Wednesday, October 21, 2015

हिन्दी बोलने वाले समाज में लिखने-पढ़ने का चलन


बाकी भाषाओं का मुझे अंदाज नहीं पर हिंदी में कई लेखकों को लगता है कि जितना ज्यादा और अच्छा उन्होंने लिखा उसके मुकाबले उनको इज्जत कम मिली। तारीफ़ नहीं हुई। इसके बाद वो तारीफ़ के मामले में 'आत्मनिर्भर' हो जाते हैं।

बड़ी त्रासद स्थिति है यह। कभी बहुत लोकप्रिय माना जाने वाला लेखक अपने बारे में बताये कि वह बहुत लोकप्रिय रहा है।

हिंदी में पढ़ने-लिखने और उसको बढ़ावा देने की शायद बहुत अच्छी परंपरा न होना भी एक कारण रहा हो।
हिंदी में किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। खरीदकर तो और भी कम। किताबों का मंहगा होना, साक्षरता का कम होना, लेखकों का समसामयिक विषयों पर रुचिकर तरीके न लिखना बड़ा कारण रहा हो शायद।

या इसके अलावा और कोई कारण है किताबों के कई कम पढ़े जाने के।

ऐसा सुना है कि यूरोप व अन्य पश्चिम समाज में लोग खूब पढ़ते लिखते हैं। लेखक अपने लेखन की कमाई से जीविका चला लेते हैं। इसी तरह की अन्य बातें जिससे लगता है कि वहां लेखन की स्थिति बेहतर है।
इसके उलट अपने यहां खासकर हिंदी में मात्र लेखन से जीविका चलाना और आर्थिक रूप से सम्मानपूर्वक जीवन जीना बहुत दुष्कर कार्य है। बिरले ही लोग ऐसा कर पाते हैं।

लेखक द्वारा लेखन को पवित्र कर्म मानना और साहित्य को स्वान्ताय सुखाय मानने की भावना भी इसके पीछे कारण रही होगी।

इससे अलग मुझे लगता है अपने समाज का तानाबाना भी इसके पीछे एक कारक रहा। उत्सव धर्मी समाज जहां संयुक्त परिवार की परम्परा रही। चौपाल और बतकही के अड्डेबाजी का चलन रहा। लोग जब मौका मिला आपस में बतियाते रहे। जनसंख्या घनत्व अच्छा रहा। लोग कभी अकेले नहीं रहे। दुःख-सुख कहने सुनने और सुनाने के लिए कोई न कोई हमेशा उपलब्ध रहा। वीरों की जय जयकार की परम्परा रही। जिसने कुछ भी वीरोचितकार्य किया उसको खट से किसी देव के समकक्ष बता दिया। खराब कर्म किया यदि किसी ने और अगर वह कमजोर भी है तो फौरन उसकी निंदा कर दी।

जो भी था मन में बोल-बतियाकर फारिग कर दिया।लिख-पढ़कर अपने मन के भाव व्यक्त करने की जरूरत समाज में व्यापक रूप से लोगों को रही नहीं।

इसके उलट यूरोप और पश्चिम में लोग एकल समाज में बहुत जल्दी/पहले बदल गए। कम जनसंख्या घनत्व के चलते ऐसी व्यवस्थाएं कम रहीं होंगी कि लोग एक-दूसरे से कह-सुन सकें। लिखने-पढ़ने के चलन के चलते लोगों ने लिखना-पढ़ना शुरू किया और जारी रखा। लेखन को पवित्र काम और स्वान्ताय सुखाय न मानकर अभिव्यक्ति का माध्यम माना। कोई विषय वर्जित न माना और जमकर अभिव्यक्त किया अपने। यह भी एक कारण रहा होगा कि वहां लेखक अगर सफल है तो अपनी जीविका लेखन के बल पर चला सकता है।

पता नहीं ठीक से कह पाया कि नहीं पर कहना यह चाहता था कि अपने यहां अपने में सन्तुष्ट और आपसी घुलन मिलन से खुश रहने की समाज की भावना भी एक बड़ा कारण रही जिसके चलते लिखने-पढ़ने का चलन कम है अपने यहां-खासकर हिन्दी बोलने वाले समाज में। जो पीड़ित और सुविधा वंचित समाज रहा उसके लोग भी अकेलेपन के सन्त्रास से ग्रस्त नहीं रहे।

यह मेरा सोचना है। जरूरी नहीं कि यह सही ही हो और आप इससे सहमत ही हों।

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