Monday, October 05, 2015

अरे कहां के सौ साल

दोपहर बाद जब लंच के बाद दफ्तर जा रहे थे तो ये भाई पुलिया शैया पर आरामफर्मा मिले। हम दूर से फोटो खैंच लिए। डिस्टर्ब नहीं किये। पर जब हम पास से गुजरे तो भाईजी ने सर उठाकर जायजा सा लिया।

अब जब हम देखे कि जग ही गए हैं भाई जी तो बतियाने लगे। पता चला भाई जी सन्दूक, टीन के सब सामान लगाकर अलमारी से पीपा तक का मरम्मत का काम करते हैं। सामने साइकिल के हैंडल पर कब्जे लटके थे जैसे हैंगर पर कपड़े लटकाये जाते हैं।सुबह चले थे घर से। दोपहर हो गयी। तक गए तो पुलिया पर सुस्ताने लगे। कलीम नाम... बताया भाई जी ने।

सुबह निकलते हैं तो दिन भर में 300 से 400 रूपये कमाई हो जाती है। कभीं नहीं भी होती। लेकिन ऐसा कम होता है।

54 साल के कलीम के 4 बच्चे हैं। दो लड़के दो लड़कियां। लड़कियों की शादी हो गयी। दोनों दामाद पल्लेदारी करते हैं। लड़के दोनों भी अलमारी बनाने का काम करते हैं। किन्ही महबूब भाई के यहां। बड़े लड़के की शादी जल्द ही होने वाली है।

बचपन से जबलपुर में थे। पिता जीसीएफ में काम करते थे। 30 साल से भी पहले नहीँ रहे।

उम्र की बात चली तो बोले कलीम-अपनी तो उम्र हो गयी अब। हमने कहा-अरे अब्बी तो 54 के हुए। आधी उम्र बीती। आधी बाकी। इस पर बोले कलीम-अरे कहां के सौ साल। आदमी 60 से 70 तक चल देता है। एक और आदमी वहां खड़ा था। उसने भी 70 की उम्र पर ही मोहर लगाई। हम अकेले पड़ गए उम्र के मामले में। कुछ बहस करने लायक न थे। चुप रह गए।

रद्दी चौकी में रहने वाले कलीम से पूछा कि रद्दी चौकी नाम क्यों पड़ा उस मोहल्ले का। क्या वहां रद्दी की बहुत दुकाने हैं। इस पर कलीम ने कहा- पता नहीं। शायद इसलिए कहते हों क्योंकि वहां बहुत गन्दगी रहती हो जब नाम पड़ा।

हम कुछ बोले नहीँ। मन किया दादरी में हुई घटना के बारे में कुछ पूछें कि एखलाक के मरने पर उसका क्या कहना है लेकिन यही सोचकर कुछ पूछे नहीं कि लोग कहेंगे-पुलिया के बहाने राजनीति कर रहा है अगला।क्या पता कोई सेकुलर कह दे या फिर कोई कट्टरपंथी। लफ़ड़ा है कुछ भी पूछना।

बात करके चले गए फैक्ट्री। कलीम बैठे रहे। कुछ देर बाद चले गए होंगे।
‪#‎पुलिया‬

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