। हमने कहा-चाय पी लो। वो बोले-जाना है। हमने जो भी फुटकर पैसे थे दे दिए कि जहां रुकना चाय पी लेना। उसने ले लिए। हमें याद आया कि हम जब साइकिल से भारत दर्शन करने निकले थे तो बिहार में एक दरोगा ने अपने पास के सब पैसे हमको दे दिए थे। हमने केवल फुटकर पैसे दिए।यह चिरकुटई है या यात्री का जबलपुर का ही होना यह सोचेंगे।

चाय पीने पर 50 का नोट दिया तो चाय वाले ने नाक बिचकाई। तब तक किसी ने उसको फुटकर रूपये दिए । उसने 45 रूपये मुझे वापस कर दिए।

सड़क की दूसरी तरफ एक बच्चा फूल की माला बना रहा था। प्रकाश नाम है बच्चे का। कक्षा 5 में पढ़ता है। सुबह 6 बजे आया था। अभी पापा आएंगे तब जाएगा स्कूल। 10 रूपये की एक माला है। रात को ठेलिया यहीं खड़ी करके ढंककर फूल सहित घर चले जाते हैं उसके पापा। सुबह प्रकाश आता है। माला बनाता है। फूल बेंचता है। फिर स्कूल जाता है।


लौटते में सूरज भाई एकदम सामने दिखे। चमकते हुए। मुस्कराते हुए शायद गाना भी गा रहे हों:
"कितनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो।"
दीपा से भी मिले। शिकायती लहजे में पूछा उसने-आप कहां रहे इतने दिन। आये नहीं। हमने बताया -घर गए थे। वह पूजा के लिए जा रही थी। बोली-'आप हीनई रुको। हम अब्बी आये। एक मिनट में।' हम बोले-'तुम पूजा करके आओ आराम से। हम फिर आएंगे।' उसके लिए जो बिस्कुट कल शाम ही खरीद के लाये थे देकर हम चले आये।
काली मन्दिर के सामने से गुजरे। तमाम लोग पूजा करने के लिए वहां मन्दिर की सीढ़ियों पर चढ़ते और पूजा करके उतरते दिखे। उसके सामने ही पुल के नीचे मजदूरों के तमाम परिवार चूल्हे सुलगाये देवी पूजा से निर्लिप्त पेट पूजा का इंतजाम करते दिखे।

मेरे सामने ही रेलवे फाटक बन्द हुआ। हम उसके खुलने का इंतजार करते वहीं साईकिल के डंडे के इधर-उधर पैर किये खड़े कुछ देर पोस्ट लिखते थे। दो ट्रेनें गुजरीं। फिर गेटमैन ने चाबी लगाकर बैरियर का ताला खोला। हैंडल से गियर घूमाते हुए 'बैरियर फाटक ' खोला। हम निकलकर आगे आये। इसके बाद सरसराते हुए पैडलियाते हुए मेस पहुंचे।

मेस के फर्श पर देखा चिड़ियाँ फुदक रहीं थीं। फर्श चिकनी थी इसलिए उछल-उछल कर आगे-पीछे हो रहीं थीं। सड़क पर पहुंची तो मटकते हुए चलने लगीं जैसे कोईं माडल रैंप पर कैटवॉक करते हुए चल रही हो।सड़क पर इठलाती हुई चलती चिड़िया बहुत खूबसूरत लग रही। मन किया उससे कह दें-'बहुत खूबसूरत। क्यूट।' पर फिर नहीं कहा। चले आये कमरे पर।कमरे पर पहुंचकर चाय पीते हुए पोस्ट लिखी।

आपका दिन चकाचक बीते। अच्छे से रहिएगा। मुस्कराते हुए। मुस्कराने में कंजूसी मत करियेगा। थोड़ा हमारे हिस्से का भी मुस्करा लीजियेगा।

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